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Etah News: ग्रेनेड हमले में हुए अपाहिज, हौसला आज भी बरकरार
Sun, 26 Jul 2026 01:02 AM IST
आगरा ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
संवाद न्यूज एजेंसी, एटा
Updated Sun, 26 Jul 2026 01:02 AM IST
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कारिगल युद्ध में दिव्यांग हुए कमांडो मुकेश कुमार अब व्हील चेयर के सहारे जीनव बिता रहे हैं। संवा
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एटा। कारगिल युद्ध में भारतीय सेना के पराक्रम को कभी भुलाया नहीं जा सकता। ऊंचाई पर बैठी पाकिस्तानी सेना को खदेड़कर भारतीय सेना ने विजय हासिल की। जिसे हम सभी प्रतिवर्ष 26 जुलाई को उत्सव के रूप में मनाते हैं। इस युद्ध में एटा के जवानों का भी योगदान रहा। दो जवानों का बलिदान भी हुआ। युद्ध में गोलियां और ग्रेनेड हमले से घायल हुए एटा के मुकेश कुमार, अब व्हील चेयर के सहारे जीवन काट रहे हैं। युद्ध की यादें ताजा होने पर वह जोश से लवरेज हो जाते हैं।
सकीट क्षेत्र के गांव नाजिरपुर निवासी मुकेश कुमार लोधी वर्ष 1995 में सेना में बतौर जवान भर्ती हुए थे। उनकी पहली पोस्टिंग फिरोजपुर बार्डर पर हुई। तीन वर्ष यहां रहने के बाद जम्मू-कश्मीर में पोस्ट हो गए। मेहनत और कठिन ट्रेनिंग के बाद उन्हें कमांडो की जिम्मेदारी सौंपी गई। । वर्ष 1999 में जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो उनकी पोस्टिंग पुंछ सेक्टर में थी। अन्य सैनिकों के साथ वह भी कारगिल के लिए रवाना हुए। मुकेश कुमार बताते हैं कि युद्ध में उन्होंने कई पाक सैनिक मार गिराए। 18 जुलाई 1999 की रात करीब आठ बजे एलओसी के पास बिंबरगली इलाके में सेना के अफसर युद्ध के संबंध में ब्रीफिंग कर रहे थे। वहां मुकेश कुमार भी मौजूद थे। तभी पाकिस्तान ने रोशनी का अंदेशा लगाकर आरपीजी (रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड) से हमला किया। इसके बाद गोलीबारी की। ग्रेनेड का स्पिलिंटर उनके शरीर में घुस गए। घुटने के पास दो गोलियां लगीं। इस हमले में हवलदार शेर सिंह और नायक प्रेम सिंह नेगी और एक अन्य साथी भी घायल हुए। उपचार के दौरान उन्हें वीरगति प्रादन हुई। मुकेश कुमार ने मौत को मात देते हुए नया जीवन पाया। उनके शरीर में इंफेक्शन फैल गया। लंबा इलाज चला, जिसमें लाखों रुपये खर्च हुए। कुछ वर्ष बाद फिर से इंफेक्शन फैला और इलाज के दौरान कोई नस ब्लॉक होने से कमर से नीचे का हिस्सा पैरालाइज हो गया।
अब व्हीलचेयर पर चल रही जिंदगी
मुकेश कुमार अब व्हील चेयर के सहारे जीवन काट रहे हैं। कहीं आने जाने के लिए तीन पहिया का स्कूटी या फिर कार का इस्तेमाल करते हैं। कारगिल युद्ध की बातें करते हुए वह आज भी जोश से भर जाते हैं। उन्हें आज भी देश सेवा का जुनून है।
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कारगिल के योद्धाओं में सूबेदार ने पहुंचाए गोला-बारूद
एटा। गांव नयाबांस निवासी सूबेदार विजय सिंह ने भी कारगिल युद्ध बड़ी जिम्मेदारी निभाई। युद्ध के समय वह सेना सेवा काेर में थे। लॉजिस्टिक से जुड़े कार्याें की उन पर जिम्मेदारी थी। युद्ध के दौरान उनकी पोस्टिंग 503 एएससी बटालियन लेह में थी। उन्हें बटालियन के साथ कारगिल भेजा गया। हन्नू थांग, अचीना थांग के पास बेस पर वह रहे। यहां से सेना के जवानों के लिए गोदा-बारूद पहुंचाने की जिम्मेदार उन्हें मिली। उनके साथ अन्य जवान भी थे। हेलीकॉप्टर से सेना के बेस तक गोला-बारूद, खाना पहुंचाते थे। वहीं युद्ध में जान गंवाने वाले या फिर घायल होने वाले सैनिकों को हेलीकॉप्टर से अस्पताल तक पहुंचाने का काम उन्होंने किया।
कारगिल युद्ध में एटा के दो जवानों की मिली थी वीरगति
