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Hathras News: महंगाई की चकाचौंध में खो गईं पीतल की पिचकारियां

संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस Updated Tue, 03 Mar 2026 02:32 AM IST
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Brass squirters lost in the glare of inflation
पीतल की पिचकारी। संवाद - फोटो : Samvad
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होली का त्योहार आते ही बाजार रंग-बिरंगी पिचकारियों से सज गए हैं, लेकिन परंपरागत पीतल की पिचकारियां और फौव्वारे बाजारों से लगभग गायब हो चुके हैं। करीब दो दशक पहले तक जिले में पीतल के उत्पाद बनाने की समृद्ध परंपरा के कारण होली पर पीतल की पिचकारियों से रंग खेलने का विशेष परंपरा थी।
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पीतल के बर्तन के पुराने कारोबारी बताते हैं कि पीतल के फौव्वारों में खुशबूदार रंग और इत्र मिलाकर छिड़काव किया जाता था, जिससे होली का आनंद और भी बढ़ जाता था। उस समय इन पिचकारियों को संभालकर वर्षों तक इस्तेमाल किया जाता था और इन्हें शान की वस्तु माना जाता था। वर्तमान में बाजारों में प्लास्टिक से बनी आधुनिक पिचकारियों का बोलबाला है।
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हल्की, सस्ती और आकर्षक डिजाइन वाली इन पिचकारियों ने पारंपरिक उत्पादों की जगह ले ली है। बच्चों को लुभाने के लिए इन पर लोकप्रिय किरदारों के स्टीकर लगाए जा रहे हैं, जिनमें डोरेमोन, स्पाइडर मैन, छोटा भीम आदि जैसे पात्र प्रमुख हैं। स्थानीय कारीगरों का कहना है कि बदलते समय और बढ़ती लागत के कारण पीतल की पिचकारियों का निर्माण लगभग बंद हो गया है।






शहर में अब पीतल की पिचकारियां नहीं बनतीं। करीब 15 साल पहले तक तो पीतल की पिचकारी बिकती थीं, लेकिन अब पिचकारी व फौव्वारा मानो खत्म हो गए हैं।
-राजेश कुमार, पीतल के बर्तनों के कारोबारी।






जैसे-जैसे पीतल के दामों में इजाफा हुआ तो पिचकारियों का चलन बंद हो गया। अब मुरादाबाद में पिचकारी बनती हैं, लेकिन इनकी कीमत करीब एक हजार रुपये होती है, इसलिए यह आसानी मिलती नहीं मिलती हैं।
-ऋषि कुमार, पीतल के बर्तन के कारोबारी।
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