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मंदी की आहट: कानपुर होजरी उद्योग से तीन हजार लोगों की छुट्टी, दर्जन भर इकाइयों में लगा ताला

Sun, 25 Aug 2019 07:52 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर
प्रदीप अवस्थी, अमर उजाला, कानपुर Published by: प्रभापुंज मिश्रा Updated Sun, 25 Aug 2019 07:52 PM IST
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Three thousand people leave from hosiery industry in kanpur
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
कानपुर में दबे पांव आई आर्थिक मंदी से शहर के होजरी उद्योग को बड़ा झटका लगा है। बीते एक वर्ष में दर्जन भर से अधिक बुनाई, सिलाई, कटाई और रंगाई इकाइयों में ताला लग चुका है। इनमें काम करने वाले तीन हजार से ज्यादा लोगों की छुट्टी हो चुकी है।
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करीब इतने ही लोगों का अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ा रोजगार का जरिया खत्म हो गया है। बाजार के हालात से कारोबारी तो चिंतित हैं ही, रोजगार को लेकर कर्मचारियों की भी नींद उड़ी हुई है। नोटबंदी के बाद से शहर का कोई भी उद्योग अपने पुराने स्वरूप में वापस नहीं आ सका।
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होजरी उद्योग से जुड़े कारोबारी बताते हैं कि कुंभ के दौरान (दिसंबर से जनवरी 2018 तक) शहर की कपड़ा रंगाई इकाइयां एक महीना बंद रहीं। उस दौरान लगता था कि रंगाई इकाइयां खुलेंगी तो अच्छे आर्डर मिलेंगे और वे समय पर आपूर्ति नहीं दे पाएंगे।
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धागों के दाम 25 रुपये किलो तक गिरे 

आमतौर पर कॉटन होजरी के आर्डर के लिए दिसंबर से फरवरी ही प्रमुख सीजन होता है। इस दौरान गर्मी के आइटम तैयार होते हैं। कुंभ के बाद इकाइयां खुलीं तो आर्डर में 40 फीसदी तक की गिरावट रही। इसके दो कारण रहे। एक तो बाजार में मंदी का दखल हो चुका था।

दूसरा, कुंभ में बंदी की वजह से आर्डर दूसरे राज्यों को चले गए। नतीजा ये हुआ कि करीब आधा दर्जन सिलाई और कटाई इकाइयों को कर्मचारियों की संख्या घटानी पड़ी। बाद में कुछ में ताला लग गया। इसी तरह आर्डर न मिलने से कुछ रंगाई इकाइयां भी बंद हुईं।

 

कुछ ने कर्मचारियों की संख्या घटा दी। अब सर्दियों के लिए आर्डर मिलने की बारी है, लेकिन बाजार की सुस्ती की वजह से नए माल की मांग बहुत कम है। हालात ऐसे ही रहे तो छह माह से नुकसान उठा रहीं कुछ और इकाइयों में ताला लग सकता है। शहर का होजरी उद्योग प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों को पूरा न कर पाने की वजह से परेशान है। 

होजरी के आइटम की मांग कम होने की वजह से इसकी बुनाई में इस्तेमाल होने वाले धागे के दाम भी 25 रुपये किलो तक कम हो गए हैं। आम तौर पर इन धागों के दाम दो से पांच रुपये किलो तक ही कम होते थे। ये धागे 175 से 250 रुपये किलो तक आते हैं।  



 

ये है कारोबार का स्वरूप

150 इकाइयों में तैयार होता होजरी का धागा और कपड़ा  
500 इकाइयां बनाती हैं होजरी के तमाम तरह के उत्पाद 
2000 इकाइयों में होती है होजरी उत्पादों की सिलाई, कटाई 
50 डाइंग इकाइयां, इनमें होती हैं कपड़े की रंगाई


नार्दर्न होजरी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज बंका ने बताया एक साल में दर्जन भर से अधिक इकाइयों में ताला लगा है। इसके पीछे मंदी का असर तो है ही, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों को छोटे उद्यमियों पर जबरन थोपा जाना भी है। कारोबार करना दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है। उद्योग चलाने की सहूलियत के बजाय उसे पेचीदा बनाया जा रहा है। इसी वजह से एक के बाद एक इकाइयां बंद होती जा रही हैं। हालात न सुधरे तो छोटे उद्यमियों की कुछ और इकाइयां बंद हो सकती हैं। 
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