Bareilly News: सिस्टम के कोल्हू में पिस रहे गन्ना किसान, चीनी मिलों के बंद होने से बढ़ी मुसीबत
बरेली जिले के गन्ना किसान दोहरे संकट का सामना कर रहे हैं। नवाबगंज की ओसवाल चीनी मिल 54.5 करोड़ रुपये का भुगतान न करने पर बंद हो गई है। बहेड़ी की केसर चीनी मिल पर भी 159 करोड़ रुपये बकाया हैं। इस सत्र में उसके बंद होने का खतरा है।
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बरेली जिले के गन्ना किसान इन दिनों दोहरे संकट से जूझ रहे हैं। खेती की लागत बढ़ने और उत्पादन घटने से जहां मुनाफा कम हुआ है, वहीं चीनी मिलों के बंद होने से गन्ना बेचना भी किसानों के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं।
पेराई सत्र 2023-2024 का 15 और 2024-2025 का 39.5 करोड़ रुपये का भुगतान न देने पर नवाबगंज की ओसवाल चीनी मिल पर पिछले सत्र से ही ताला लग चुका है। यहां के तौल केंद्र अन्य चीनी मिलों से संबद्ध कर दिए गए। 2024-2025 का 142 और सत्र 2025-26 का 17 करोड़ रुपये का भुगतान देने में नाकाम बहेड़ी की केसर चीनी बिल पर भी इस सत्र में बंदी की तलवार लटक रही है।
चीनी मिल का दायरा पिछले पेराई सत्र में ही घटा दिया गया। इस चीनी मिल के पास 2018 तक 52 गन्ना खरीद केंद्र थे। भुगतान में देरी को लेकर बढ़ते आक्रोश के बीच 24 केंद्र अन्य मिलों को दे दिए गए। चीनी मिल से जुड़े लोगों की मानें तो मिल गेट से 10 किलोमीटर दूर तक के केंद्र भी अन्य चीनी मिलों को दे दिए गए हैं।
इसका असर चीनी मिल पर पड़ रहा है। गन्ना कम मिलने की वजह से पेराई सत्र के दौरान कई बार नो केन की स्थिति बनने पर चीनी मिल को बंद करना पड़ रहा है। इस सत्र में केसर चीनी मिल गन्ने की पेराई करेगी या नहीं यह भी अब तक तय नहीं है।
चीनी मिल बंद होने की वजह से क्षेत्र के किसानों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। क्रय केंद्र दूसरी चीनी मिलों को दिए जरूर गए हैं, मगर किसानों की मानें तो यहां गन्ना बेचने में परेशानी आती है। रकबा बढ़ने पर संबंधित चीनी मिल अपने क्षेत्र का गन्ना पहले खरीदने को प्राथमिकता देती है। अन्य दिक्कतें भी हैं। इस वजह से किसान औने-पौने दाम पर क्रशर संचालकों को गन्ना बेचने के लिए मजबूर हो रहे हैं।
किसानों की बात
किसान गंगाराम ने बताया कि क्षेत्र में चीनी मिल होने से कई फायदे मिलते हैं। ओसवाल मिल के केंद्र दूसरी चीनी मिल से संबद्ध होने पर गन्ने की तौल हो जाती है, मगर भुगतान सहित अन्य शिकायतों के लिए लंबा सफर करके संबंधित चीनी मिल तक जाना पड़ता है। क्षेत्र के विकास के लिए भी जरूरी है कि चीनी मिल संचालित हो।
किसान हरपाल ने कहा कि भुगतान न मिलने से बेटे-बेटियों की शादी के लिए कर्ज लेना पड़ रहा है। चीनी मिल बंद होना नवाबगंज क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की भी नाकामी है। मिल बंद होने से किसानों को हो रही दिक्कतों को शासन तक पहुंचाना जनप्रतिधियों का काम है, पर वह यहां पर भी नाकाम साबित हो रहे हैं।
जमीन की नीलामी भी फंसी
केसर चीनी मिल की मुड़िया मुकर्रमपुर स्थित करीब साढ़े ग्यारह एकड़ जमीन 28.5 करोड़ रुपये में 31 मई को नीलाम हुई थी। क्षेत्र के लोगों ने नीलामी औने-पौने दाम पर करने का आरोप लगाया। इसके बाद जिलाधिकारी अविनाश कुमार सिंह ने इस नीलामी को रद्द कर दिया। दोबारा होने वाली नीलामी सर्किल रेट को लेकर फंस गई है। प्रशासन का कहना था एक अगस्त को नए सर्किट रेट जारी होने के बाद इस जमीन की नीलामी कराई जाएगी। अब तक नए सर्किल रेट ही तय नहीं हुए हैं। दूसरी ओर प्रबंधन चीनी मिल बेचने की तैयारी में है, मगर इसमें भी कामयाबी नहीं मिल रही।
अपने-अपने तर्क
केसर चीनी मिल के सीईओ शरद मिश्र ने कहा कि जमीन बंधक बनाकर सरकार ब्याज पर हमें ऋण देकर इस संकट का हल निकाल सकती है। भुगतान न मिलने को लेकर किसान आक्रोशित जरूर हैं, मगर वह भी नहीं चाहते कि क्षेत्र में चीनी मिल बंद हो। हम भी मिल संचालित करना चाहते हैं।
जिला गन्ना अधिकारी दिलीप कुमार सैनी का कहना है कि चीनी मिल को ऋण देना इस संकट का समाधान नहीं है। प्रदेश की कई चीनी मिलों पर बकाया है। सरकार सभी को आर्थिक सहायता नहीं दे सकती। इससे गलत परिपाटी पड़ेगी। चीनी मिल ने गन्ना खरीदा है तो भुगतान उसे ही करना होगा।