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Kushinagar News: जच्चा-बच्चा की मौत के बाद खुली आयर्वेद क्लिनिक की कलई, एक दशक से चल रहा था खेल
संवाद न्यूज एजेंसी, कुशीनगर
Updated Mon, 22 Jun 2026 02:05 AM IST
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मंसाछापर। प्रसव के बाद जच्चा-बच्चा की मौत के बाद सील किए गए विशुनपुरा ब्लॉक के जंगल सिंघापट्टी गांव के बांसी चौराहे पर स्थित आयर्वेद क्लिनिक को लेकर चौंकाने वाले तथ्य सामने आ रहे हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, करीब दस वर्ष पहले बिहार का संचालक बांसी पहुंचा और छोटे स्तर से क्लिनिक की शुरुआत की थी। बाद में प्रसव और महिलाओं के इलाज का बड़ा केंद्र बना लिया। आरोप है कि बिना मानक और सुविधा के यहां वर्षों से प्रसव कराया जाता था। संचालक की पत्नी बिहार में स्टाफ नर्स है। वही क्लीनिक पर प्रसव कराती थी। दलालों के माध्यम से सामान्य प्रसव का झांसा देकर गर्भवती महिलाओं को बुलाया जाता था।
सूत्रों ने बताया कि क्लिनिक में प्रसव के लिए बिहार के धनहा क्षेत्र में तैनात एक स्टाफ नर्स की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। स्टाफ नर्स होने के से उसका आशा कार्यकर्ताओं से संपर्क था। आरोप है कि आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को क्लिनिक तक लाया जाता था। गरीब और ग्रामीण परिवार सरकारी अस्पताल के बजाय इसी क्लिनिक का रुख करते रहे।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से यह गतिविधि चल रही थी, इसकी शिकायत स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों से गांव वाले पूर्व में किए थे, लेकिन तगड़ी सेटिंग होने के कारण जिम्मेदार कार्रवाई से बचते रहे। कई बार प्रसव के दौरान विवाद हो चुके हैं। शिकायत भी की गईं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों ने मामले को दबा दिया। यही वजह रही कि क्लिनिक का संचालन जारी रहा। शनिवार को जच्चा और नवजात की मौत के बाद जब परिजनों ने सड़क जाम कर विरोध जताया, तब स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया और क्लिनिक को सील करने की कार्रवाई की गई।
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दस साल में क्लिनिक से बना कमाई का केंद्र
करीब दस वर्ष पहले बांसी चौराहे पर खुली क्लिनिक धीरे-धीरे इलाके में प्रसव कराने का केंद्र बन गई। स्थानीय लोगों के अनुसार शुरुआत में यहां सामान्य बीमारियों का इलाज होता था। बाद में प्रसव कराने का केंद्र बन गया। ग्रामीणों का कहना है कि प्रसव के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती थी। इसी कमाई के बल पर संचालक ने अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली। क्षेत्र के लोगों का आरोप है कि वर्षों से चल रहे इस धंधे की जानकारी अधिकारियों को भी थी, लेकिन कभी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
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आशा कार्यकर्ता के नेटवर्क से पहुंचती थीं गर्भवती महिलाएं
जच्चा-बच्चा की मौत के बाद सामने आई जानकारी ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि बिहार के धनहा क्षेत्र में तैनात एक स्टाफ नर्स के माध्यम से आशा कार्यकर्ताओं का नेटवर्क क्लिनिक से जुड़ा था। गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल की बजाय निजी क्लिनिक तक पहुंचाया जाता था। गांवों में चर्चा है कि यदि आशाओं की गतिविधियों और मरीजों की आवाजाही की समय-समय पर जांच होती तो अवैध प्रसव का यह सिलसिला पहले ही सामने आ सकता था।
वर्जन::
-आयुर्वेद क्लीनिक संचालन के लिए एक साल पहले आवेदन किया गया था, लेकिन रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। अवैध तरीके से क्लीनिक का संचालन चला रहा था। क्लीनिक पर नोटिस चस्पा कराया गया है। तय समय में जवाब नहीं देने पर विभागीय व विधिक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। -डॉ. चंद्रप्रकाश, सीएमओ
