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Kannauj News: रोए तो मां नहीं, पिता तक नहीं पहुंची रही पुकार
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कन्नौज। दुनिया में हर बच्चे की पहली पहचान मां की ममतामयी गोद होती है। रोने पर मां का कोमल स्पर्श माथा सहलाता है और भूख लगने पर सीने की गरमाहट उन्हें चुप करा देती है। जिला अस्पताल के एसएनसीयू (सिक एंड न्यू बोर्न केयर यूनिट) में भर्ती इन जुड़वां मासूमों की किस्मत ने शायद जन्म से पहले ही कोई दर्दनाक कहानी लिख दी थी।
अस्पताल के दो अलग-अलग बेड पर जिंदगी की सांसें गिनते इन मासूमों में एक भाई है और दूसरी बहन। दोनों के बीच चंद कदमों का फासला तो है, लेकिन दर्द और अहसास एक जैसा। कभी भाई रोता है तो दूर बेड पर पड़ी बहन करवट बदलती है, कभी बहन की आंखें खुलती हैं तो भाई भी बेचैन हो उठता है। मानो मशीनों की नीली रोशनी के बीच दोनों को अब भी यह अहसास है कि इस बेगानी दुनिया में उनका सबसे बड़ा सहारा केवल एकदूसरे का वजूद ही है। इन नन्हीं जिंदगियों को अभी यह नहीं पता कि बाहर उनकी पहचान, भविष्य और अभिरक्षा को लेकर कानूनी दांव-पेच चल रहे हैं। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि जिन ममता भरी बाहों में उन्हें होना चाहिए था, वे अब तक उनसे दूर हैं। घटना के तीसरे दिन शुक्रवार को भी मां से संपर्क नहीं हो सका है।
मृत पिता का नाम दर्ज, सवालों के घेरे में पहला अध्याय
मामला तब और अधिक भावुक व उलझाऊ हो गया जब दस्तावेजों में दर्ज पिता के नाम पर सवाल खड़े हो गए। सूत्रों के अनुसार, अभिलेखों में जिस युवक का नाम पिता के रूप में दर्ज किया गया है, उसका छह साल निधन हो चुका है। ऐसे में इन मासूमों की जिंदगी का पहला पन्ना ही अनसुलझे सवालों और अनिश्चितताओं के कोहरे से ढक गया है। स्वास्थ्य जांच पूरी होने के बाद दोनों बच्चों की विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट बाल कल्याण समिति को सौंपी जाएगी। यदि मां सामने नहीं आती तो समिति के निर्देशानुसार दोनों को लखनऊ स्थित विशेष बाल संरक्षण गृह भेजा जाएगा।
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मशीनों की छांव में सुरक्षा तो है, पर मां का सुकून नहीं
अस्पताल के डॉक्टर और नर्सें बच्चों की देखभाल में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। चाइल्ड लाइन की टीम 24 घंटे उनकी निगरानी में जुटी है। फिलहाल बेटा पूरी तरह स्वस्थ हैजबकि बेटी को हल्के पीलिया के कारण फोटोथैरेपी दी जा रही है। नीली रोशनी और बेजान दीवारों के बीच दोनों सुरक्षित तो हैं, लेकिन वह सुकून और गर्माहट यहां गायब है जो मां के आंचल में मिलती है। वार्ड के सन्नाटे में इन मासूम चेहरों को देखकर हर संवेदनशील दिल बस यही पूछ रहा है कि आखिर इनकी पहली गलती क्या थी, जन्म लेना, या इन हालातों में आंखें खोलना।
1.80 लाख में हुई थी मासूमों की सौदेबाजी
विशुनगढ़ क्षेत्र के एक गांव की रहने वाली एक विधवा ने करीब आठ दिन पहले इन जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था। आरोप है कि आर्थिक तंगी से जूझ रही महिला ने दोनों नवजातों को 1.80 लाख रुपये में अलग-अलग लोगों को सौंपने की सहमति दे दी थी। इसके लिए स्टांप पेपर पर लिखा पढ़ी किए जाने की बात भी सामने आई। भनक लगते ही चाइल्ड लाइन, बाल संरक्षण इकाई और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों नवजातों को सुरक्षित रेस्क्यू किया और जिला अस्पताल में भर्ती कराया। फिलहाल मां का कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है।
वर्जन
