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Banda News: 1.20 लाख में आशियाना बनाना मुश्किल, महंगाई ने छीना सपना
संवाद न्यूज एजेंसी, बांदा
Updated Sat, 07 Mar 2026 01:15 AM IST
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फोटो - 08 अधूरा पड़ा पीएम आवास। फाइल फोटो
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बांदा। प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) के तहत आवास निर्माण की लागत लाभार्थियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। वर्ष 2015 में योजना शुरू होने पर 1.20 लाख रुपये की लागत तय की गई थी। पिछले एक दशक में महंगाई बढ़ने से यह राशि अब घर बनाने के लिए नाकाफी साबित हो रही है।
पिछले 10 वर्षों में भवन निर्माण सामग्री के दामों में लगभग 50 फीसदी वृद्धि हुई है। सरिया प्रति क्विंटल दो हजार रुपये महंगा हुआ है, वहीं सीमेंट की प्रति बोरी 150 रुपये बढ़ गई है। ईंटों के दाम भी तीन हजार रुपये प्रति हजार तक पहुंच गए हैं। इसके अलावा, ठेकेदार, लेबर और कारीगरों की मजदूरी दोगुनी हो गई है।
पहले 400 रुपये प्रतिदिन लेने वाले कारीगर अब 800 रुपये मांग रहे हैं। बेलदार की मजदूरी 300 रुपये से बढ़कर 600 रुपये और सहयोगी की मजदूरी 200 रुपये से बढ़कर 500 रुपये प्रतिदिन हो गई है। लाभार्थियों को उम्मीद थी कि सरकार लागत राशि बढ़ाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ। कई लाभार्थी मकान का एक हिस्सा बनाने के बाद निर्माण अधूरा छोड़ देते हैं।
अधूरी ख्वाहिशें और कर्ज का बोझ
जमालपुर निवासी मैकू बताते हैं कि पीएम आवास की राशि से मकान तो बन गया, लेकिन छपाई का काम बाकी है। वे पिछले दो सालों से बिना छपाई वाले मकान में रह रहे हैं। महोखर के रामभवन ने बताया कि राशि से स्लैब स्तर तक ही मकान बन पाया। स्लैब डलवाने के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ा। उनका मानना है कि 1.20 लाख रुपये में एक कमरा, शौचालय और रसोईघर बनाना संभव नहीं है।
शहरी क्षेत्रों में पीएम आवास निर्माण के लिए 2.50 लाख रुपये दिए जाते हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह राशि 1.20 लाख रुपये ही है। उनका मानना है कि गांवों में मकान बनवाने में अधिक खर्च आता है, क्योंकि लाभार्थियों को अधिकांश सामान शहरों से लाना पड़ता है। इसलिए पीएम आवास की लागत को बढ़ाने की आवश्यकता है।
- राजेश कुमार, जिला विकास अधिकारी
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पिछले 10 वर्षों में भवन निर्माण सामग्री के दामों में लगभग 50 फीसदी वृद्धि हुई है। सरिया प्रति क्विंटल दो हजार रुपये महंगा हुआ है, वहीं सीमेंट की प्रति बोरी 150 रुपये बढ़ गई है। ईंटों के दाम भी तीन हजार रुपये प्रति हजार तक पहुंच गए हैं। इसके अलावा, ठेकेदार, लेबर और कारीगरों की मजदूरी दोगुनी हो गई है।
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पहले 400 रुपये प्रतिदिन लेने वाले कारीगर अब 800 रुपये मांग रहे हैं। बेलदार की मजदूरी 300 रुपये से बढ़कर 600 रुपये और सहयोगी की मजदूरी 200 रुपये से बढ़कर 500 रुपये प्रतिदिन हो गई है। लाभार्थियों को उम्मीद थी कि सरकार लागत राशि बढ़ाएगी, पर ऐसा नहीं हुआ। कई लाभार्थी मकान का एक हिस्सा बनाने के बाद निर्माण अधूरा छोड़ देते हैं।
अधूरी ख्वाहिशें और कर्ज का बोझ
जमालपुर निवासी मैकू बताते हैं कि पीएम आवास की राशि से मकान तो बन गया, लेकिन छपाई का काम बाकी है। वे पिछले दो सालों से बिना छपाई वाले मकान में रह रहे हैं। महोखर के रामभवन ने बताया कि राशि से स्लैब स्तर तक ही मकान बन पाया। स्लैब डलवाने के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ा। उनका मानना है कि 1.20 लाख रुपये में एक कमरा, शौचालय और रसोईघर बनाना संभव नहीं है।
शहरी क्षेत्रों में पीएम आवास निर्माण के लिए 2.50 लाख रुपये दिए जाते हैं। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह राशि 1.20 लाख रुपये ही है। उनका मानना है कि गांवों में मकान बनवाने में अधिक खर्च आता है, क्योंकि लाभार्थियों को अधिकांश सामान शहरों से लाना पड़ता है। इसलिए पीएम आवास की लागत को बढ़ाने की आवश्यकता है।
- राजेश कुमार, जिला विकास अधिकारी