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Ballia News: मिट्टी जांच, पोषक तत्व प्रबंधन से 25 प्रतिशत बढ़ाई जा सकती है उपज
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नरही। मिट्टी जांच, पोषक तत्व प्रबंधन से 25 प्रतिशत तक उपज बढ़ाई जा सकती है। ये बातें किसानों को ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत बताई गईं।
कृषि विज्ञान केंद्र, सोहांव के वैज्ञानिकों की ओर से जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसानों को जागरूक करने का अभियान चलाया जा रहा है। इसी क्रम में भरौली में आयोजित कार्यक्रम में किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी परीक्षण और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. संजीत कुमार ने फसलों में संतुलित मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसान फसल की आवश्यकता, मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों के अनुपात को ध्यान में रखते हुए नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का सही मात्रा और सही समय पर उपयोग करें। उन्होंने बताया कि मिट्टी की जांच कराकर पोषक तत्वों के सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान पर उपयोग करने से किसान 15 से 25 प्रतिशत तक उपज बढ़ा सकते हैं। साथ ही उत्पादन लागत कम कर अपनी शुद्ध आय में वृद्धि कर सकते हैं।
डॉ. संजीत कुमार ने बताया कि एनपीके का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, जबकि भारत में इसका अनुपात 7:2.7:1 है। उन्होंने कहा कि यूरिया के अत्यधिक उपयोग से किसानों का धन व्यर्थ जाता है। असंतुलित उर्वरक उपयोग से उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ भूमि की उर्वरता और उत्पादकता में भी गिरावट आती है। अधिक मात्रा में यूरिया का उपयोग नाइट्रेट के रूप में भूजल और नाइट्रस ऑक्साइड के रूप में वायु प्रदूषण का कारण बनता है। उन्होंने किसानों को हर दो से तीन वर्ष में मिट्टी की जांच कराने की सलाह देते हुए कहा कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड में उपलब्ध एन, पी, के, पीएच, ऑर्गेनिक कार्बन, जिंक, आयरन और बोरॉन की स्थिति के आधार पर उर्वरकों का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि धान और गेहूं के लिए सामान्यतः 120:60:40 किलोग्राम एनपीके प्रति हेक्टेयर की सिफारिश की जाती है, जबकि दलहनी फसलों में नाइट्रोजन कम और फास्फोरस अधिक आवश्यक होता है।
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उन्होंने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश की लगभग 45 प्रतिशत मिट्टियों में जिंक की कमी पाई जाती है। धान की फसल में 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर का प्रयोग लाभकारी होता है। नाइट्रोजन उर्वरकों को दो से तीन बार में बांटकर देने तथा फास्फोरस और पोटाश को बुवाई के समय ही प्रयोग करने की सलाह दी गई। उन्होंने नीम कोटेड यूरिया के उपयोग और पत्ती परीक्षण के आधार पर आवश्यक पोषक तत्वों के छिड़काव पर भी जोर दिया। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के सस्य वैज्ञानिक डॉ. सोमेंद्र नाथ ने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि किसान रासायनिक उर्वरक, जैविक खाद, हरी खाद, जैव उर्वरक और फसल अवशेष प्रबंधन के समन्वित उपयोग से मिट्टी की सेहत बनाए रखते हुए लंबे समय तक बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
उन्होंने किसानों को राइजोबियम कल्चर और पीएसबी से बीज उपचार करने तथा वर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट, मुर्गी खाद और मछली खाद जैसे जैविक विकल्पों का उपयोग बढ़ाने की सलाह दी। उनका कहना था कि इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होगा। कार्यक्रम में किसानों ने वैज्ञानिकों से खेती से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने समाधान भी किया। वैज्ञानिकों ने किसानों से वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने का आह्वान किया।
