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बदायूं दोहरा हत्याकांड: फायदे का सौदा था एचपीसीएल का सीबीजी प्लांट, रसूखदारों ने फेरा पानी

अमर उजाला ब्यूरो, बदायूं Published by: Mukesh Kumar Updated Thu, 19 Mar 2026 05:02 PM IST
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सार

बदायूं में जिस एचपीसीएल बायोगैस प्लांट में दो अफसरों की हत्या की गई, वह स्थानीय किसानों, बेरोजगारों से लेकर उद्यमियों तक के लिए फायदे की सोच से विकसित किया गया। सूत्र बताते हैं कि बायो वेस्ट के ठेके में आरोपी अजय प्रताप सिंह मनमानी कर रहा था। इस बात को लेकर भी उसका दोनों अफसरों से काफी विवाद हुआ था। जिसके चलते उसने दोनों अफसरों की हत्या कर दी। 

HPCL CBG Plant Was a Profitable Venture—Influential Figures Thwarted It in Budaun
एचपीसीएल प्लांट में हुआ था दोहरा हत्याकांड - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार

बदायूं के सैंजनी गांव स्थित एचपीसीएल बायो गैस प्लांट स्थानीय किसानों, बेरोजगारों से लेकर उद्यमियों तक के लिए फायदे की सोच से विकसित किया गया था। पराली जलाने से होने वाला पर्यावरण प्रदूषण भी दूर हो गया था, बावजूद इसके रसूखदारों व मनबढ़ कामगारों की मनमानी से प्लांट दो साल से घाटे में जा रहा था। कुछ महीन पहले कंपनी के अफसरों ने सख्ती की तो प्लांट मुनाफे की ओर बढ़ा, जो कई लोगों को रास नहीं आया और नौबत दोहरे हत्याकांड तक जा पहुंची।

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गौरतलब है कि मूसाझाग थाना क्षेत्र के सैंजनी गांव स्थित हिंदुस्तान पेट्रोलियम के कम्प्रेस्ड बायोगैस प्लांट में उप महाप्रबंधक सुधीर कुमार गुप्ता व सहायक मुख्य प्रबंधक हर्षित मिश्रा की 12 मार्च को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड के आरोपी अजय प्रताप सिंह को जेल भेजा चुका है। उसके परिवारवाले भागे हुए हैं। मंगलवार को आरोपी और उसके ताऊ की 11 दुकानों को बुलडोजर से ढहा दिया गया था।  
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एचपीसीएल के बायो गैस प्लांट में पराली में केमिकल मिलाकर पूरी प्रक्रिया से तैयार होने वाली कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) को सीएनजी (नेचुरल कंप्रेस्ड गैस) की तरह पंप पर वाहनों के संचालन में उपयोग किया जाता है। विदेशों से पेट्रोल की आवक पर निर्भरता कम करने के लिए केंद्र सरकार देश में इस तरह के प्रोजेक्ट लगाने के लिए सरकारी व निजी क्षेत्र की कंपनियों को प्रोत्साहन दे रही है। सामान्य तौर पर किसान पराली को खेत में ही जलाते थे, जिससे किसान को लाभ तो नहीं होता था। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण का खतरा बढ़ जाता था।  

किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की थी सोच 
पराली जैसे देसी उत्पाद से गैस बनाकर किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की सोच थी। इसके अलावा प्लांट से निकले बायो वेस्ट को भी खाद के रूप में किसानों को बेहद कम दाम में उपलब्ध कराया जा रहा था। जानकारों से बात की तो पता लगा कि प्लांट को ईमानदारी से चलाया जाता तो उससे प्रबंधन को करीब ढ़ाई गुना आमदनी होती। इसके बावजूद हर ठेके व आयात-निर्यात में मनमानी की मंशा पूरी न हो पाने से रसूखदार विचलित थे। उनके इशारे पर आरोपी अजय प्रताप सिंह जैसे मनबढ़ों ने दोनों अधिकारियों को गोली मारकर रास्ते से हटा दिया।

बायो वेस्ट खाद के ठेके में मनमानी पर रुकावट से उपजा विवाद
जानकारों ने बताया कि एक क्विंटल पराली में करीब 14 किलो गैस बनती है। इस लिहाज से करीब 14 हजार किलो गैस प्रतिदिन बनाई जा रही थी। महीने के लिहाज से कमाई पर गौर करें तो करीब साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा की गैस प्रतिमाह बेची जा रही थी। पराली से गैस मिलने के बाद करीब 70 फीसदी हिस्सा बायो वेस्ट के रूप में निकलता है जो खाद के रूप में बेचा जा रहा था। यह किसानों को केवल ढाई रुपये प्रति किलो की दर से बेची जा रही थी और इस लिहाज से करीब पचास लाख रुपये प्रतिमाह अलग कमाई हो रही थी। सूत्र बताते हैं कि बायो वेस्ट के ठेके में अजय प्रताप सिंह मनमानी कर रहा था। इस बात को लेकर भी उसका दोनों अफसरों से काफी विवाद हुआ था।

इस तरह हो रहा था प्लांट में आयात
प्लांट संचालन में प्रतिदिन करीब सौ टन (एक हजार क्विंटल) पराली की जरूरत होती है। इसका खरीद रेट 340 रुपये प्रति क्विंटल तय है, जो करीब 16 एग्रीगेटर के जरिये पूरा किया जा रहा था। पराली स्थानीय स्तर पर बेहद कम मिल पा रही थी, लेकिन शाहजहांपुर, पीलीभीत आदि स्थानों से इसे खरीदकर प्लांट को उपलब्ध कराया जाता रहा है। इस लिहाज से करीब एक करोड़ 33 लाख रुपये की पराली प्रतिमाह खरीदी जाती थी। माल की लोडिंग व अनलोडिंग का ठेका एक अलग व्यक्ति का हो गया था। उससे अजय व उसके साथियों के ज्यादा अच्छे संबंध नहीं बन पाए। 

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