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Barabanki News: सपनों का ब्रिज टूटा, कागजों में सिमटी दिव्यांग बच्चों की तकदीर

संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी Updated Sun, 03 May 2026 01:57 AM IST
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The bridge of dreams has collapsed, the fate of disabled children is confined to paper.
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बाराबंकी। बेसिक शिक्षा विभाग की समेकित शिक्षा का वह दौर अब एक सुनहरी याद बन गया है, जब जनेस्मा कॉलेज और जीजीआईसी के कमरों से निकलकर दिव्यांग बच्चे रेलवे की पटरियों से लेकर दिल्ली के स्कूलों तक में कामयाबी का परचम लहराते थे।
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कोरोना काल में सरकार ने ब्रिज कोर्स की आवासीय व्यवस्था क्या खत्म की, इन बच्चों के सपनों की डोर ही टूट गई। साल 2006 से 2019 तक के मूकबधिर और दृष्टिबाधित बच्चों के शानदार अतीत की बात करे तो तब उनके हुनर देख लोग हतप्रभ रह जाते थे। वह तस्वीर आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा है। मूक-बधिर और दृष्टिबाधित बच्चों के लिए चलने वाले 60-60 बच्चों के ब्रिज कोर्स में उनकी पढ़ाई, खान-पान और रहने का पूरा जिम्मा विभाग उठाता था। 10 बच्चों पर एक समर्पित शिक्षक था। खेल के मैदान से लेकर सांस्कृतिक मंचों तक, ये बच्चे जब अपनी प्रस्तुति देते थे, तो अच्छे-अच्छे दांतों तले उंगली दबा लेते थे।
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यहा से कक्षा 8 उत्तीर्ण करने के बाद ये बच्चे लखनऊ के संकेत विद्यालय में दाखिला लेकर अपने जीवन को नई दिशा देते थे। इसी व्यवस्था की देन है कि आज इस कोर्स से निकले दो छात्र ओडिशा में रेलवे की सेवा कर रहे हैं, तो एक छात्र दिल्ली में सरकारी शिक्षक बनकर भविष्य संवार रहा है।
कोरोना काल के बाद सरकार ने ब्रिज कोर्स की व्यवस्था क्या बंद की इन बच्चों की पौध मुरझा गई। 2019 के बाद सरकार ने इन बच्चों के दाखिले के साथ पढ़ाई की परिषदीय स्कूलों व्यवस्था की। क्या व्यवस्था के बदलाव के नाम पर हम इन मासूमों से उनके आगे बढ़ने का हक छीन रहे हैं? जिन हाथों में कभी मेडल होते थे, क्या वे अब सिर्फ सरकारी आंकड़ों का हिस्सा बनकर रह जाएंगे? हर किसी के मन में यह सवाल है।
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