कृषि विज्ञान केंद्र, सोहांव के वैज्ञानिकों की ओर से जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में संचालित ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसानों को जागरूक करने का अभियान चलाया जा रहा है। इसी क्रम में भरौली में आयोजित कार्यक्रम में किसानों को संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी परीक्षण और एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम में वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं कृषि विज्ञान केंद्र के अध्यक्ष डॉ. संजीत कुमार ने फसलों में संतुलित मात्रा में उर्वरकों के प्रयोग के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि किसान फसल की आवश्यकता, मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों के अनुपात को ध्यान में रखते हुए नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश तथा सूक्ष्म पोषक तत्वों का सही मात्रा और सही समय पर उपयोग करें। उन्होंने बताया कि मिट्टी की जांच कराकर पोषक तत्वों के सही स्रोत, सही मात्रा, सही समय और सही स्थान पर उपयोग करने से किसान 15 से 25 प्रतिशत तक उपज बढ़ा सकते हैं। साथ ही उत्पादन लागत कम कर अपनी शुद्ध आय में वृद्धि कर सकते हैं।
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डॉ. संजीत कुमार ने बताया कि एनपीके का आदर्श अनुपात 4:2:1 माना जाता है, जबकि भारत में इसका अनुपात 7:2.7:1 है। उन्होंने कहा कि यूरिया के अत्यधिक उपयोग से किसानों का धन व्यर्थ जाता है। असंतुलित उर्वरक उपयोग से उत्पादन लागत बढ़ने के साथ-साथ भूमि की उर्वरता और उत्पादकता में भी गिरावट आती है। अधिक मात्रा में यूरिया का उपयोग नाइट्रेट के रूप में भूजल और नाइट्रस ऑक्साइड के रूप में वायु प्रदूषण का कारण बनता है। उन्होंने किसानों को हर दो से तीन वर्ष में मिट्टी की जांच कराने की सलाह देते हुए कहा कि मृदा स्वास्थ्य कार्ड में उपलब्ध एन, पी, के, पीएच, ऑर्गेनिक कार्बन, जिंक, आयरन और बोरॉन की स्थिति के आधार पर उर्वरकों का उपयोग किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि धान और गेहूं के लिए सामान्यतः 120:60:40 किलोग्राम एनपीके प्रति हेक्टेयर की सिफारिश की जाती है, जबकि दलहनी फसलों में नाइट्रोजन कम और फास्फोरस अधिक आवश्यक होता है।
उन्होंने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश की लगभग 45 प्रतिशत मिट्टियों में जिंक की कमी पाई जाती है। धान की फसल में 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर का प्रयोग लाभकारी होता है। नाइट्रोजन उर्वरकों को दो से तीन बार में बांटकर देने तथा फास्फोरस और पोटाश को बुवाई के समय ही प्रयोग करने की सलाह दी गई। उन्होंने नीम कोटेड यूरिया के उपयोग और पत्ती परीक्षण के आधार पर आवश्यक पोषक तत्वों के छिड़काव पर भी जोर दिया। कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के सस्य वैज्ञानिक डॉ. सोमेंद्र नाथ ने एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (आईएनएम) पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि किसान रासायनिक उर्वरक, जैविक खाद, हरी खाद, जैव उर्वरक और फसल अवशेष प्रबंधन के समन्वित उपयोग से मिट्टी की सेहत बनाए रखते हुए लंबे समय तक बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
उन्होंने किसानों को राइजोबियम कल्चर और पीएसबी से बीज उपचार करने तथा वर्मी कम्पोस्ट, कम्पोस्ट, मुर्गी खाद और मछली खाद जैसे जैविक विकल्पों का उपयोग बढ़ाने की सलाह दी। उनका कहना था कि इससे रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम होगी और मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार होगा। कार्यक्रम में किसानों ने वैज्ञानिकों से खेती से जुड़े विभिन्न प्रश्न पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने समाधान भी किया। वैज्ञानिकों ने किसानों से वैज्ञानिक पद्धति अपनाकर खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने का आह्वान किया।