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कैसर-ए-हिंद: 15 साल बाद फिर 'सरकार बहादुर' की हुई नजूल की 4 एकड़ जमीन, 21 लोगों की खरीद-बिक्री रद्द

Wed, 15 Jul 2026 01:08 PM IST
Rohit Singh चंद्रकेतु सिंह/ अभिमन्यु राय, बांसगांव/कौड़ीराम
चंद्रकेतु सिंह/ अभिमन्यु राय, बांसगांव/कौड़ीराम Published by: Rohit Singh Updated Wed, 15 Jul 2026 01:08 PM IST
सार

आजादी से पहले, जो जमीनें ब्रिटिश सरकार के अधीन थीं और उनका उपयोग केंद्र सरकार या राज्य सरकार करती थी, उन्हें कैसर-ए-हिंद ज़मीन माना जाता है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के बाद, इन जमीनों का स्वामित्व उपयोग के आधार पर या तो केंद्र सरकार या संबंधित राज्य सरकार के पास आ गया।

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After 15 years, 4 acres of Nazul land in the Kauriram-Bansgaon area have once again under government control.
नजूल की जमीन पर बनी दुकानें और घर - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

कूटरचित दस्तावेजों के जरिए बेची गई चार एकड़ जमीन 15 साल बाद फिर सरकार बहादुर कैंसर हिंद की हो गई है। एसडीएम बांसगांव की कोर्ट ने इस मामले में 2011 में जमीन अपने नाम कराने वालों के पक्ष में हुए आदेश को निरस्त करते हुए इसे सरकार की जमीन बताया है। यह करोड़ों की बेशकीमती जमीन बांसगांव तहसील के रानीपुर गांव में है। नजूल की इस जमीन पर दुकानें और अस्पताल खुल चुके हैं।

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बांसगांव तहसील के रानीपुर गांव में नजूल की करीब चार एकड़ जमीन का बंदरबांट कुछ लोगों ने राजस्वकर्मियों की मिलीभगत से कर ली। कूटरचित दस्तावेज के जरिये राजस्व अभिलेखों में हेरफेर करते हुए करोड़ों की बेशकीमती जमीन को अपने नाम करा लिया और बाद में 21 लोगों को बेच दिया गया।

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ये जमीनें कौड़ीराम कस्बे के पास और गोरखपुर-बड़हलगंज रोड के किनारे हैं। वर्ष 2007 में में प्रशासन की ओर से कराए गए सर्वे रिपोर्ट में सामने आया था कि रानीपुर गांव में अराजी नंबर 22 क में .586 हेक्टेयर, 22 ख में .583 हेक्टेयर, 41 में .101 हेक्टेयर व 110 में .03 एकड़ जमीन सरकार बहादुर, कैंसर हिन्द नं. 1 यानी सरकार की भूमि है।

दस्तावेजों में सात लोगों का नाम अंकित है। जबकि किसी व्यक्ति को भूमिधरी अधिकार नहीं मिल सकता है। इस रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन एसडीएम रामशिरोमणि मौर्य ने सभी लोगों का नाम दस्तावेज से निरस्त करते हुए दाखिल-खारिज कर सरकार की जमीन अंकित करने का निर्देश दिया। साथ दोषी राजस्वकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा।

इस आदेश के खिलाफ कब्जेदारों ने कायिमी (अपील ) दाखिल किया। इसके बाद भी जमीनों का नामांतरण दूसरे के नाम होता रहा। प्रशासन की ओर से लापरवाही पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

वर्ष 2021 में तत्कालीन एसडीएम ने 2008 में हुए आदेश को निरस्त करते हुए कब्जेदारों के पक्ष में फैसला सुनाया। इसके खिलाफ शासकीय अधिवक्ता ने वाद दाखिल करते हुए अपील की। अब इस मामले में सुनवाई के बाद 27 अप्रैल 2026 एसडीएम बांसगांव का फैसला आया है, जिसमें उन्होंने 2011 के फैसले का निरस्त करते हुए 2008 के आदेश को बहाल कर दिया है। 
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जानिए, क्या है सरकार बहादुर, कैंसर हिंद
आजादी से पहले, जो जमीनें ब्रिटिश सरकार के अधीन थीं और उनका उपयोग केंद्र सरकार या राज्य सरकार करती थी, उन्हें कैसर-ए-हिंद ज़मीन माना जाता है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान लागू होने के बाद, इन जमीनों का स्वामित्व उपयोग के आधार पर या तो केंद्र सरकार या संबंधित राज्य सरकार के पास आ गया। कैसर-ए-हिंद की जमीन पूर्ण रूप से सरकारी होती है। इसे किसी भी निजी व्यक्ति, संस्था या जमींदार द्वारा बेचा या खरीदा नहीं जा सकता।

नजूल की जमीन पर कुछ लोगों के काबिज होने की सुनवाई चल रही थी। जिनका नाम दस्तावेज में अंकित है उन्हें बुलाया गया था पर वे नहीं आए। साक्ष्य और दस्तावेजों के आधार एक पक्षीय आदेश देते हुए वर्ष 2008 के निर्णय को बहाल किया गया है: प्रदीप कुमार सिंह, तत्कालीन एसडीएम बांसगांव
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