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Bijnor News: एकल परिवार और मोबाइल पर खेल से छोटे बच्चों में बढ़ रहा ऑटिज्म
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बिजनौर। अगर, बच्चा सुस्त रहता है या बात नहीं करता तो यह कोई आम समस्या नहीं है। नजरअंदाज करने पर बच्चे ऑटिज्म (ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर) के शिकार हो रहे हैं। देरी से पहचान होने पर इलाज में देरी हो रही है। एकल परिवार और मोबाइल पर खेल से बच्चे ऑटिज्म की चपेट में आ रहे हैं। मेडिकल कॉलेज में इस समस्या के हर महीने 15 मरीज पहुंच रहे हैं।
मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. नितिन कुमार ने बताया कि ऑटिज्म कोई मानसिक कमजोरी या पालन-पोषण की गलती नहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है। इसमें बच्चे के संवाद, सामाजिक व्यवहार, व्यावहारिक पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए, समय रहते इलाज जरूरी है। सामने आया रहा है शुरूआत में परिवार के लोगों ने ध्यान नहीं दिया। बच्चा स्कूल पहुंचा तो समस्या पती चली, अब उसकी स्पीच थेरेपी चल रही है।
केस एक : बिजनौर निवासी दो वर्षीय बच्चा नाम पुकारने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता था। परिवार ने सुनने की क्षमता की जांच कराई लेकिन रिपोर्ट सामान्य मिली। आंख में आंख डालकर कम देखता है, इशारे कम करता है और अपनी जरूरत बताने के लिए दूसरों से जुड़ने की बजाय हाथ पकड़कर चीज तक ले जाता है। आगे मूल्यांकन में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर की संभावना पाई गई।
केस दो : बिजनौर निवासी चार वर्षीय बच्चे को लेकर परिजन अस्पताल पहुंचे। वह बार-बार एक ही खिलौने को घुमाने, पहियों को लगातार देखते रहने और दिनचर्या में छोटे बदलाव पर बहुत ज्यादा परेशान होने की समस्या है। बच्चा कुछ शब्द बोलता था, लेकिन सार्थक बातचीत नहीं करता था। समय पर ऑटिज्म की पहचान के बाद स्पीच थेरेपी और व्यावहारिक हस्तक्षेप शुरू किया गया।
मानसिक रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज, बिजनौर के डॉ. नितिन कुमार का कहना है कि ऑटिज्म की समस्या ठीक हो सकती है। समय से पहचान होने पर इलाज कराना बेहद जरूरी है।
हर उम्र के हिसाब से बच्चों को ऑटिज्म के लक्षण अलग-अलग दिखाई देते हैं। इसलिए, बच्चों का ध्यान रखें और चिकित्सक से परामर्श लेकर इलाज शुरू कराएं।
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मेडिकल कॉलेज के मानसिक रोग विशेषज्ञ डॉ. नितिन कुमार ने बताया कि ऑटिज्म कोई मानसिक कमजोरी या पालन-पोषण की गलती नहीं है, बल्कि यह मस्तिष्क के विकास से जुड़ी एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है। इसमें बच्चे के संवाद, सामाजिक व्यवहार, व्यावहारिक पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए, समय रहते इलाज जरूरी है। सामने आया रहा है शुरूआत में परिवार के लोगों ने ध्यान नहीं दिया। बच्चा स्कूल पहुंचा तो समस्या पती चली, अब उसकी स्पीच थेरेपी चल रही है।
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केस एक : बिजनौर निवासी दो वर्षीय बच्चा नाम पुकारने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता था। परिवार ने सुनने की क्षमता की जांच कराई लेकिन रिपोर्ट सामान्य मिली। आंख में आंख डालकर कम देखता है, इशारे कम करता है और अपनी जरूरत बताने के लिए दूसरों से जुड़ने की बजाय हाथ पकड़कर चीज तक ले जाता है। आगे मूल्यांकन में ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर की संभावना पाई गई।
केस दो : बिजनौर निवासी चार वर्षीय बच्चे को लेकर परिजन अस्पताल पहुंचे। वह बार-बार एक ही खिलौने को घुमाने, पहियों को लगातार देखते रहने और दिनचर्या में छोटे बदलाव पर बहुत ज्यादा परेशान होने की समस्या है। बच्चा कुछ शब्द बोलता था, लेकिन सार्थक बातचीत नहीं करता था। समय पर ऑटिज्म की पहचान के बाद स्पीच थेरेपी और व्यावहारिक हस्तक्षेप शुरू किया गया।
मानसिक रोग विशेषज्ञ, मेडिकल कॉलेज, बिजनौर के डॉ. नितिन कुमार का कहना है कि ऑटिज्म की समस्या ठीक हो सकती है। समय से पहचान होने पर इलाज कराना बेहद जरूरी है।
हर उम्र के हिसाब से बच्चों को ऑटिज्म के लक्षण अलग-अलग दिखाई देते हैं। इसलिए, बच्चों का ध्यान रखें और चिकित्सक से परामर्श लेकर इलाज शुरू कराएं।