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Bahraich News: जंगल में इंसानी दखल से हाथियों में गुस्सा
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
Updated Mon, 23 Mar 2026 12:12 AM IST
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कतर्नियाघाट के जंगल में विचरण करता टस्कर हाथी स्रोत : वन विभाग
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बहराइच/बिछिया। कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग में हाथियों के बढ़ते हमले अब गंभीर चिंता का विषय बन गए हैं। बीते वर्षों में लगातार हो रहीं घटनाओं ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर शांत स्वभाव के माने जाने वाले हाथी अब इतने हमलावर क्यों हो रहे हैं।
कतर्नियाघाट, सुजौली और निशानगाड़ा रेंज के जंगलों और उससे सटे गांवों में इन दिनों हाथियों की दहशत बढ़ गई है। हाथियों के हमले पहले भी होते थे, लेकिन इक्का-दुक्का घटनाएं ही होती थीं, लेकिन इस वर्ष माह भर के अंदर रविवार को हाथी के हमले की तीसरी घटना सामने आई है।
वर्ष 2020 में कतर्नियाघाट जंगल को हाथी कारीडोर घोषित करने की कवायद शुरू हुई थी, तबसे अब तक जंगली हाथियों ने आबादी में उत्पात मचाते हुए आठ लोगों को रौंद कर मार डाला है।
इन घटनाओं ने लोगों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। विशेषज्ञों और वन विभाग के सूत्रों के अनुसार इसके पीछे कई अहम कारण सामने आ रहे हैं।
सेवानिवृत्त वनाधिकारी आरके गौतम का कहना है कि सबसे बड़ा कारण जंगलों में मानवीय दखल और प्राकृतिक आवास में कमी को माना जा रहा है। जंगलों के आसपास बढ़ती आबादी और खेती के विस्तार से हाथियों के पारंपरिक रास्ते (कॉरिडोर) प्रभावित हो रहे हैं। इससे हाथी अक्सर गांवों की ओर रुख कर रहे हैं।
इसके अलावा जंगलों में प्राकृतिक संसाधन घटने से हाथी खेतों में लगी फसलों की ओर आकर्षित होते हैं, जहां उनका इंसानों से आमना-सामना हो जाता है। ऐसे में खुद को असुरक्षित महसूस करने पर हाथी आक्रामक हो जाते हैं।
वन विभाग के अनुसार पिछले आठ वर्षों में क्षेत्र में हाथियों का मूवमेंट तेजी से बढ़ा है, जिसके चलते इसे हाथी रिजर्व भी घोषित किया गया। बावजूद इसके हाथियों के झुंड अलग-अलग इलाकों में फैल गए हैं और अक्सर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। इस समय हाथियों का प्रिय भोजन गन्ना कट चुका है यह भी हमले का कारण हो सकता है।
कतर्नियाघाट में हाथी के संरक्षण पर काम कर रही संस्था न्यूज के विशेषज्ञ अभिषेक ने बताया कि तेज आवाज, भीड़ और हाथियों को भगाने के पारंपरिक तरीके भी उन्हें उग्र बना देते हैं। कई बार लोग अनजाने में हाथियों के करीब पहुंच जाते हैं, जिससे हाथी हमलावर होते हैं।
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इन क्षेत्रों में अधिक सक्रिय हैं हाथी
कतर्नियाघाट, सुजौली और निशानगाड़ा रेंज के जंगलों के साथ-साथ आसपास के गांवों में भी हाथियों के झुंड सक्रिय हैं। ये झुंड अलग-अलग इलाकों में लगातार मूवमेंट करते रहते हैं।
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रात होते ही बढ़ जाता है खौफ
भवानीपुर गांव निवासी जगदीश और सुंदर का कहना है कि रात के समय हालात और भी भयावह हो जाते हैं। हाथी गांवों के करीब आकर चिंघाड़ते हैं, जिससे खेतों की ओर जाना भी खतरे से खाली नहीं रहता। इससे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है।
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विभाग का दावा- फेंसिंग लगी, गजमित्र तैनात
डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने बताया कि हाथियों से बचाव के लिए तार फेंसिंग लगाई गई है और गजमित्र तैनात किए गए हैं। साथ ही विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को भी सतर्क रहते हुए हाथियों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
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हाथियों के हमलों की प्रमुख घटनाएं एक नजर में
