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Hathras News: गैस भट्ठियां ठंडी, सुलग रहे कोयले के तंदूर
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गांधी पार्क बस स्टैंड स्थित एक होटल पर तंदूर में गोयला लगाता कर्मचारी।
- फोटो : samvad
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गैस की किल्लत के बाद बाजार में तंदूर की मांग बढ़ रही है, जो लकड़ी और कोयले से जल रहे हैं। अलीगढ़ होटल एंड रेस्टोरेंट एसोसिएशन के महामंत्री विवेक बगाई ने बताया कि कोयले के तंदूर की मांग बढ़ रही है। अधिकांश व्यंजन इन्हीं में बन रहे हैं। इनमें बनी रोटियों में सोंधी महक आती है, जिससे स्वाद बढ़ जाता हैं। गैस किल्लत का सही आकलन ईद और नवरात्रि के बाद सामने आएगा।
होटल संचालक अखिल गुप्ता ने बताया कि गैस किल्लत के बाद उन्होंने इंडक्शन और कोयले के तंदूर पर बनने वाले व्यंजनों की संख्या बढ़ा दी है। गैस पर होने वाले काम इंडक्शन चूल्हों पर कर रहे हैं। इसलिए सिलिंडरों की जरूरत कम पड़ रही है। मसलन, पहले अगर महीने में 40 सिलिंडर में काम हो रहा था, अब वह उसे 20 सिलिंडर में पूरा कर पा रहे हैं।
रामघाट रोड स्थित एक ढाबा के कारीगर सोनू ने बताया कि उनके तंदूर में रोजाना 50 किलो कोयला लगता है, जिससे सुबह से रात तक लगभग दो हजार तक रोटियां बन जाती हैं। कई अन्य व्यंजन बन जाते हैं। कोयला 22 और लकड़ी 8 रुपये किलो मिल रही है।
चार हजार का है एक तंदूर
जीवनगढ़ की गली नंबर-एक में कोयले और लकड़ी का अलग-अलग तंदूर बनाने वाले आदिल ने बताया कि उनके पास 4000-4500 रुपये तक के तंदूर हैं, गैस की किल्लत के बाद इनकी मांग बढ़ रही है। किराये पर यह 200 रुपये रोजाना के हिसाब से मिल जाते हैं। दुबे का पड़ाव बाजार के बर्तन कारोबारी अमित अग्रवाल ने बताया कि किल्लत होने के बाद से गैस के चूल्हे नहीं बिक रहे हैं। कोयले और लकड़ी के तंदूर की मांग है।
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होटल संचालक अखिल गुप्ता ने बताया कि गैस किल्लत के बाद उन्होंने इंडक्शन और कोयले के तंदूर पर बनने वाले व्यंजनों की संख्या बढ़ा दी है। गैस पर होने वाले काम इंडक्शन चूल्हों पर कर रहे हैं। इसलिए सिलिंडरों की जरूरत कम पड़ रही है। मसलन, पहले अगर महीने में 40 सिलिंडर में काम हो रहा था, अब वह उसे 20 सिलिंडर में पूरा कर पा रहे हैं।
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रामघाट रोड स्थित एक ढाबा के कारीगर सोनू ने बताया कि उनके तंदूर में रोजाना 50 किलो कोयला लगता है, जिससे सुबह से रात तक लगभग दो हजार तक रोटियां बन जाती हैं। कई अन्य व्यंजन बन जाते हैं। कोयला 22 और लकड़ी 8 रुपये किलो मिल रही है।
चार हजार का है एक तंदूर
जीवनगढ़ की गली नंबर-एक में कोयले और लकड़ी का अलग-अलग तंदूर बनाने वाले आदिल ने बताया कि उनके पास 4000-4500 रुपये तक के तंदूर हैं, गैस की किल्लत के बाद इनकी मांग बढ़ रही है। किराये पर यह 200 रुपये रोजाना के हिसाब से मिल जाते हैं। दुबे का पड़ाव बाजार के बर्तन कारोबारी अमित अग्रवाल ने बताया कि किल्लत होने के बाद से गैस के चूल्हे नहीं बिक रहे हैं। कोयले और लकड़ी के तंदूर की मांग है।