Bareilly News: आईएएस ओपी वर्मा को कोर्ट ने किया तलब, कर्मचारी को पीटने के आरोप में समन जारी
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने बरेली के पूर्व एडीएम सिटी ओपी वर्मा को समन जारी किया है। उन पर 2019 में एक कर्मचारी को पीटने और जातिसूचक गालियां देने का आरोप है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बरेली के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट सुरेश कुमार दुबे ने एक परिवाद पर सुनवाई करते हुए वर्ष 2019 में एडीएम सिटी के पद पर तैनात रहे ओपी वर्मा को भारतीय दंड संहिता की धारा 324 और 504 के तहत समन जारी करते हुए तलब किया है। अगली सुनवाई दो जुलाई को होगी। ओपी वर्मा वर्तमान में पदोन्नत होकर लखनऊ में बतौर आईएएस तैनात हैं। उन पर कर्मचारी को कार्यालय में बंद करने पीटने का आरोप है।
इज्जतनगर थाना क्षेत्र की बन्नूवाल कॉलोनी निवासी रमोद कुमार सक्सेना ने वर्ष 2019 में कोर्ट में अर्जी देकर आरोप लगाया था कि तत्कालीन एडीएम सिटी ने न सिर्फ अपने चेंबर में बुलाकर उनको पीटा, बल्कि जातिसूचक गालियां देकर अपमानित किया। झूठे मुकदमे में जेल भिजवाने की धमकी दी। कोर्ट ने पुलिस की जांच रिपोर्ट और गवाहों के बयानों के आधार पर प्रथम दृष्टया मामला सही पाया और आरोपी अधिकारी के खिलाफ समन जारी करते हुए कोर्ट में उपस्थित होने का आदेश दिया है।
चकबंदी के विवाद से जुड़ी है कहानी
इस मामले की जड़ें चकबंदी विभाग के एक पुराने विवाद और कूटरचित दस्तावेजों से जुड़ी हैं। रमोद कुमार सक्सेना का कहना है कि वह चकबंदी विभाग भुता में अहलमद के पद पर तैनात थे। वर्ष 2006 में जब वह बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के यहां पेशकार थे, तब पीठासीन अधिकारी रमाकान्त शुक्ला ने एक अपील में दो विपरीत आदेश पारित कर दिए थे। खुलासा होने पर खुद को बचाने के लिए रमोद कुमार सक्सेना के खिलाफ ही कोतवाली में धोखाधड़ी की रिपोर्ट दर्ज करा दी। हालांकि, मई 2018 में अदालत ने रमोद कुमार सक्सेना को दोषमुक्त करार दिया है।
यह है आरोप
रमोद कुमार सक्सेना का आरोप है कि 24 जनवरी 2019 की शाम पांच बजे तत्कालीन एडीएम सिटी ओपी वर्मा ने उन्हें अपने चैंबर में बुलाया। वहां रमाकांत शुक्ला, प्रेमचंद्र और सुनील कुमार शर्मा सहित चकबंदी विभाग के कई अधिकारी और कर्मचारी पहले से मौजूद थे। चैंबर में घुसते ही एडीएम सिटी उनको गालियां देने लगे। कोने में रखा डंडा उठाकर रमोद कुमार सक्सेना को पीटना शुरू कर दिया। उन पर दबाव बनाया गया कि वह चकबंदी विभाग में हुए फर्जीवाड़े की जिम्मेदारी अपने सिर ले लें। इन्कार करने पर उनके साथ और बर्बरता की गई।
कोर्ट ने की गंभीर टिप्पणी
अदालत में सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष की ओर से यह दलील देने की कोशिश की गई कि आरोपी एक लोकसेवक (सरकारी अधिकारी) है। इसलिए धारा 197 दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए शासन से अग्रिम मंजूरी लेना अनिवार्य है। अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि किसी अधीनस्थ कर्मचारी को चैंबर में बुलाकर पीटना, गाली देना या प्रताड़ित करना किसी भी लोकसेवक के पदीय कर्तव्य के निर्वहन के दायरे में नहीं आता है। कोर्ट ने कहा कि पद की शक्ति का दुरुपयोग करने वाले अधिकारी को इस तरह का विधिक संरक्षण नहीं दिया जा सकता।
फर्जी बयान पर हस्ताक्षर कराए और भिजवा दिया जेल
शिकायतकर्ता के अनुसार, मारपीट के बाद एडीएम सिटी ने अपने पेशकार जयवीर सिंह से एक फर्जी बयान तैयार करवाया। रमोद कुमार सक्सेना को धमकाकर जबरन उस फर्जी बयान पर हस्ताक्षर करा लिया। उसी दिन रमोद कुमार सक्सेना के खिलाफ शांति भंग की धारा 151/107 सीआरपीसी के तहत फर्जी कार्रवाई करते हुए उन्हें कोतवाली पुलिस के हवाले कर दिया गया, ताकि वह आवाज न उठा सकें। 25 जनवरी 2019 को उन्हें जेल भेज दिया गया। एक फरवरी को वह जमानत पर जेल से बाहर आए।