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Varanasi News: व्योमेश शुक्ल बोले- पहले गंगा को गंदा करें फिर उसे साफ, क्यों न पहले ही मलजल रोक दें; व्याख्यान

Sun, 09 Aug 2026 05:52 AM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sun, 09 Aug 2026 05:52 AM IST
सार

Varanasi News: प्रयागराज के युवा लेखकों और साहित्य-प्रेमियों का समूह बौद्धिक भ्रमण के तहत नागरी प्रचारिणी सभा पहुंचा। सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने ‘नदी, नगर और सभ्यता’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि पहले गंगा को गंदा करें, फिर उसे साफ करने से बेहतर है कि मलजल को नदी में जाने से ही रोका जाए। फोटो जरूरी।

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Varanasi News Vyomesh Shukla asks pollute Ganga first and clean it up not the sewage inflow source
व्याख्यान में जानकारी देते व्योमेश शुक्ल। - फोटो : संवाद

विस्तार

प्रयागराज के युवा लेखकों और साहित्य प्रेमियों का एक समूह बौद्धिक भ्रमण के तहत शनिवार को नागरीप्रचारिणी सभा के आर्यभाषा पुस्तकालय पहुंचा। आजाद रीड्स की ओर से आयोजित भ्रमण के दौरान सभा के प्रधानमंत्री व्योमेश शुक्ल ने ‘नदी, नगर और सभ्यता’ विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने काशी, गंगा और भारतीय सभ्यता के आपसी संबंधों को रेखांकित करते हुए कहा कि काशी तीर्थ इसलिए है, क्योंकि वहां पानी है। पानी वह जादू है, जिसे किसी जगह में जोड़ दीजिए तो वह तीर्थ बन जाती है। बनारस का जादू गंगा हैं।

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व्योमेश शुक्ल ने कहा कि पेस्टिसाइड्स, बैक्टीरियोफेज और जल की शुद्धता जांचने के अन्य मानक पश्चिमी पैमाने हैं। पश्चिम में नदी और जल की सफाई की कोई आध्यात्मिक हैसियत नहीं है। वहां पीने, नहाने, समुद्र और स्वीमिंग पूल के पानी के लिए अलग-अलग मानक निर्धारित हैं। इसके विपरीत भारतीय जीवन में चीजें इस तरह विभाजित नहीं रही हैं। गंगाजल के संदर्भ में यह बात और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि हिंदू मन में गंगा का स्थान बेहद ऊंचा है।
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उन्होंने कहा कि करीब एक हजार वर्ष पहले आचार्य शंकर ने गंगा की स्तुति में कविता लिखी थी। उसके बाद से आज तक न जाने कितनी कहानियां और अनगिनत भाषाओं की कविताएं गंगा की परिक्रमा करती रही हैं। यह नदी भारतीय समाज और उसकी सांस्कृतिक चेतना का अभिन्न हिस्सा है।

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व्योमेश शुक्ल ने कहा कि हमारा घमंड पश्चिम की देन है। सवाल यह है कि क्या हम भारत को यूरोप बना देना चाहते हैं। उन्होंने गंगा प्रदूषण पर चिंता जताते हुए कहा कि पहले पानी को गंदा करना और फिर उसे साफ करने की कोशिश करना उचित तरीका नहीं है। यदि गंगा हमारी धार्मिकता का मुकुट हैं तो उनमें अवजल क्यों मिलाया जाता है।

उन्होंने कहा कि इसका निदान स्पष्ट है। मलजल को नदियों में नहीं बहाया जाना चाहिए, बल्कि उसके निस्तारण की अलग व्यवस्था हो। गंगा को डस्टबिन की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

इससे पहले युवा लेखकों के दल ने नागरीप्रचारिणी सभा परिसर में स्थापित तीनों कला दीर्घाओं का अवलोकन किया। कार्यक्रम में अक्षत, राघव, तापस, विनायक, स्वाति, अपूर्वा, आकाश, विशाल, शाश्वत, त्रयी और तरुण आदि मौजूद रहे।

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