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Balrampur News: हिंदू राष्ट्र की छिनी पहचान वापस पाने में भारत पर टिकी नेपाल की निगाहें

Tue, 11 Aug 2026 10:58 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर Updated Tue, 11 Aug 2026 10:58 PM IST
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Nepal looks to India to help reclaim its 'Hindu Nation' identity
फोटो-26-बलरामपुर के जरवा में ​स्थित भारत-नेपाल सीमा द्वार।-संवाद
संजय तिवारी
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बलरामपुर। नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है। काठमांडू से शुरू हुई यह मांग अब पूर्व से पश्चिमी नेपाल के सीमावर्ती क्षेत्रों तक पहुंचती दिखाई दे रही है। दांग में हिंदू राष्ट्र और राजशाही की बहाली की मांग को लेकर बैठकों और जनसंपर्क का दौर चलने की बात सामने आ रही है। नेपाल की इस राजनीतिक हलचल की चर्चा भारत-नेपाल सीमा से सटे बलरामपुर में भी है। नेपाल के हिंदू संगठनों से जुड़े लोगों को इस मुद्दे पर भारत से समर्थन की उम्मीद है।

नेपाल में हिंदू राष्ट्र की मांग नई नहीं है। वर्ष 2008 में राजशाही समाप्त होने के बाद नेपाल धर्मनिरपेक्ष संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना। मौजूदा संविधान देश को बहुजातीय, बहुभाषी, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में परिभाषित करता है। इसके बावजूद हिंदू राष्ट्र और राजशाही की बहाली की मांग समय-समय पर उठती रही है। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) लंबे समय से संवैधानिक राजशाही और हिंदू राष्ट्र को अपने प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शामिल करती रही है।
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मई 2026 में भी आरपीपी नेताओं ने संविधान संशोधन की प्रक्रिया में सनातन हिंदू राष्ट्र और संवैधानिक राजशाही के मुद्दे को शामिल करने की मांग उठाई थी। दांग और आसपास के इलाकों में भी इस मुद्दे को लेकर हिंदू संगठनों और राजशाही समर्थकों की गतिविधियां बढ़ने की बात कही जा रही है। सीमावर्ती क्षेत्र होने के कारण दांग की गतिविधियों का असर बलरामपुर में भी चर्चा के रूप में दिखाई देता है।
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प्यूठान निवासी और हिंदू संगठनों से जुड़े पीर रतननाथ मंदिर के पीर योगी ब्रह्मनाथ का कहना है कि नेपाल की पहचान लंबे समय तक हिंदू राष्ट्र के रूप में रही है। उनके अनुसार हिंदू राष्ट्र की मांग अब केवल राजनीतिक नारे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे संसद और सड़क दोनों स्तरों पर उठाया जा रहा है। उनका कहना है कि नेपाल को अपनी सांस्कृतिक पहचान के अनुरूप आगे बढ़ना चाहिए।

भारत से सहयोग की उम्मीद

विश्व हिंदू महासंघ के दांग जिला अध्यक्ष डॉ. भोलानाथ योगी ने भी इस मुद्दे पर भारत से सहयोग की उम्मीद जताई। उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्र सरकार से नेपाल में उठ रही हिंदू राष्ट्र की मांग पर गंभीरता से विचार करने की अपेक्षा की। उन्होंने कहा कि भारत और नेपाल के रिश्ते केवल सरकारों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक संबंधों के साथ रोटी-बेटी का रिश्ता भी है।

हालांकि, भारत की आधिकारिक नीति किसी दूसरे संप्रभु देश की शासन व्यवस्था या संवैधानिक पहचान तय करने के बजाय नेपाल के साथ स्थिर, शांतिपूर्ण और समृद्ध संबंधों को मजबूत करने की रही है। ऐसे में नेपाल के हिंदू राष्ट्र संबंधी आंदोलन में भारत की प्रत्यक्ष भूमिका को लेकर दावों और आधिकारिक नीति में अंतर को स्पष्ट रखना जरूरी है।

81 फीसदी से अधिक हिंदू आबादी का दिया जाता है हवाला

नेपाल की 2021 की राष्ट्रीय जनगणना के अनुसार देश की आबादी करीब 2.92 करोड़ थी। इसमें 81.2 प्रतिशत हिंदू, 8.21 प्रतिशत बौद्ध और 5.09 प्रतिशत मुस्लिम आबादी दर्ज की गई। हिंदू राष्ट्र की मांग करने वाले संगठन नेपाल की बहुसंख्यक हिंदू आबादी को इसके समर्थन में प्रमुख आधार के रूप में पेश करते हैं। हालांकि, देश के संविधान में सभी धर्मों और समुदायों के अधिकारों की व्यवस्था है।

राजशाही और हिंदू राष्ट्र की मांग को लेकर वर्ष 2025 और 2026 में नेपाल में कई राजनीतिक गतिविधियां और प्रदर्शन हुए। वर्ष 2025 में राजशाही समर्थक समूहों ने काठमांडू में बड़े प्रदर्शन किए थे। वर्ष 2026 में भी आरपीपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में नेपाल को वैदिक सनातन हिंदू राष्ट्र बनाने और राजशाही बहाल करने की मांग को प्रमुखता दी।


जून 2026 में आरपीपी नेतृत्व ने भी हिंदू राष्ट्र और राजशाही के मुद्दे पर जनसमर्थन बढ़ने का दावा किया। इससे संकेत मिलता है कि नेपाल की राजनीति में यह मुद्दा अभी भी सक्रिय है। हालांकि, इसे व्यापक जनमत की स्थिति मानने से पहले स्वतंत्र और विश्वसनीय जनमत सर्वेक्षणों या चुनावी आंकड़ों का आधार जरूरी होगा।

फोटो-26-बलरामपुर के जरवा में स्थित भारत-नेपाल सीमा द्वार।-संवाद

फोटो-26-बलरामपुर के जरवा में स्थित भारत-नेपाल सीमा द्वार।-संवाद

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