अधिक रक्तस्राव से हुई थी महिला की मौत
-शनिवार को सिंघापट्टी गांव में संचालित आयुर्वेंद क्लीनिक में प्रसव के बाद बिहार केे पश्चिमी चंपारण जिले के धनहा थाना क्षेत्र के खेतहवा गांव के वार्ड नंबर 11 निवासी विकास यादव की 28 वर्षीय पत्नी रजनी देवी की मौत के बाद रविवार को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अधिक रक्तस्राव से मौत की पुष्टि हुई है।
सूत्रों ने बताया कि क्लिनिक में प्रसव के लिए बिहार के धनहा क्षेत्र में तैनात एक स्टाफ नर्स की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। स्टाफ नर्स होने के से उसका आशा कार्यकर्ताओं से संपर्क था। आरोप है कि आशा कार्यकर्ताओं के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को क्लिनिक तक लाया जाता था। गरीब और ग्रामीण परिवार सरकारी अस्पताल के बजाय इसी क्लिनिक का रुख करते रहे।
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स्थानीय लोगों का आरोप है कि वर्षों से यह गतिविधि चल रही थी, इसकी शिकायत स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों से गांव वाले पूर्व में किए थे, लेकिन तगड़ी सेटिंग होने के कारण जिम्मेदार कार्रवाई से बचते रहे। कई बार प्रसव के दौरान विवाद हो चुके हैं। शिकायत भी की गईं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदारों ने मामले को दबा दिया। यही वजह रही कि क्लिनिक का संचालन जारी रहा। शनिवार को जच्चा और नवजात की मौत के बाद जब परिजनों ने सड़क जाम कर विरोध जताया, तब स्वास्थ्य विभाग हरकत में आया और क्लिनिक को सील करने की कार्रवाई की गई।
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दस साल में क्लिनिक से बना कमाई का केंद्र
करीब दस वर्ष पहले बांसी चौराहे पर खुली क्लिनिक धीरे-धीरे इलाके में प्रसव कराने का केंद्र बन गई। स्थानीय लोगों के अनुसार शुरुआत में यहां सामान्य बीमारियों का इलाज होता था। बाद में प्रसव कराने का केंद्र बन गया। ग्रामीणों का कहना है कि प्रसव के नाम पर मोटी रकम वसूली जाती थी। इसी कमाई के बल पर संचालक ने अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर ली। क्षेत्र के लोगों का आरोप है कि वर्षों से चल रहे इस धंधे की जानकारी अधिकारियों को भी थी, लेकिन कभी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
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आशा कार्यकर्ता के नेटवर्क से पहुंचती थीं गर्भवती महिलाएं
जच्चा-बच्चा की मौत के बाद सामने आई जानकारी ने स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि बिहार के धनहा क्षेत्र में तैनात एक स्टाफ नर्स के माध्यम से आशा कार्यकर्ताओं का नेटवर्क क्लिनिक से जुड़ा था। गर्भवती महिलाओं को सरकारी अस्पताल की बजाय निजी क्लिनिक तक पहुंचाया जाता था। गांवों में चर्चा है कि यदि आशाओं की गतिविधियों और मरीजों की आवाजाही की समय-समय पर जांच होती तो अवैध प्रसव का यह सिलसिला पहले ही सामने आ सकता था।
वर्जन::
-आयुर्वेद क्लीनिक संचालन के लिए एक साल पहले आवेदन किया गया था, लेकिन रजिस्ट्रेशन नहीं हुआ। अवैध तरीके से क्लीनिक का संचालन चला रहा था। क्लीनिक पर नोटिस चस्पा कराया गया है। तय समय में जवाब नहीं देने पर विभागीय व विधिक कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। -डॉ. चंद्रप्रकाश, सीएमओ
अधिक रक्तस्राव से हुई थी महिला की मौत
-शनिवार को सिंघापट्टी गांव में संचालित आयुर्वेंद क्लीनिक में प्रसव के बाद बिहार केे पश्चिमी चंपारण जिले के धनहा थाना क्षेत्र के खेतहवा गांव के वार्ड नंबर 11 निवासी विकास यादव की 28 वर्षीय पत्नी रजनी देवी की मौत के बाद रविवार को आई पोस्टमार्टम रिपोर्ट में अधिक रक्तस्राव से मौत की पुष्टि हुई है।