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Etawah News: हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा पर चर्चा
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फोटो 36::::पंचायती राज महाविद्यालय में संबाेधित करते डीएम शुभ्रांत कुमार शुक्ल। स्रोत स्वयं
पंचायती राज में किया गया कार्यक्रम का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
इटावा। पंचायत राज राजकीय स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय रविवार को ‘हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा: विविध आयाम’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया। देश के विभिन्न भागों से आए विद्वानों, शोधार्थियों व छात्राओं ने सहभागिता की और हिंदी सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि डीएम शुभ्रांत शुक्ल ने कहा कि सिनेमा जैसे विषय पर इस उत्कृष्ट सोच के साथ अकादमिक कार्यक्रम करना और उसे शैक्षणिक वातावरण से जोड़ना बहुत सराहनीय कार्य है। उन्होंने इस विषय को गंभीरता से लेने की आवश्यकता पर बल दिया। अध्यक्षता पूर्व क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी प्रो. रिपुदमन सिंह ने की। उन्होंने कहा कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज का दर्पण भी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सिनेमा समाज की वास्तविकताओं को प्रस्तुत करने के साथ-साथ समाज को प्रभावित करने की क्षमता भी रखता है। सिनेमा और समाज के बीच गहरा अंतर्संबंध है, जो समय के साथ और अधिक सशक्त होता गया है।
प्रथम सत्र में बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर से आए डॉ. गौरव तिवारी ने सिनेमा को सभी ललित कलाओं का समन्वित रूप बताया। उन्होंने कहा कि सिनेमा में साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला और नाट्य जैसे विभिन्न कलात्मक तत्वों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि बताया कि भारत में सर्वप्रथम फिल्मों का प्रदर्शन लुमियरे बंधु की ओर किया गया था, जो अभारतीय थे। जिसने भारतीय सिनेमा के विकास की नींव रखी। डॉ. तिवारी ने यह भी उल्लेख किया कि सिनेमा ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्मों के माध्यम से देशभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाया गया, जिससे स्वतंत्रता के प्रति लोगों में जागरूकता और उत्साह का संचार हुआ। उन्होंने 1960 के बाद के सिनेमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस दौर में फिल्मों में काल्पनिकता और मनोरंजन के तत्वों की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे सिनेमा का स्वरुप भी बदलता गया।
गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय बड़ोदरा, गुजरात के डॉ. संजीव कुमार दुबे ने कहा कि प्रारंभिक दौर में फिल्मी कलाकारों को समाज में अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता था। सिनेमा को एक निम्न स्तर की कला माना जाता था, लेकिन समय के साथ इसकी सामाजिक स्वीकृति बढ़ती गई। डॉ. रीतेश कुमार सिंह की पुस्तक स्त्री विमर्श और यशपाल के उपन्यास का भी लोकार्पण किया गया। हिंदी साहित्य और सिनेमा के संदर्भ में स्त्री विमर्श के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, जो शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। संचालन आयोजन सचिव डॉ रमाकांत राय ने किया।
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पंचायती राज में किया गया कार्यक्रम का आयोजन
संवाद न्यूज एजेंसी
इटावा। पंचायत राज राजकीय स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय रविवार को ‘हिंदी सिनेमा की विकास यात्रा: विविध आयाम’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया। देश के विभिन्न भागों से आए विद्वानों, शोधार्थियों व छात्राओं ने सहभागिता की और हिंदी सिनेमा के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि डीएम शुभ्रांत शुक्ल ने कहा कि सिनेमा जैसे विषय पर इस उत्कृष्ट सोच के साथ अकादमिक कार्यक्रम करना और उसे शैक्षणिक वातावरण से जोड़ना बहुत सराहनीय कार्य है। उन्होंने इस विषय को गंभीरता से लेने की आवश्यकता पर बल दिया। अध्यक्षता पूर्व क्षेत्रीय उच्च शिक्षा अधिकारी प्रो. रिपुदमन सिंह ने की। उन्होंने कहा कि सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज का दर्पण भी है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सिनेमा समाज की वास्तविकताओं को प्रस्तुत करने के साथ-साथ समाज को प्रभावित करने की क्षमता भी रखता है। सिनेमा और समाज के बीच गहरा अंतर्संबंध है, जो समय के साथ और अधिक सशक्त होता गया है।
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प्रथम सत्र में बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर से आए डॉ. गौरव तिवारी ने सिनेमा को सभी ललित कलाओं का समन्वित रूप बताया। उन्होंने कहा कि सिनेमा में साहित्य, संगीत, नृत्य, चित्रकला और नाट्य जैसे विभिन्न कलात्मक तत्वों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। उन्होंने कहा कि बताया कि भारत में सर्वप्रथम फिल्मों का प्रदर्शन लुमियरे बंधु की ओर किया गया था, जो अभारतीय थे। जिसने भारतीय सिनेमा के विकास की नींव रखी। डॉ. तिवारी ने यह भी उल्लेख किया कि सिनेमा ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्मों के माध्यम से देशभक्ति की भावना को जन-जन तक पहुंचाया गया, जिससे स्वतंत्रता के प्रति लोगों में जागरूकता और उत्साह का संचार हुआ। उन्होंने 1960 के बाद के सिनेमा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इस दौर में फिल्मों में काल्पनिकता और मनोरंजन के तत्वों की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे सिनेमा का स्वरुप भी बदलता गया।
गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय बड़ोदरा, गुजरात के डॉ. संजीव कुमार दुबे ने कहा कि प्रारंभिक दौर में फिल्मी कलाकारों को समाज में अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता था। सिनेमा को एक निम्न स्तर की कला माना जाता था, लेकिन समय के साथ इसकी सामाजिक स्वीकृति बढ़ती गई। डॉ. रीतेश कुमार सिंह की पुस्तक स्त्री विमर्श और यशपाल के उपन्यास का भी लोकार्पण किया गया। हिंदी साहित्य और सिनेमा के संदर्भ में स्त्री विमर्श के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है, जो शोधार्थियों और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी। संचालन आयोजन सचिव डॉ रमाकांत राय ने किया।
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स्वरूप → स्वरुप (स्तर 1: मात्रा/स्वर सुधार)
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