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Kanpur News: अब बाॅयो सिंथेटिक कॉर्निया से दूर होगी अंधता
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कानपुर। देश में हर वर्ष दो लाख कॉर्निया की आवश्यकता है लेकिन दान सिर्फ 50 हजार हो रही हैं। इनमें 25 हजार ही सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित हो पा रही हैं। अंधता को दूर करने के लिए काफी शोध के बाद अब बॉयो सिंथेटिक कॉर्निया तैयार की गई हैं। एम्स दिल्ली में ये कॉर्निया 70 लोगों में प्रत्यारोपित की जा चुकी हैं। कॉर्निया पूरी तरह आंखों जितनी पारदर्शी हैं। ये सभी 70 लोग आराम से देख पा रहे हैं। यह जानकारी बेनाझाबर स्थित होटल में कानपुर ऑप्थेल्मिक सोसाइटी और कनिका हॉस्पिटल की ओर से आयोजित कनिका कॉन में एम्स दिल्ली के डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेत्र विज्ञान केंद्र की प्रोफेसर डॉ. नम्रता शर्मा ने दी।
डॉ. नम्रता ने बताया कि बाॅयो सिंथेटिक कॉर्निया के कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। इसके फेल्योर होने की संभावना भी नहीं है। इसमें रोगी के आंख में टांके भी नहीं लगाने होते हैं। इसलिए संक्रमण का खतरा भी नहीं होता है। जल्द ही इसे सभी के लिए शुरू किया जाएगा। हमारी कोशिश रहेगी कि इसमें कम से कम खर्च आए। अहमदाबाद से आए डॉ. तेजस शाह, चेन्नई से डॉ. आनंद, मुंबई से डॉ. कुमार आदि ने नई तकनीक पर जानकारी दी।
कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि सीएसजेएमयू के कुलपति प्रोफेसर डॉ. विनय पाठक, मेरठ मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता, डॉ. शरद बाजपेई, डॉ. अवध दुबे, डॉ. सोनिया दमेले, डॉ. शालिनी मोहन ने की। इसके बाद पत्रिका का विमोचन किया गया। इस मौके पर डॉ. गौरव, डॉ. पारुल, डॉ. पल्लवी, डॉ. आकाश डॉ. संगीता शुक्ला, डॉ. मोहित खत्री, डॉ. आकांक्षा सिंह आदि मौजूद रहे।
जिन लोगों के चश्मे का नंबर माइनस टू से बढ़ता जा रहा है, उनकी आंख का पर्दा भी फट सकता है। यह जानकारी अलीगढ़ से आए डॉ. अनुपम आहूजा ने दी। उन्होंने बताया कि जब चश्मे का नंबर बढ़ता है तो परदे में छोटे-छोटे छेद हो जाते हैं। ये छेद धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं और फिर पर्दा फट जाता है। इसलिए अगर आंखों का नंबर माइनस टू पहुंच गया है तो पर्दे की जांच जरूर कराएं। ऐसा हर 100 रोगियों में 10-12 में हो रहा है।
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डॉ. नम्रता ने बताया कि बाॅयो सिंथेटिक कॉर्निया के कोई साइड इफेक्ट भी नहीं है। इसके फेल्योर होने की संभावना भी नहीं है। इसमें रोगी के आंख में टांके भी नहीं लगाने होते हैं। इसलिए संक्रमण का खतरा भी नहीं होता है। जल्द ही इसे सभी के लिए शुरू किया जाएगा। हमारी कोशिश रहेगी कि इसमें कम से कम खर्च आए। अहमदाबाद से आए डॉ. तेजस शाह, चेन्नई से डॉ. आनंद, मुंबई से डॉ. कुमार आदि ने नई तकनीक पर जानकारी दी।
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कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि सीएसजेएमयू के कुलपति प्रोफेसर डॉ. विनय पाठक, मेरठ मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आरसी गुप्ता, डॉ. शरद बाजपेई, डॉ. अवध दुबे, डॉ. सोनिया दमेले, डॉ. शालिनी मोहन ने की। इसके बाद पत्रिका का विमोचन किया गया। इस मौके पर डॉ. गौरव, डॉ. पारुल, डॉ. पल्लवी, डॉ. आकाश डॉ. संगीता शुक्ला, डॉ. मोहित खत्री, डॉ. आकांक्षा सिंह आदि मौजूद रहे।
जिन लोगों के चश्मे का नंबर माइनस टू से बढ़ता जा रहा है, उनकी आंख का पर्दा भी फट सकता है। यह जानकारी अलीगढ़ से आए डॉ. अनुपम आहूजा ने दी। उन्होंने बताया कि जब चश्मे का नंबर बढ़ता है तो परदे में छोटे-छोटे छेद हो जाते हैं। ये छेद धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं और फिर पर्दा फट जाता है। इसलिए अगर आंखों का नंबर माइनस टू पहुंच गया है तो पर्दे की जांच जरूर कराएं। ऐसा हर 100 रोगियों में 10-12 में हो रहा है।
