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Lakhimpur Kheri News: टेसू के रंग फीके, पर यादें अब भी गहरी

संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी Updated Sun, 01 Mar 2026 11:55 PM IST
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The colors of the Tesu have faded, but the memories remain strong
श्याम सुंदर यादव
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बिझौली। हंसी-ठिठोली, प्रेम, सौहार्द और एकता के रंगों से सराबोर होली आज भी मनाई जाती है, लेकिन बदलती जीवनशैली ने इसके स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है। ऐसे में गांव के बुजुर्गों को अपने बचपन की होली आज भी शिद्दत से याद आती है। वे कहते हैं कि पहले त्योहार दिलों को जोड़ने का माध्यम था, अब महज औपचारिकता बनता जा रहा है।
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बुजुर्ग बताते हैं कि होली के बहाने वर्षों पुराने गिले-शिकवे मिट जाते थे। फगुनहट की बयार, टेसू के फूलों की सौंधी खुशबू और चौपालों पर गूंजते पारंपरिक होली गीत अब यादों तक सिमट कर रह गए हैं।
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पंचमी से ही चढ़ता था होली का रंग

पचहत्तर वर्षीय श्यामसुंदर यादव बताते हैं कि वसंत पंचमी से ही होली का खुमार शुरू हो जाता था और अमावस्या तक उत्सव का माहौल रहता था। गांव में जब दामाद या बहनोई होली पर आते थे तो विशेष उत्साह रहता था। बड़े-बुजुर्गों की अगुआई में सभी लोग ‘आखत’ डालने जाते थे और पूरे गांव में अपनापन झलकता था।
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ढोलक-मजीरे पर गूंजते थे फगुआ

रजागंज निवासी 70 वर्षीय अंबिका प्रसाद कहते हैं कि शाम होते ही चौपाल पर लोग इकट्ठा होते थे और ढोलक-मजीरे पर झूमकर फगुआ गाते थे। दिन भर काम करने के बाद भी थकान नहीं होती थी। आज न तो वैसी चौपालें बचीं, न ही वैसी स्वर लहरियां।
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पंद्रह दिन पहले और बाद तक रहती थी रौनक

सेवानिवृत्त शिक्षक 67 वर्षीय हरिपाल सिंह के अनुसार, पहले होली की रौनक 15 दिन पहले से शुरू होकर 15 दिन बाद तक रहती थी। साधन भले कम थे, लेकिन दिलों में स्नेह और अपनापन भरपूर था। होरिहारों की टोलियां द्वार-द्वार जाकर होली गीत गाती थीं और बदले में लोग मिठाई व नगद भेंट देते थे।
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रस्म अदायगी तक सिमटा त्योहार

रमुआपुर निवासी 80 वर्षीय राजेंद्र सिंह कहते हैं कि अब होली का उत्साह पहले जैसा नहीं रहा। त्योहार रस्म अदायगी तक सीमित हो गया है। पहले जो उमंग, जो सामूहिक आनंद था, वह अब आधुनिकता की चकाचौंध में कहीं खो गया है।

श्याम सुंदर यादव

श्याम सुंदर यादव

श्याम सुंदर यादव

श्याम सुंदर यादव

श्याम सुंदर यादव

श्याम सुंदर यादव

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