-22 मार्च 2026: कतर्नियाघाट रेंज के भवानीपुर गांव में कुवरिया (80) को हाथी ने पैरों से रौंदा, मौत।
- फरवरी 2026: बिछिया-मिहींपुरवा मार्ग पर हाथी के हमले में मुन्नी देवी (45) की मौत।
- फरवरी 2026: कटियारा चौकी के पास पुजारी सुरेश दास (100) की मौत।
- वर्ष 2024: बिछिया-कतर्नियाघाट मार्ग पर मुबारक (25) की मौत।
- वर्ष 2020–2022: भवानीपुर, बर्दिया और चहलवा क्षेत्र में चार लोगों की मौत।
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कतर्नियाघाट, सुजौली और निशानगाड़ा रेंज के जंगलों और उससे सटे गांवों में इन दिनों हाथियों की दहशत बढ़ गई है। हाथियों के हमले पहले भी होते थे, लेकिन इक्का-दुक्का घटनाएं ही होती थीं, लेकिन इस वर्ष माह भर के अंदर रविवार को हाथी के हमले की तीसरी घटना सामने आई है।
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वर्ष 2020 में कतर्नियाघाट जंगल को हाथी कारीडोर घोषित करने की कवायद शुरू हुई थी, तबसे अब तक जंगली हाथियों ने आबादी में उत्पात मचाते हुए आठ लोगों को रौंद कर मार डाला है।
इन घटनाओं ने लोगों में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है। विशेषज्ञों और वन विभाग के सूत्रों के अनुसार इसके पीछे कई अहम कारण सामने आ रहे हैं।
सेवानिवृत्त वनाधिकारी आरके गौतम का कहना है कि सबसे बड़ा कारण जंगलों में मानवीय दखल और प्राकृतिक आवास में कमी को माना जा रहा है। जंगलों के आसपास बढ़ती आबादी और खेती के विस्तार से हाथियों के पारंपरिक रास्ते (कॉरिडोर) प्रभावित हो रहे हैं। इससे हाथी अक्सर गांवों की ओर रुख कर रहे हैं।
इसके अलावा जंगलों में प्राकृतिक संसाधन घटने से हाथी खेतों में लगी फसलों की ओर आकर्षित होते हैं, जहां उनका इंसानों से आमना-सामना हो जाता है। ऐसे में खुद को असुरक्षित महसूस करने पर हाथी आक्रामक हो जाते हैं।
वन विभाग के अनुसार पिछले आठ वर्षों में क्षेत्र में हाथियों का मूवमेंट तेजी से बढ़ा है, जिसके चलते इसे हाथी रिजर्व भी घोषित किया गया। बावजूद इसके हाथियों के झुंड अलग-अलग इलाकों में फैल गए हैं और अक्सर आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंच जाते हैं। इस समय हाथियों का प्रिय भोजन गन्ना कट चुका है यह भी हमले का कारण हो सकता है।
कतर्नियाघाट में हाथी के संरक्षण पर काम कर रही संस्था न्यूज के विशेषज्ञ अभिषेक ने बताया कि तेज आवाज, भीड़ और हाथियों को भगाने के पारंपरिक तरीके भी उन्हें उग्र बना देते हैं। कई बार लोग अनजाने में हाथियों के करीब पहुंच जाते हैं, जिससे हाथी हमलावर होते हैं।
इन क्षेत्रों में अधिक सक्रिय हैं हाथी
कतर्नियाघाट, सुजौली और निशानगाड़ा रेंज के जंगलों के साथ-साथ आसपास के गांवों में भी हाथियों के झुंड सक्रिय हैं। ये झुंड अलग-अलग इलाकों में लगातार मूवमेंट करते रहते हैं।
रात होते ही बढ़ जाता है खौफ
भवानीपुर गांव निवासी जगदीश और सुंदर का कहना है कि रात के समय हालात और भी भयावह हो जाते हैं। हाथी गांवों के करीब आकर चिंघाड़ते हैं, जिससे खेतों की ओर जाना भी खतरे से खाली नहीं रहता। इससे लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है।
विभाग का दावा- फेंसिंग लगी, गजमित्र तैनात
डीएफओ अपूर्व दीक्षित ने बताया कि हाथियों से बचाव के लिए तार फेंसिंग लगाई गई है और गजमित्र तैनात किए गए हैं। साथ ही विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ग्रामीणों को भी सतर्क रहते हुए हाथियों से दूरी बनाए रखनी चाहिए।
हाथियों के हमलों की प्रमुख घटनाएं एक नजर में
-22 मार्च 2026: कतर्नियाघाट रेंज के भवानीपुर गांव में कुवरिया (80) को हाथी ने पैरों से रौंदा, मौत।
- फरवरी 2026: बिछिया-मिहींपुरवा मार्ग पर हाथी के हमले में मुन्नी देवी (45) की मौत।
- फरवरी 2026: कटियारा चौकी के पास पुजारी सुरेश दास (100) की मौत।
- वर्ष 2024: बिछिया-कतर्नियाघाट मार्ग पर मुबारक (25) की मौत।
- वर्ष 2020–2022: भवानीपुर, बर्दिया और चहलवा क्षेत्र में चार लोगों की मौत।