एटा। वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में एटा के दो रणबांकुरों का नाम हमेशा के लिए अमर हो गया। युद्ध लड़ते हुए उनका बलिदान हुआ। आज भी उनके शौर्य की चर्चाएं गांव वाले करते हैं। इनमें जैथरा कठिंगरा निवासी कैप्टन सुनील कुमार और गांव घिलौआ निवासी जवान पीके यादव शामिल हैं। उनके बलिदान की खबर जब आई थी तो पूरा गांव रोया था। वहीं गर्व से सीना भी चौड़ा हुआ था। दोनों बलिदानियों के नाम सैनिक कल्याण बोर्ड कार्यालय पर लगे वीर स्थल पर दर्ज हैं। उनके परिजन अब आगरा में रह रहे हैं।
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सकीट क्षेत्र के गांव नाजिरपुर निवासी मुकेश कुमार लोधी वर्ष 1995 में सेना में बतौर जवान भर्ती हुए थे। उनकी पहली पोस्टिंग फिरोजपुर बार्डर पर हुई। तीन वर्ष यहां रहने के बाद जम्मू-कश्मीर में पोस्ट हो गए। मेहनत और कठिन ट्रेनिंग के बाद उन्हें कमांडो की जिम्मेदारी सौंपी गई। । वर्ष 1999 में जब कारगिल युद्ध शुरू हुआ तो उनकी पोस्टिंग पुंछ सेक्टर में थी। अन्य सैनिकों के साथ वह भी कारगिल के लिए रवाना हुए। मुकेश कुमार बताते हैं कि युद्ध में उन्होंने कई पाक सैनिक मार गिराए। 18 जुलाई 1999 की रात करीब आठ बजे एलओसी के पास बिंबरगली इलाके में सेना के अफसर युद्ध के संबंध में ब्रीफिंग कर रहे थे। वहां मुकेश कुमार भी मौजूद थे। तभी पाकिस्तान ने रोशनी का अंदेशा लगाकर आरपीजी (रॉकेट-प्रोपेल्ड ग्रेनेड) से हमला किया। इसके बाद गोलीबारी की। ग्रेनेड का स्पिलिंटर उनके शरीर में घुस गए। घुटने के पास दो गोलियां लगीं। इस हमले में हवलदार शेर सिंह और नायक प्रेम सिंह नेगी और एक अन्य साथी भी घायल हुए। उपचार के दौरान उन्हें वीरगति प्रादन हुई। मुकेश कुमार ने मौत को मात देते हुए नया जीवन पाया। उनके शरीर में इंफेक्शन फैल गया। लंबा इलाज चला, जिसमें लाखों रुपये खर्च हुए। कुछ वर्ष बाद फिर से इंफेक्शन फैला और इलाज के दौरान कोई नस ब्लॉक होने से कमर से नीचे का हिस्सा पैरालाइज हो गया।
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अब व्हीलचेयर पर चल रही जिंदगी
मुकेश कुमार अब व्हील चेयर के सहारे जीवन काट रहे हैं। कहीं आने जाने के लिए तीन पहिया का स्कूटी या फिर कार का इस्तेमाल करते हैं। कारगिल युद्ध की बातें करते हुए वह आज भी जोश से भर जाते हैं। उन्हें आज भी देश सेवा का जुनून है।
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कारगिल के योद्धाओं में सूबेदार ने पहुंचाए गोला-बारूद
एटा। गांव नयाबांस निवासी सूबेदार विजय सिंह ने भी कारगिल युद्ध बड़ी जिम्मेदारी निभाई। युद्ध के समय वह सेना सेवा काेर में थे। लॉजिस्टिक से जुड़े कार्याें की उन पर जिम्मेदारी थी। युद्ध के दौरान उनकी पोस्टिंग 503 एएससी बटालियन लेह में थी। उन्हें बटालियन के साथ कारगिल भेजा गया। हन्नू थांग, अचीना थांग के पास बेस पर वह रहे। यहां से सेना के जवानों के लिए गोदा-बारूद पहुंचाने की जिम्मेदार उन्हें मिली। उनके साथ अन्य जवान भी थे। हेलीकॉप्टर से सेना के बेस तक गोला-बारूद, खाना पहुंचाते थे। वहीं युद्ध में जान गंवाने वाले या फिर घायल होने वाले सैनिकों को हेलीकॉप्टर से अस्पताल तक पहुंचाने का काम उन्होंने किया।
कारगिल युद्ध में एटा के दो जवानों की मिली थी वीरगति
एटा। वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में एटा के दो रणबांकुरों का नाम हमेशा के लिए अमर हो गया। युद्ध लड़ते हुए उनका बलिदान हुआ। आज भी उनके शौर्य की चर्चाएं गांव वाले करते हैं। इनमें जैथरा कठिंगरा निवासी कैप्टन सुनील कुमार और गांव घिलौआ निवासी जवान पीके यादव शामिल हैं। उनके बलिदान की खबर जब आई थी तो पूरा गांव रोया था। वहीं गर्व से सीना भी चौड़ा हुआ था। दोनों बलिदानियों के नाम सैनिक कल्याण बोर्ड कार्यालय पर लगे वीर स्थल पर दर्ज हैं। उनके परिजन अब आगरा में रह रहे हैं।

कारिगल युद्ध में दिव्यांग हुए कमांडो मुकेश कुमार अब व्हील चेयर के सहारे जीनव बिता रहे हैं। संवा

कारिगल युद्ध में दिव्यांग हुए कमांडो मुकेश कुमार अब व्हील चेयर के सहारे जीनव बिता रहे हैं। संवा