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Jalaun News: मौसम की मार से चटक रहीं मूंग की फलियां
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फोटो - 02 खेत में लगी चटक रही मूंग की फसल। संवाद
- फोटो : योगेश कुशवाहा
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उरई। बुंदेलखंड में किसानों के लिए नकदी फसल का विकल्प मानी जाने वाली और दो माह में तैयार होने वाली मूंग इस बार मौसम की मार से बुरी तरह प्रभावित हो रही है। पहले बेमौसम आंधी और बारिश ने फसल को नुकसान पहुंचाया, वहीं अब तेज धूप और बढ़ते तापमान के कारण मूंग की फलियां चटक रही हैं और दाने खेतों में झड़ रहे हैं। इससे किसानों की मेहनत और उम्मीदें दोनों टूटती नजर आ रही हैं।
जिले में इस वर्ष लगभग 65 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में मूंग की खेती की गई है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मूंग की फसल सामान्यता 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है। कम लागत, कम सिंचाई और बाजार में बेहतर दाम मिलने के कारण यह किसानों की पसंदीदा दलहनी फसल मानी जाती है। यही वजह है कि गेहूं की कटाई के बाद बड़ी संख्या में किसान मूंग की बोआई करते हैं।
इस वर्ष मार्च और अप्रैल में हुई ओलावृष्टि, बारिश और तेज हवाओं से गेहूं, सरसों और अन्य रबी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा था। ऐसे में किसानों को उम्मीद थी कि जल्दी तैयार होने वाली मूंग की फसल उनके आर्थिक नुकसान की भरपाई कर देगी। लेकिन मौसम के लगातार बदलते मिजाज ने इस उम्मीद को भी झटका दे दिया है।
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डकोर क्षेत्र के किसान रामस्वरूप पाल बताते हैं कि रबी फसल में हुए नुकसान के बाद उन्होंने मूंग से काफी उम्मीदें लगाई थीं। अब फलियों के फटने से दाने खेतों में गिर रहे हैं और उपज लगातार घट रही है। परिवार के लोग सुबह से शाम तक खेतों में दाना बीनने के लिए मजबूर हैं। वहीं कदौरा क्षेत्र के किसान कृपाल, दिनेश, नरसिंह आदि का कहना है कि यही आखिरी उम्मीद थी, लेकिन मौसम आखिरी उम्मीद को भी खत्म कर रहा है।
इसलिए चटक रही हैं मूंग की फलियां
कृषि वैज्ञानिक विस्टर जोशी बताते हैं कि मूंग की फसल पकने की अवस्था में हो और बारिश हो जाए तो फलियों में नमी बढ़ जाती है, इसके बाद अचानक तेज धूप और 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंचते तापमान ने फलियों पर दबाव बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि जब नमी से भरी फलियां तेजी से सूखती हैं तो उनकी बाहरी सतह सिकुड़ जाती है और फलियां चटकने लगती हैं। इसके कारण अंदर मौजूद दाने जमीन पर गिर जाते हैं। यही कारण है कि इस समय खेतों में दाना झड़ने की घटनाएं बढ़ गई हैं।
मिट्टी को उपजाऊ बनाती है मूंग
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मूंग केवल नकदी फसल ही नहीं, बल्कि भूमि की उर्वरता बढ़ाने वाली फसल भी है। इसकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर करते हैं, जिससे अगली फसल को भी लाभ मिलता है। यही कारण है कि किसान गेहूं की कटाई के बाद मूंग को फसल चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।
जिले में इस वर्ष लगभग 65 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में मूंग की खेती की गई है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मूंग की फसल सामान्यता 60 से 65 दिनों में तैयार हो जाती है। कम लागत, कम सिंचाई और बाजार में बेहतर दाम मिलने के कारण यह किसानों की पसंदीदा दलहनी फसल मानी जाती है। यही वजह है कि गेहूं की कटाई के बाद बड़ी संख्या में किसान मूंग की बोआई करते हैं।
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इस वर्ष मार्च और अप्रैल में हुई ओलावृष्टि, बारिश और तेज हवाओं से गेहूं, सरसों और अन्य रबी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा था। ऐसे में किसानों को उम्मीद थी कि जल्दी तैयार होने वाली मूंग की फसल उनके आर्थिक नुकसान की भरपाई कर देगी। लेकिन मौसम के लगातार बदलते मिजाज ने इस उम्मीद को भी झटका दे दिया है।
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डकोर क्षेत्र के किसान रामस्वरूप पाल बताते हैं कि रबी फसल में हुए नुकसान के बाद उन्होंने मूंग से काफी उम्मीदें लगाई थीं। अब फलियों के फटने से दाने खेतों में गिर रहे हैं और उपज लगातार घट रही है। परिवार के लोग सुबह से शाम तक खेतों में दाना बीनने के लिए मजबूर हैं। वहीं कदौरा क्षेत्र के किसान कृपाल, दिनेश, नरसिंह आदि का कहना है कि यही आखिरी उम्मीद थी, लेकिन मौसम आखिरी उम्मीद को भी खत्म कर रहा है।
इसलिए चटक रही हैं मूंग की फलियां
कृषि वैज्ञानिक विस्टर जोशी बताते हैं कि मूंग की फसल पकने की अवस्था में हो और बारिश हो जाए तो फलियों में नमी बढ़ जाती है, इसके बाद अचानक तेज धूप और 40 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंचते तापमान ने फलियों पर दबाव बढ़ जाता है। उन्होंने बताया कि जब नमी से भरी फलियां तेजी से सूखती हैं तो उनकी बाहरी सतह सिकुड़ जाती है और फलियां चटकने लगती हैं। इसके कारण अंदर मौजूद दाने जमीन पर गिर जाते हैं। यही कारण है कि इस समय खेतों में दाना झड़ने की घटनाएं बढ़ गई हैं।
मिट्टी को उपजाऊ बनाती है मूंग
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार मूंग केवल नकदी फसल ही नहीं, बल्कि भूमि की उर्वरता बढ़ाने वाली फसल भी है। इसकी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन को भूमि में स्थिर करते हैं, जिससे अगली फसल को भी लाभ मिलता है। यही कारण है कि किसान गेहूं की कटाई के बाद मूंग को फसल चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं।