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Balrampur News: एमडीएम घोटाले में दो और आरोपी गिरफ्तार
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एसपी कार्यालय में मौजूद पकड़े गए एमडीएम घोटाले के अभियुक्त ।-स्रोत: विभाग
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बलरामपुर। एमडीएम घोटाले में शुक्रवार को पुलिस ने दो और आरोपियों को बिजलीपुर बाईपास से गिरफ्तार कर लिया। पचपेड़वा क्षेत्र के ग्राम त्रिकोलिया निवासी नूरुल हसन खान और जनपद सिद्धार्थनगर थाना इटवा के ग्राम गुलरिहा निवासी गुलाम गौसुल बरा को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया है।
11 करोड़ रुपये से अधिक सरकारी धन के गबन में 45 लोगों के खिलाफ 26 नवंबर को प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इससे पहले गबन के सात आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है। सरकारी धन का लेन-देन करने वाले 25 से अधिक बैंक खाते फ्रीज किए जा चुके हैं। एमडीएम के पैसों के लेन-देन से जुड़े अन्य बैंक खातों को भी खंगाला जा रहा है।
बीएसए शुभम शुक्ल ने 26 नवंबर को नगर कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि मध्याह्न भोजन योजना (एमडीएम) के जिला समन्वयक फिरोज अहमद ने कई लोगों के साथ मिल कर सरकारी दस्तावेज में कूटरचना करके 11 करोड़ रुपये से अधिक का गबन किया है। मामले में पुलिस ने 45 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। पुलिस सात आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार करके जेल भेज चुकी है। प्रभारी निरीक्षक नगर मनोज कुमार की टीम अन्य आरोपियों की तलाश में जुटी थी। शुक्रवार को बिजलीपुर बाईपास से नूरुल हसन खान व गुलाम गौसुल बरा को गिरफ्तार कर लिया। दोनों को जेल भेज दिया गया है।
ऐसे करते थे सरकारी धन का गबन
एसपी विकास कुमार ने बताया कि नूरुल हसन खान व गुलाम गौसुल बरा से गहन पूछताछ की गई। दोनों ने पुलिस से बताया कि जिला समन्वयक एमडीएम फिरोज अहमद खां के साथ मिलकर आईवीआरएस (इंटरएक्टिव वॉयस रिस्पांस सिस्टम) पोर्टल से विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या जान लेते थे। फिर छात्रों की संख्या के सापेक्ष शासन स्तर से निर्धारित कन्वर्जन काॅस्ट के गुणांक में धनराशि की गणना करके एक्सेल शीट तैयार की जाती थी।
एक्सेल शीट को बीएसए से अग्रसारित कराकर वित्त एवं लेखाधिकारी बेसिक से परीक्षण कराया जाता था। इसके बाद जिलाधिकारी के पास प्रस्तुत की जाती थी। एक्सेल शीट को जिलाधिकारी की तरफ अनुमोदित कर दिए जाने के बाद उस शीट को पीएफएमएस (पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम ) पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाना चाहिए, ताकि एक्सेल शीट पर अंकित धनराशि विद्यालयों के खातों में पहुंच जाए।
इसमें यहीं पर खेल किया जाता था। इस स्तर पर मूल एक्सेल शीट को अपलोड न करके अपने सहयोगी विद्यालयों के खातों में अंकित धनराशि को बढ़ा लिया जाता था। उसी बढ़ाई हुई धनराशि के सापेक्ष अन्य विद्यालयों के खातों में कम पैसे भेजे जाते थे। इससे जिलाधिकारी की तरफ से अनुमोदित धनराशि में कोई अंतर नहीं आता था। इस प्रकार कूटरचना के फलस्वरूप जिन विद्यालयों में धनराशि बढ़ाकर भेजी जाती थी, उन विद्यालयों के प्रधानाध्यापक, ग्राम प्रधान और अभिभावक समिति के अध्यक्ष मिलकर धनराशि को निकाल कर आपस में बांट लेते थे।
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11 करोड़ रुपये से अधिक सरकारी धन के गबन में 45 लोगों के खिलाफ 26 नवंबर को प्राथमिकी दर्ज की गई थी। इससे पहले गबन के सात आरोपियों को जेल भेजा जा चुका है। सरकारी धन का लेन-देन करने वाले 25 से अधिक बैंक खाते फ्रीज किए जा चुके हैं। एमडीएम के पैसों के लेन-देन से जुड़े अन्य बैंक खातों को भी खंगाला जा रहा है।
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बीएसए शुभम शुक्ल ने 26 नवंबर को नगर कोतवाली में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि मध्याह्न भोजन योजना (एमडीएम) के जिला समन्वयक फिरोज अहमद ने कई लोगों के साथ मिल कर सरकारी दस्तावेज में कूटरचना करके 11 करोड़ रुपये से अधिक का गबन किया है। मामले में पुलिस ने 45 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। पुलिस सात आरोपियों को पहले ही गिरफ्तार करके जेल भेज चुकी है। प्रभारी निरीक्षक नगर मनोज कुमार की टीम अन्य आरोपियों की तलाश में जुटी थी। शुक्रवार को बिजलीपुर बाईपास से नूरुल हसन खान व गुलाम गौसुल बरा को गिरफ्तार कर लिया। दोनों को जेल भेज दिया गया है।
ऐसे करते थे सरकारी धन का गबन
एसपी विकास कुमार ने बताया कि नूरुल हसन खान व गुलाम गौसुल बरा से गहन पूछताछ की गई। दोनों ने पुलिस से बताया कि जिला समन्वयक एमडीएम फिरोज अहमद खां के साथ मिलकर आईवीआरएस (इंटरएक्टिव वॉयस रिस्पांस सिस्टम) पोर्टल से विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या जान लेते थे। फिर छात्रों की संख्या के सापेक्ष शासन स्तर से निर्धारित कन्वर्जन काॅस्ट के गुणांक में धनराशि की गणना करके एक्सेल शीट तैयार की जाती थी।
एक्सेल शीट को बीएसए से अग्रसारित कराकर वित्त एवं लेखाधिकारी बेसिक से परीक्षण कराया जाता था। इसके बाद जिलाधिकारी के पास प्रस्तुत की जाती थी। एक्सेल शीट को जिलाधिकारी की तरफ अनुमोदित कर दिए जाने के बाद उस शीट को पीएफएमएस (पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम ) पोर्टल पर अपलोड कर दिया जाना चाहिए, ताकि एक्सेल शीट पर अंकित धनराशि विद्यालयों के खातों में पहुंच जाए।
इसमें यहीं पर खेल किया जाता था। इस स्तर पर मूल एक्सेल शीट को अपलोड न करके अपने सहयोगी विद्यालयों के खातों में अंकित धनराशि को बढ़ा लिया जाता था। उसी बढ़ाई हुई धनराशि के सापेक्ष अन्य विद्यालयों के खातों में कम पैसे भेजे जाते थे। इससे जिलाधिकारी की तरफ से अनुमोदित धनराशि में कोई अंतर नहीं आता था। इस प्रकार कूटरचना के फलस्वरूप जिन विद्यालयों में धनराशि बढ़ाकर भेजी जाती थी, उन विद्यालयों के प्रधानाध्यापक, ग्राम प्रधान और अभिभावक समिति के अध्यक्ष मिलकर धनराशि को निकाल कर आपस में बांट लेते थे।