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आज भी याद है: आजादी की रात घर-घर जल रहे थे दीये, सरहद पर बह रहे थे आंसू, दिल में था पलायन और बिछड़ने का दर्द
Sat, 15 Aug 2026 03:48 PM IST
Chaman Kumar Sharma
प्रशांत भारती, अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
प्रशांत भारती, अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस
Published by: Chaman Kumar Sharma
Updated Sat, 15 Aug 2026 03:48 PM IST
सार
15 अगस्त 1947 की रात 12 बजते ही लोग घरों से बाहर निकल आए थे।आतिशबाजी हुई, देशभक्ति की कविताएं गाई गईं और तिरंगे फहराए गए। जिनके पास तिरंगा नहीं था, उन्होंने घरों में मोमबत्तियां जलाकर आजादी का स्वागत किया।
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15 अगस्त 1947 की रात
- फोटो : एआई
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विस्तार
15 अगस्त 1947 की वह रात... एक तरफ आजादी की खुशी में घर-घर दीये जल रहे थे, आतिशबाजी हो रही थी और तिरंगे लहरा रहे थे, तो दूसरी तरफ देश के बंटवारे का दर्द लोगों के दिलों में उतर रहा था। हाथरस क्षेत्र के 100 और 90 वर्ष की उम्र पार कर चुके बुजुर्गों की यादों में आज भी उस दौर की तस्वीरें वैसी ही ताजा हैं। किसी को आजादी की पहली रात का जश्न याद है तो किसी की स्मृतियों में हिंसा, पलायन और बिछड़ने का दर्द दर्ज है।
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आतिशबाजी से जगमगाया था आसमान, हर घर में जले थे दीये
सहपऊ निवासी 100 वर्षीय धर्मवीर वर्मा को आजादी की पहली रात का जश्न आज भी याद है। वह बताते हैं कि रात 12 बजते ही लोग घरों से बाहर निकल आए थे। आतिशबाजी हुई, देशभक्ति की कविताएं गाई गईं और तिरंगे फहराए गए। जिनके पास तिरंगा नहीं था, उन्होंने घरों में मोमबत्तियां जलाकर आजादी का स्वागत किया। धर्मवीर कहते हैं कि उस समय लोगों के पास साधन कम थे, लेकिन आजादी की खुशी साझा करने के लिए पूरा समाज एक साथ खड़ा था। हर चेहरे पर उत्साह था और हर तरफ देशभक्ति का माहौल था।
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आजादी की मिठास में घुला था बंटवारे का दर्द
मोनिया गांव के 90 वर्षीय सोनपाल सिंह की यादों में आजादी के जश्न के साथ बंटवारे की त्रासदी भी जुड़ी हुई है। वह बताते हैं कि देश आजाद होने की खुशी अपार थी, लेकिन सीमाओं पर हिंसा और खून-खराबे की खबरों ने लोगों को भीतर तक डरा दिया था। उनके मुताबिक लाखों लोगों को रातों-रात अपना घर-बार छोड़ना पड़ा। लोग जान बचाकर दूसरी ओर जाने को मजबूर हुए। आजादी मिली, लेकिन उसके साथ बंटवारे का ऐसा दर्द आया, जिसकी टीस लंबे समय तक लोगों के दिलों में रही।
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खेतों के रास्ते छिपते-छिपाते वतन लौटे थे मामा
गढ़ी सिंघा निवासी 90 वर्षीय धर्मपाल सिंह को अपने मामा सिंधु की कहानी आज भी याद है। वह उस समय पाकिस्तान की एक कपड़ा मिल में काम करते थे। देश के बंटवारे के बाद वहां हिंसा और भय का माहौल बन गया। धर्मपाल बताते हैं कि उनके मामा किसी तरह छिपते-छिपाते खेतों के रास्ते जान बचाकर भारत लौटे। बाद में उन्होंने लाजपुर कपड़ा मिल में काम शुरू किया। धर्मपाल कहते हैं कि उनके समय का जीवन सादा था। महंगाई और अपराध कम थे। उनके मुताबिक आजादी के बाद देश ने बहुत तरक्की की, लेकिन समय के साथ सुरक्षा और सामाजिक जीवन की चुनौतियां भी बढ़ी हैं।
एक पीढ़ी, आजादी और बंटवारे की दो तस्वीरें
इन बुजुर्गों की यादों में 15 अगस्त 1947 सिर्फ आजादी का जश्न नहीं है। यह वह दिन भी है, जब एक पीढ़ी ने एक साथ खुशी, डर, बिछड़ने और नए भारत के जन्म को महसूस किया। आजादी की 79वीं वर्षगांठ पर उनकी आंखों में महफूज ये यादें इतिहास की उन तस्वीरों को सामने लाती हैं, जिन्हें अगली पीढ़ी किताबों में पढ़ती है, लेकिन इन बुजुर्गों ने अपनी जिंदगी में जिया है।