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Kaushambi News: गांधी चबूतरा...एकता के सूत्र में बांधने की परिकल्पना
संवाद न्यूज एजेंसी, कौशांबी
Updated Fri, 30 Jan 2026 01:56 AM IST
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आजादी की लड़ाई के दौरान गांव-गांव में बने गांधी चबूतरे सिर्फ चौपाल का अड्डा नहीं, लोगों में एकता का संचार और आजादी में उनकी भागीदारी की परिकल्पना के साथ बनाए गए थे। लेकिन इनका संरक्षण नहीं किया गया और वक्त के साथ गांधी की निशानी मिटती गई।
कभी गांधी चबूतरे गांव की आत्मा माने जाते थे। यह सामाजिक एकता, संवाद और सामूहिक निर्णय के केंद्र हुआ करते थे। ब्रिटिश साम्राज्य के अंतिम दौर में इन चबूतरों पर ग्रामीण एकत्र होकर देश की आजादी, सामाजिक सुधार और आपसी समस्याओं पर चर्चा करते थे। लोगों के पास संवाद के लिए अब मोबाइल और सोशल मीडिया जैसे नए माध्यम आ गए हैं। ऐसे में लोग इन गांधी चबूतरों से दूर होते चले गए। इसके साथ ही सामूहिक बैठकों की परंपरा भी कम हो गई है। संवाद
100 से अधिक गांवों में हुआ था निर्माण
जिले में 451 ग्राम पंचायतों में से करीब 100 से अधिक गांव में गांधी चबूतरे के निर्माण होने की बात बुजुर्ग बताते हैं। टेवां के चंद्रिका प्रसाद बताते हैं कि गांधी चबूतरे का निर्माण ओसा के श्रीदुर्गा देवी इंटर कॉलेज, नेशनल इंटर कॉलेज भरवारी परिसर के साथ ही टेवां गांव में हुआ था। चरवा में भी इसका निर्माण किया गया था। समय के साथ ही यह टूट गए। लोगों ने इनका निजी प्रयोग शुरू कर दिया।
ग्राम न्यायालय के रूप में करते थे काम
श्रीमान सिंह इंटर कॉलेज अलीपुर जीता के प्रधानाचार्य एलबी मिश्रा बताते हैं कि गांधी चबूतरा अपने समय में जन संपर्क, आपसी चर्चा व अन्य प्रकार की समस्याओं के समाधान का बड़ा केंद्र होता था। दूसरे शब्दों उसे ग्राम न्यायालय कहा जा सकता है। यही पर सामाजिक सौहार्द बना बनाए रखते हुए गांव के लोग अपनी समस्याओं पर चर्चा कर बड़े से बड़ा फैसला कर लेते थे।
चबूतरे से दिए जाते थे दांडी यात्रा के संदेश
समाज सेवी बैजनाथ मिश्रा बताते हैं कि गांधी जी ने दांडी यात्रा के दौरान जो विचार रखें थे। उनको जन-जन तक पहुंचाने के लिए इन चबूतरों का निर्माण उस दौरान लोगों ने किया था। उसके बाद गांव-गांव गांधी जी के संदेश को देने के लिए चबूतरे बने। यह आज नहीं हैं लेकिन, उस दौरान ये उपयोगी थे।
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कभी गांधी चबूतरे गांव की आत्मा माने जाते थे। यह सामाजिक एकता, संवाद और सामूहिक निर्णय के केंद्र हुआ करते थे। ब्रिटिश साम्राज्य के अंतिम दौर में इन चबूतरों पर ग्रामीण एकत्र होकर देश की आजादी, सामाजिक सुधार और आपसी समस्याओं पर चर्चा करते थे। लोगों के पास संवाद के लिए अब मोबाइल और सोशल मीडिया जैसे नए माध्यम आ गए हैं। ऐसे में लोग इन गांधी चबूतरों से दूर होते चले गए। इसके साथ ही सामूहिक बैठकों की परंपरा भी कम हो गई है। संवाद
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100 से अधिक गांवों में हुआ था निर्माण
जिले में 451 ग्राम पंचायतों में से करीब 100 से अधिक गांव में गांधी चबूतरे के निर्माण होने की बात बुजुर्ग बताते हैं। टेवां के चंद्रिका प्रसाद बताते हैं कि गांधी चबूतरे का निर्माण ओसा के श्रीदुर्गा देवी इंटर कॉलेज, नेशनल इंटर कॉलेज भरवारी परिसर के साथ ही टेवां गांव में हुआ था। चरवा में भी इसका निर्माण किया गया था। समय के साथ ही यह टूट गए। लोगों ने इनका निजी प्रयोग शुरू कर दिया।
ग्राम न्यायालय के रूप में करते थे काम
श्रीमान सिंह इंटर कॉलेज अलीपुर जीता के प्रधानाचार्य एलबी मिश्रा बताते हैं कि गांधी चबूतरा अपने समय में जन संपर्क, आपसी चर्चा व अन्य प्रकार की समस्याओं के समाधान का बड़ा केंद्र होता था। दूसरे शब्दों उसे ग्राम न्यायालय कहा जा सकता है। यही पर सामाजिक सौहार्द बना बनाए रखते हुए गांव के लोग अपनी समस्याओं पर चर्चा कर बड़े से बड़ा फैसला कर लेते थे।
चबूतरे से दिए जाते थे दांडी यात्रा के संदेश
समाज सेवी बैजनाथ मिश्रा बताते हैं कि गांधी जी ने दांडी यात्रा के दौरान जो विचार रखें थे। उनको जन-जन तक पहुंचाने के लिए इन चबूतरों का निर्माण उस दौरान लोगों ने किया था। उसके बाद गांव-गांव गांधी जी के संदेश को देने के लिए चबूतरे बने। यह आज नहीं हैं लेकिन, उस दौरान ये उपयोगी थे।
