सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Jhansi News ›   Jhansi: Microplastics have made their way from fields to the dinner plate

चिंताजनक: भोजन भी नहीं सुरक्षित, खेतों से खाने की थाली तक पहुंचा माइक्रो प्लास्टिक, बीयू के शोध में हुई पुष्टि

अमर उजाला नेटवर्क, झांसी Published by: दीपक महाजन Updated Tue, 16 Jun 2026 10:46 AM IST
विज्ञापन
सार

बीयू के पर्यावरण विज्ञान विभाग की ओर से किए गए अध्ययन में पालक, धनिया, मेथी समेत कई नमूनों में माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। 

Jhansi: Microplastics have made their way from fields to the dinner plate
खाना की थाली, सांकेतिक फोटो। - फोटो : एआई।
विज्ञापन

विस्तार

जिस प्लास्टिक का इस्तेमाल लोग रोजमर्रा की जिंदगी में कर रहे हैं, उसके बेहद सूक्ष्म कण अब फसलों के जरिये खाने की थाली तक पहुंच चुके हैं। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय (बीयू) के पर्यावरण विज्ञान विभाग की ओर से किए गए अध्ययन में पालक, धनिया, मेथी समेत कई नमूनों में माइक्रो प्लास्टिक की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि ये कण न केवल स्वयं हानिकारक हैं, बल्कि अपने साथ भारी धातुओं, कीटनाशकों और अन्य विषैले रसायनों को भी शरीर में पहुंचा सकते हैं।


बीयू के पर्यावरण विज्ञान विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. स्मृति त्रिपाठी के निर्देशन में विद्यार्थी विधि अरोरा और रुद्र रावत ने माइक्रो प्लास्टिक पर अध्ययन किया। टीम ने बस स्टैंड के पास स्थित सब्जी मंडी से पालक, धनिया और मेथी के नमूने लिए। इसके अलावा भगवंतपुरा स्थित कचरा निस्तारण स्थल और पहूज डैम के समीप खेतों की मिट्टी के नमूने भी एकत्र किए गए। करीब छह महीने तक इन नमूनों का बीयू के नवाचार केंद्र में फोरियर ट्रांसफॉर्म इंफ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी (एफटीआईआर) तकनीक से परीक्षण किया गया। अध्ययन में प्राकृतिक पौधीय तत्वों के अलावा पॉलीएथिलीन, पॉलीप्रोपाइलीन और पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (पीईटी) जैसे प्लास्टिक पॉलिमरों के अवशेष मिले।
विज्ञापन
विज्ञापन


डॉ. स्मृति ने बताया कि यह संकेत है कि माइक्रो प्लास्टिक कृषि पारितंत्र में प्रवेश कर चुके हैं और खाद्य शृंखला के जरिये मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। पीईटी का उपयोग पानी की बोतलों, खाद्य पैकेजिंग, सिंथेटिक कपड़ों और अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुओं में होता है। उन्होंने बताया कि बुंदेलखंड में माइक्रो प्लास्टिक पर इस तरह का यह पहला अध्ययन है। शोधपत्र अंतरराष्ट्रीय जर्नल स्प्रिंगर में प्रकाशन के लिए भेजा गया है।
विज्ञापन



ऐसे मिट्टी और फसलों तक पहुंचता है माइक्रो प्लास्टिक
डॉ. स्मृति के अनुसार, उर्वरक व कीटनाशकों के पैकेट, पॉलीबैग और खुले में पड़ा प्लास्टिक कचरा समय के साथ टूटकर सूक्ष्म कणों में बदल जाता है। ये कण मिट्टी में मिलकर जड़ों के संपर्क में आते हैं और धीरे-धीरे फसलों व सब्जियों तक पहुंच जाते हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि माइक्रो प्लास्टिक आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन भोजन और पानी के साथ शरीर में प्रवेश कर जाता है।


पाचन तंत्र में सूजन से लेकर कैंसर तक का खतरा : डॉ. रामबाबू
मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभागाध्यक्ष डॉ. रामबाबू सिंह ने बताया कि जलाशयों में लंबे समय तक पड़ा प्लास्टिक टूटकर माइक्रो प्लास्टिक में बदल जाता है। ये कण पानी में मिलकर पशुओं और अन्य जीवों के शरीर में पहुंच जाते हैं। यदि गाय माइक्रो प्लास्टिक युक्त पानी पीती है तो इसके अंश दूध तक पहुंच सकते हैं। उन्होंने बताया कि माइक्रो प्लास्टिक के लंबे समय तक संपर्क में रहने से पाचन तंत्र में सूजन, कोशिकाओं को नुकसान, हार्मोनल असंतुलन, प्रजनन संबंधी समस्याएं और कैंसर का खतरा भी बढ़ सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed