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Bijnor News: मगफिरत, सखावत और इंसानियत का पैगाम देता है दूसरा अशरार
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नजीबाबाद। उलमा फरमाते हैं मुकद्दस रमजान के तीनों अशरों की खास अहमियत है। रहमतों और बरकतों के रमजान महीने में इबादत करने वालों की जिंदगी बदल जाती है। खुदा की बंदगी गुनाहों को मुआफ कराती है।
जमीयत उलमा - हिंद के जिला जनरल सेक्रेट्री मुफ्ती मौ. अरशद कासमी फरमाते हैं कि मुकद्दस रमजान का दूसरा अशरा चल रहा है यह अशरा मगफिरत ,सखावत और इंसानियत का पैगाम देता है।हदीस में बताया गया है रमजान के पहले दस दिन रहमत के, दूसरे दस दिन मगफिरत यानी माफी के और आखिरी दस दिन जहन्नम से निजात के होते हैं। इसलिए इस वक्त अपने गुनाहों की माफी मांगने, तौबा करने और अपने अमल को बेहतर बनाने का सबसे अच्छा मौका है।
रमजान का यह अशरा हमें जकात और सदकात की अहमियत भी याद दिलाता है। जकात इस्लाम के बुनियादी फर्जों में एक है। इसका मकसद सिर्फ दान देना नहीं, बल्कि समाज में हमदर्दी, बराबरी और सहयोग के जज्बे को मजबूत बनाना है। जब साहिबे-निसाब लोग ईमानदारी और दिल से अपनी जकात अदा करते हैं तो उनका माल भी पाक होता है और समाज के गरीब व जरूरतमंद लोगों को सहारा भी मिलता है। मुफ्ती अरशद फरमाते हैं इसी तरह सदका-ए-फित्र की अदायगी बहुत अहम है। कोई भी गरीब इंसान ईद की खुशियों से महरूम न रह जाए। इसलिए जो लोग सक्षम हैं वह लोग आसपास के जरूरतमंद का खास ख्याल रखें ताकि वे भी ईद की खुशियों में शरीक हो सकें।
हकीमान मस्जिद मुगलूशाह के पेश इमाम मुफ्ती मो. असअद कासमी का कहना है रमजान मुबारक के कीमती और बरकतों से भरे हुए पल तेजी से गुजर रहे हैं। इन लम्हों की कद्र करें, इबादत में बढ़ोतरी करें, क़ुरआन से अपना रिश्ता मजबूत करें और अल्लाह से दुआ व इस्तिगफार का एहतिमाम करते रहें। जहन्नुम से निजात के लिए आखिरी अशरे में खास इबादत की जरूरत होती है। जो बंदे अल्लाह से लौ लगाते हैं, कुरान को सीने में उतरते हैं, पूरे रमजान इबादत करते हैं उनके गुनाहों को अल्लाह ताला मुआफ फरमाते हैं। मुफ्ती असद कहते हैं जहन्नुम से निजाद पाने के लिए मुकद्दस रमजान खासोआम महीना है।रमजान सिर्फ इबादत का महीना नहीं है, बल्कि इंसानियत, मोहब्बत और भाईचारे का भी पैगाम देता है।
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जमीयत उलमा - हिंद के जिला जनरल सेक्रेट्री मुफ्ती मौ. अरशद कासमी फरमाते हैं कि मुकद्दस रमजान का दूसरा अशरा चल रहा है यह अशरा मगफिरत ,सखावत और इंसानियत का पैगाम देता है।हदीस में बताया गया है रमजान के पहले दस दिन रहमत के, दूसरे दस दिन मगफिरत यानी माफी के और आखिरी दस दिन जहन्नम से निजात के होते हैं। इसलिए इस वक्त अपने गुनाहों की माफी मांगने, तौबा करने और अपने अमल को बेहतर बनाने का सबसे अच्छा मौका है।
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रमजान का यह अशरा हमें जकात और सदकात की अहमियत भी याद दिलाता है। जकात इस्लाम के बुनियादी फर्जों में एक है। इसका मकसद सिर्फ दान देना नहीं, बल्कि समाज में हमदर्दी, बराबरी और सहयोग के जज्बे को मजबूत बनाना है। जब साहिबे-निसाब लोग ईमानदारी और दिल से अपनी जकात अदा करते हैं तो उनका माल भी पाक होता है और समाज के गरीब व जरूरतमंद लोगों को सहारा भी मिलता है। मुफ्ती अरशद फरमाते हैं इसी तरह सदका-ए-फित्र की अदायगी बहुत अहम है। कोई भी गरीब इंसान ईद की खुशियों से महरूम न रह जाए। इसलिए जो लोग सक्षम हैं वह लोग आसपास के जरूरतमंद का खास ख्याल रखें ताकि वे भी ईद की खुशियों में शरीक हो सकें।
हकीमान मस्जिद मुगलूशाह के पेश इमाम मुफ्ती मो. असअद कासमी का कहना है रमजान मुबारक के कीमती और बरकतों से भरे हुए पल तेजी से गुजर रहे हैं। इन लम्हों की कद्र करें, इबादत में बढ़ोतरी करें, क़ुरआन से अपना रिश्ता मजबूत करें और अल्लाह से दुआ व इस्तिगफार का एहतिमाम करते रहें। जहन्नुम से निजात के लिए आखिरी अशरे में खास इबादत की जरूरत होती है। जो बंदे अल्लाह से लौ लगाते हैं, कुरान को सीने में उतरते हैं, पूरे रमजान इबादत करते हैं उनके गुनाहों को अल्लाह ताला मुआफ फरमाते हैं। मुफ्ती असद कहते हैं जहन्नुम से निजाद पाने के लिए मुकद्दस रमजान खासोआम महीना है।रमजान सिर्फ इबादत का महीना नहीं है, बल्कि इंसानियत, मोहब्बत और भाईचारे का भी पैगाम देता है।