दोनों नवजात पूरी तरह सुरक्षित हैं। सभी आवश्यक चिकित्सकीय जांचें पूरी कर ली गई हैं। बच्ची को हल्के पीलिया के चलते फोटोथैरेपी दी जा रही है। हमारी टीम 24 घंटे दोनों की सेहत पर नजर बनाए हुए है।
-डॉ. गोपाल नारायण द्विवेदी, सीएमएस, जिला अस्पताल
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अस्पताल के दो अलग-अलग बेड पर जिंदगी की सांसें गिनते इन मासूमों में एक भाई है और दूसरी बहन। दोनों के बीच चंद कदमों का फासला तो है, लेकिन दर्द और अहसास एक जैसा। कभी भाई रोता है तो दूर बेड पर पड़ी बहन करवट बदलती है, कभी बहन की आंखें खुलती हैं तो भाई भी बेचैन हो उठता है। मानो मशीनों की नीली रोशनी के बीच दोनों को अब भी यह अहसास है कि इस बेगानी दुनिया में उनका सबसे बड़ा सहारा केवल एकदूसरे का वजूद ही है। इन नन्हीं जिंदगियों को अभी यह नहीं पता कि बाहर उनकी पहचान, भविष्य और अभिरक्षा को लेकर कानूनी दांव-पेच चल रहे हैं। उन्हें यह भी नहीं मालूम कि जिन ममता भरी बाहों में उन्हें होना चाहिए था, वे अब तक उनसे दूर हैं। घटना के तीसरे दिन शुक्रवार को भी मां से संपर्क नहीं हो सका है।
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मृत पिता का नाम दर्ज, सवालों के घेरे में पहला अध्याय
मामला तब और अधिक भावुक व उलझाऊ हो गया जब दस्तावेजों में दर्ज पिता के नाम पर सवाल खड़े हो गए। सूत्रों के अनुसार, अभिलेखों में जिस युवक का नाम पिता के रूप में दर्ज किया गया है, उसका छह साल निधन हो चुका है। ऐसे में इन मासूमों की जिंदगी का पहला पन्ना ही अनसुलझे सवालों और अनिश्चितताओं के कोहरे से ढक गया है। स्वास्थ्य जांच पूरी होने के बाद दोनों बच्चों की विस्तृत मेडिकल रिपोर्ट बाल कल्याण समिति को सौंपी जाएगी। यदि मां सामने नहीं आती तो समिति के निर्देशानुसार दोनों को लखनऊ स्थित विशेष बाल संरक्षण गृह भेजा जाएगा।
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मशीनों की छांव में सुरक्षा तो है, पर मां का सुकून नहीं
अस्पताल के डॉक्टर और नर्सें बच्चों की देखभाल में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं। चाइल्ड लाइन की टीम 24 घंटे उनकी निगरानी में जुटी है। फिलहाल बेटा पूरी तरह स्वस्थ हैजबकि बेटी को हल्के पीलिया के कारण फोटोथैरेपी दी जा रही है। नीली रोशनी और बेजान दीवारों के बीच दोनों सुरक्षित तो हैं, लेकिन वह सुकून और गर्माहट यहां गायब है जो मां के आंचल में मिलती है। वार्ड के सन्नाटे में इन मासूम चेहरों को देखकर हर संवेदनशील दिल बस यही पूछ रहा है कि आखिर इनकी पहली गलती क्या थी, जन्म लेना, या इन हालातों में आंखें खोलना।
1.80 लाख में हुई थी मासूमों की सौदेबाजी
विशुनगढ़ क्षेत्र के एक गांव की रहने वाली एक विधवा ने करीब आठ दिन पहले इन जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था। आरोप है कि आर्थिक तंगी से जूझ रही महिला ने दोनों नवजातों को 1.80 लाख रुपये में अलग-अलग लोगों को सौंपने की सहमति दे दी थी। इसके लिए स्टांप पेपर पर लिखा पढ़ी किए जाने की बात भी सामने आई। भनक लगते ही चाइल्ड लाइन, बाल संरक्षण इकाई और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए दोनों नवजातों को सुरक्षित रेस्क्यू किया और जिला अस्पताल में भर्ती कराया। फिलहाल मां का कोई सुराग नहीं मिल पा रहा है।
वर्जन
दोनों नवजात पूरी तरह सुरक्षित हैं। सभी आवश्यक चिकित्सकीय जांचें पूरी कर ली गई हैं। बच्ची को हल्के पीलिया के चलते फोटोथैरेपी दी जा रही है। हमारी टीम 24 घंटे दोनों की सेहत पर नजर बनाए हुए है।
-डॉ. गोपाल नारायण द्विवेदी, सीएमएस, जिला अस्पताल