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Kanpur News: हर साल बढ़ रहे ब्रेन स्ट्रोक के साढ़े 12 लाख रोगी
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कानपुर। देश में हर वर्ष साढ़े 12 लाख रोगी ब्रेन स्ट्रोक के बढ़ रहे हैं। इसका कारण धूम्रपान, शराब, तनाव और बदलती जीवनशैली है। इनमें करीब 20 प्रतिशत युवा हैं। यह जानकारी परेड स्थित आईएमए भवन में लखनऊ से आए डॉ. रोहित अग्रवाल ने आईएमए सीजीपी रिफ्रेशर्स कोर्स के अंतिम दिन रविवार को दी।
उन्होंने कहा कि लोग ब्रेन स्ट्रोक को समझने में देरी कर देते हैं, इससे पैरालिसिस का खतरा बढ़ जाता है। गोल्डन पीरियड यानी रोगी छह घंटे के अंदर आ जाए तो काफी हद तक सही होने की गुंजाइश रहती है। नई तकनीक न्यूरोइंटरवेंशन रेडियोलॉजी से 24 घंटे के अंदर भी आने वाले रोगी को काफी हद तक बचा लेते हैं। डॉ. रोहित ने बताया कि जब ब्रेन स्ट्रोक का कोई रोगी आता है तो हम उसके हाथ या पैर की नसों से तार को डालकर ब्रेन में जमे रक्त के थक्के को बाहर निकाल देते हैं।
उन्होंने कहा कि अगर चलने में लड़खड़ाहट, मुंह टेढ़ा होना, अचानक दिखना बंद हो जाए तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से मिलें। लखनऊ से आए डॉ. अवधेश के जायसवाल ने दिमाग में ट्यूमर निकालने की ऑर्बिट के माध्यम से ब्रेन ट्यूमर सर्जरी के बारे में बताया। कार्यक्रम की शुरुआत अपर निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण डॉ. जीके मिश्रा, अध्यक्ष डॉ. अनुराग मेहरोत्रा, सीएसजेएमयू के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक, सचिव डॉ. शालिनी मोहन, कार्यक्रम सचिव डॉ. शरद दमेले, डॉ. गौरव मिश्रा, डॉ. दीपक श्रीवास्तव ने की। डॉ. प्रतिमा, डॉ. अमित सिंह, डॉ. गौरव चावला, डॉ. विशाल सिंह, डॉ. विकास मिश्रा, डॉ. नंदिनी रस्तोगी, डॉ. अर्चना भदौरिया, डॉ. कुनाल सहाय आदि मौजूद रहे।
लिवर रोगी जरूर कराते रहें किडनी जांच
लखनऊ से आए डॉ. अंशुमान एहलेंस ने बताया कि लिवर रोगी अपनी किडनी की जांच भी जरूर कराते रहें। बड़ी संख्या में रोगी लिवर सिरोसिस के बावजूद किडनी जांच नहीं कराते और अंत में एक्यूट किडनी इंजरी की दिक्कत होती है। सिरोसिस के चलते रक्त का बहाव बाधित होता है जिससे नस में दबाव बढ़ जाता है। इस दबाव का असर किडनी पर भी पड़ता है और किडनी खून साफ करने की क्षमता खो देती है। आगरा से आए डॉ. सुमित लावानिया ने मोटापे, लखनऊ से आए डॉ. समीर मोहिंद्रा ने एंडोस्कोपिक प्रबंधन, डॉ. प्रतीक ने एनाटॉमी के बारे में बताया।
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उन्होंने कहा कि लोग ब्रेन स्ट्रोक को समझने में देरी कर देते हैं, इससे पैरालिसिस का खतरा बढ़ जाता है। गोल्डन पीरियड यानी रोगी छह घंटे के अंदर आ जाए तो काफी हद तक सही होने की गुंजाइश रहती है। नई तकनीक न्यूरोइंटरवेंशन रेडियोलॉजी से 24 घंटे के अंदर भी आने वाले रोगी को काफी हद तक बचा लेते हैं। डॉ. रोहित ने बताया कि जब ब्रेन स्ट्रोक का कोई रोगी आता है तो हम उसके हाथ या पैर की नसों से तार को डालकर ब्रेन में जमे रक्त के थक्के को बाहर निकाल देते हैं।
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उन्होंने कहा कि अगर चलने में लड़खड़ाहट, मुंह टेढ़ा होना, अचानक दिखना बंद हो जाए तो तुरंत न्यूरोलॉजिस्ट से मिलें। लखनऊ से आए डॉ. अवधेश के जायसवाल ने दिमाग में ट्यूमर निकालने की ऑर्बिट के माध्यम से ब्रेन ट्यूमर सर्जरी के बारे में बताया। कार्यक्रम की शुरुआत अपर निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण डॉ. जीके मिश्रा, अध्यक्ष डॉ. अनुराग मेहरोत्रा, सीएसजेएमयू के कुलपति प्रो. विनय कुमार पाठक, सचिव डॉ. शालिनी मोहन, कार्यक्रम सचिव डॉ. शरद दमेले, डॉ. गौरव मिश्रा, डॉ. दीपक श्रीवास्तव ने की। डॉ. प्रतिमा, डॉ. अमित सिंह, डॉ. गौरव चावला, डॉ. विशाल सिंह, डॉ. विकास मिश्रा, डॉ. नंदिनी रस्तोगी, डॉ. अर्चना भदौरिया, डॉ. कुनाल सहाय आदि मौजूद रहे।
लिवर रोगी जरूर कराते रहें किडनी जांच
लखनऊ से आए डॉ. अंशुमान एहलेंस ने बताया कि लिवर रोगी अपनी किडनी की जांच भी जरूर कराते रहें। बड़ी संख्या में रोगी लिवर सिरोसिस के बावजूद किडनी जांच नहीं कराते और अंत में एक्यूट किडनी इंजरी की दिक्कत होती है। सिरोसिस के चलते रक्त का बहाव बाधित होता है जिससे नस में दबाव बढ़ जाता है। इस दबाव का असर किडनी पर भी पड़ता है और किडनी खून साफ करने की क्षमता खो देती है। आगरा से आए डॉ. सुमित लावानिया ने मोटापे, लखनऊ से आए डॉ. समीर मोहिंद्रा ने एंडोस्कोपिक प्रबंधन, डॉ. प्रतीक ने एनाटॉमी के बारे में बताया।
