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Farrukhabad News: आलू उत्पादक किसान बर्बादी के दलदल में, नहीं मिल रहे खरीदार

संवाद न्यूज एजेंसी, फर्रूखाबाद Updated Mon, 09 Feb 2026 01:00 AM IST
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Potato farmers are in a quagmire of ruin, unable to find buyers.
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फर्रुखाबाद/कमालगंज। गांवों में बच्चों की अच्छी शादी व सामाजिक प्रतिष्ठा की गारंटी मानी जाने वाली आलू की फसल इस बार किसानों की बर्बादी का सबब बन गई है। हालत यह है कि 14 हजार रुपये बीघा की लागत डूब गई। अब मक्का के लिए खेत खाली करने को खोदाई व ढुलाई के खर्च में भी पास से एक हजार रुपये लगाने की नौबत है। रही-सही दम ट्रकों की कमी व ट्रक भाड़ा बढ़ोतरी ने निकाल दी। पूर्वांचल व असम की मंडियों में स्थानीय आलू आने से यहां का आलू बाहर न जाना भी मंदी की वजह बना है।
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फर्रुखाबादी किसानों की शान रहा है सब्जियों का राजा आलू। देश के कई स्थानों पर थोक व फुटकर मंडियों में आलू की प्रजाति का नाम लेकर बिक्री नहीं होती थी। बल्कि प्रजाति का नाम लेने के बजाय कहा जाता था कि यह फर्रुखाबादी आलू है। यही आलू इस बार किसानों की बर्बादी का कारण बन रहा है। दो दिन में मंदी की ऐसी आंधी आई कि लागत डूबने के साथ ही खेत खाली करने के लिए आलू की खोदाई और मंडी तक माल ले जाने की कीमत भी नहीं मिल रही। शनिवार को तो आलू व्यापार का इतना बुरा दिन रहा कि कमालगंज मंडी में 17 हजार पैकेट आलू किसी भी भाव नहीं बिक पाया।
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गौरतलब है कि यदि बीघा में 45 पैकेट आलू मंडी में 100 रुपये पैकेट बिके तो 4500 रुपये बीघा के हिसाब से दाम हाथ में आएंगे। इससे लागत तो डूब ही गई, खोदाई व माल बेचने तक एक हजार रुपये और पास से जाएंगे। इस तरह मंदी से पक्की फसल कोल्ड स्टोरेज में बिना दाम के ही छोड़ देने वाले किसानों को नई फसल ने भी घाटे की त्रासदी में धकेल दिया है। रही-सही दम ट्रकों की कमी व ट्रक भाड़ा बढ़ोतरी ने निकाल दी। शीतगृहों के मुहूर्त शुरू हो गए, इससे भी आलू भाव को संजीवनी नहीं मिली।
14 हजार रुपये बीघा की लागत मिट्टी में मिल गई
फोटो-15 शरद कुमार

उन्नतशील किसान शरद कुमार बताते हैं कि फसल की गड़ाई के समय एक बीघा में 600 रुपये पैकेट के हिसाब से सात पैकेट छट्ठा आलू बीज जोड़ें तो 4200 रुपये का आलू गड़ा। 1900 रुपये की एक बोरी एनपीके, 3 हजार का घूरा, 1200 की सिंचाई व उसकी मजदूरी, एक हजार के माइक्रोन्यूटेन्स पिपरोलीन सल्फर बोरान आदि का मिश्रण, 1500 रुपये हैरो कल्टीवेटर रोटावेटर से जुताई व मशीन से गड़ाई, 1200 रुपये पानी के साथ यूरिया, फंगीसाइड व अन्य दवाइयों का छिड़काव मिलाकर करीब 14 हजार रुपये बीघा की लागत मिट्टी में मिल गई।
आलू खोदाई व मंडी पहुंचाने का भी खर्च नहीं निकल रहा
फोटो-14 लालू शाक्य
गांधीनगर के किसान लालू शाक्य का कहना है कि अब तो किसानों को आलू की खोदाई कराने व उसे मंडी में पहुंचाने का भी खर्च नहीं निकल रहा। 1500 से 1600 रुपये बीघा खोदाई की मजदूरी चल रही है। बोरा पकड़ने वाले व सिलाई में 500 रुपये, खेत में ट्रैक्टर ट्राली पर पैकेट की लदाई व मंडी तक ट्रैक्टर भाड़ा व उतराई में 1700, 1250 रुपये का जूट का खाली बारदाना, पला-झौआ व अन्य खर्चा जोड़ें तो खोदाई से लेकर मंडी पहुंचने तक 5500 रुपये बीघा का खर्च आ रहा है।
वर्जन
पक्की फसल आने व सभी शीतगृहों में भंडारण शुरू होते ही भाव सुधरने की उम्मीद है। नेपाल में चुनाव के बाद नई सरकार बनते ही वहां के लिए निर्यात तेज हो जाएगा। इससे आलू के रेट और अधिक बढ़ने की पूरी संभावना है। -राघवेंद्र सिंह, जिला उद्यान व आलू विकास अधिकारी
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