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Etawah News: परीक्षार्थियों की भीड़ में खो गई दावों की छांव
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इटावा। पुलिस भर्ती परीक्षा में शामिल होने आए हजारों अभ्यर्थियों के लिए प्रशासन ने रैन बसेरों और सहायता केंद्रों की व्यवस्था का दावा किया था। संवाद न्यूज एजेंसी की पड़ताल में यह दावा खोखला साबित हुआ। जानकारी और पहुंच के अभाव में अधिकांश अभ्यर्थी इन सुविधाओं का लाभ नहीं उठा सके। उन्हें रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और सार्वजनिक स्थानों पर रात बिताने को मजबूर होना पड़ा।
जिले के 11 केंद्रों पर यूपी पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा का आयोजन किया जा रहा है। इसमें जालौन, ललितपुर, झांसी, कानपुर देहात, कानपुर और मैनपुरी सहित कई जिलों के परीक्षार्थी शामिल हैं। दो पालियों में होने वाली परीक्षा के लिए 8544 परीक्षार्थियों ने पंजीकरण कराया है। बाहर से आने वाले अभ्यर्थियों की सुविधा के लिए प्रशासन ने शहर में पांच स्थानों पर अस्थाई और स्थाई रैन बसेरे बनाए थे। इनमें पंखा, कूलर और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया गया था। इसके अतिरिक्त रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और शास्त्री चौराहा पर तीन सहायता केंद्र स्थापित किए गए थे। राजस्व और नगर पालिका कर्मियों की 24 घंटे ड्यूटी लगाई गई थी।
सोमवार रात संवाद न्यूज एजेंसी की पड़ताल में स्थिति अलग दिखी। जेल सड़क स्थित नगर पालिका के 30 बेड क्षमता वाले स्थाई रैन बसेरे में केवल सात से आठ अभ्यर्थी ठहरे मिले। वहीं, एसएसपी चौराहा के पास जिला पंचायत सभागार में बने 50 क्षमता वाले अस्थाई रैन बसेरे में सिर्फ चार अभ्यर्थी मौजूद थे। दूसरी ओर, रेलवे स्टेशन के बाहर, प्लेटफॉर्म और बस स्टैंड के आसपास बड़ी संख्या में अभ्यर्थी खुले आसमान के नीचे रात बिताते नजर आए। जालौन से आए अभ्यर्थी मुकेश ने बताया कि उन्हें रैन बसेरों की जानकारी ही नहीं मिली। अन्य अभ्यर्थियों ने सहायता केंद्र पर कर्मचारियों से अपेक्षित सहयोग न मिलने की शिकायत की।
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शहर में संचालित 30 से अधिक होटल संचालकों ने भी बढ़ी मांग का फायदा उठाया। सामान्य दिनों में 600 रुपये से 900 रुपये में मिलने वाले कमरे भर्ती परीक्षा के दौरान 2000 रुपये से 2500 रुपये तक में किराये पर दिए गए। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों के सामने रात गुजारने की सबसे बड़ी चुनौती रही। प्रशासन की तैयारियों के बावजूद व्यवस्था और सूचना तंत्र की कमी ने अभ्यर्थियों की मुश्किलें बढ़ा दीं।
रेलवे स्टेशन पर मरम्मतीकरण के काम के कारण पैदल ऊपरी पुल की सीढ़ियां बंद कर दी गई हैं। इसके चलते बाहर से प्लेटफॉर्म नंबर दो, तीन और चार पर जाने के लिए अभ्यर्थियों को एक किलोमीटर का चक्कर काटना पड़ा। उन्हें ढलान के माध्यम से प्लेटफॉर्मों पर जाना पड़ा। इससे ट्रेन आने पर यात्रियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी।
जिले के 11 केंद्रों पर यूपी पुलिस आरक्षी भर्ती परीक्षा का आयोजन किया जा रहा है। इसमें जालौन, ललितपुर, झांसी, कानपुर देहात, कानपुर और मैनपुरी सहित कई जिलों के परीक्षार्थी शामिल हैं। दो पालियों में होने वाली परीक्षा के लिए 8544 परीक्षार्थियों ने पंजीकरण कराया है। बाहर से आने वाले अभ्यर्थियों की सुविधा के लिए प्रशासन ने शहर में पांच स्थानों पर अस्थाई और स्थाई रैन बसेरे बनाए थे। इनमें पंखा, कूलर और पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने का दावा किया गया था। इसके अतिरिक्त रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड और शास्त्री चौराहा पर तीन सहायता केंद्र स्थापित किए गए थे। राजस्व और नगर पालिका कर्मियों की 24 घंटे ड्यूटी लगाई गई थी।
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सोमवार रात संवाद न्यूज एजेंसी की पड़ताल में स्थिति अलग दिखी। जेल सड़क स्थित नगर पालिका के 30 बेड क्षमता वाले स्थाई रैन बसेरे में केवल सात से आठ अभ्यर्थी ठहरे मिले। वहीं, एसएसपी चौराहा के पास जिला पंचायत सभागार में बने 50 क्षमता वाले अस्थाई रैन बसेरे में सिर्फ चार अभ्यर्थी मौजूद थे। दूसरी ओर, रेलवे स्टेशन के बाहर, प्लेटफॉर्म और बस स्टैंड के आसपास बड़ी संख्या में अभ्यर्थी खुले आसमान के नीचे रात बिताते नजर आए। जालौन से आए अभ्यर्थी मुकेश ने बताया कि उन्हें रैन बसेरों की जानकारी ही नहीं मिली। अन्य अभ्यर्थियों ने सहायता केंद्र पर कर्मचारियों से अपेक्षित सहयोग न मिलने की शिकायत की।
शहर में संचालित 30 से अधिक होटल संचालकों ने भी बढ़ी मांग का फायदा उठाया। सामान्य दिनों में 600 रुपये से 900 रुपये में मिलने वाले कमरे भर्ती परीक्षा के दौरान 2000 रुपये से 2500 रुपये तक में किराये पर दिए गए। ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों के सामने रात गुजारने की सबसे बड़ी चुनौती रही। प्रशासन की तैयारियों के बावजूद व्यवस्था और सूचना तंत्र की कमी ने अभ्यर्थियों की मुश्किलें बढ़ा दीं।
रेलवे स्टेशन पर मरम्मतीकरण के काम के कारण पैदल ऊपरी पुल की सीढ़ियां बंद कर दी गई हैं। इसके चलते बाहर से प्लेटफॉर्म नंबर दो, तीन और चार पर जाने के लिए अभ्यर्थियों को एक किलोमीटर का चक्कर काटना पड़ा। उन्हें ढलान के माध्यम से प्लेटफॉर्मों पर जाना पड़ा। इससे ट्रेन आने पर यात्रियों को काफी मशक्कत करनी पड़ी।