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Lakhimpur Kheri News: थारू बाहुल्य गांवों में बढ़ी माघी की रौनक
संवाद न्यूज एजेंसी, लखीमपुर खीरी
Updated Wed, 14 Jan 2026 11:52 PM IST
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मकरसंक्रांति पर्व माघी पर धनगढ़ी के थारू गांव में नाच गाना करते थारू चौधरी। स्रोत: ग्रामीण
- फोटो : सांकेतिक
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धनगढ़ी (नेपाल)। नेपाल के तराई क्षेत्र में थारू-चौधरी समुदाय के मुख्य पर्व मकर संक्रांति यानी माघी की धूम शुरू हो गई। सुदूर पश्चिम प्रदेश के कैलाली और कंचनपुर समेत दांग, बांके व बर्दिया जिलों के थारू गांवों में बुधवार से ही उत्सव का माहौल रहा।
थारू समुदाय इस पर्व को न केवल एक त्योहार, बल्कि अपने नव वर्ष के स्वागत में परंपरागत ढंग से मनाता है। युवतियों की टोलियों ने सखिया, झुमरा और भुवा जैसे पारंपरिक नृत्यों की प्रस्तुति दे रही हैं। इससे पूरा क्षेत्र थारू लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आ रहा है। 15 जनवरी को मुख्य पर्व होने के कारण गांवों में खासी चहल-पहल है।
थारू संवत के अनुसार, इसी दिन को समुदाय बंधुआ मजदूर और कमलहरी प्रथा से मुक्ति मिलने की याद में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाता है। लोकतांत्रिक परंपरा को जीवित रखते हुए आज के दिन ही गांव का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति भलमंसा का चयन भी किया जाता है। मान्यता के अनुसार, पर्व के दिन लोग तड़के ही पवित्र नदियों और तालाबों में डुबकी लगाकर पूजा-पाठ करते हैं। बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं।
विवाहित बेटियों को उपहार देने और एक-दूसरे को गले लगकर बधाई देने का रिवाज है। खान-पान की बात करें तो घरों में सूअर का मांस, घोंघी, मछली, केंकड़ा और विभिन्न प्रकार की मिठाइयां व पारंपरिक पकवान मेहमानों के लिए तैयार की जाती हैं। वर्तमान में गांव-गांव में नाच-गाने और मेल-मिलाप का दौर जारी है।
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थारू समुदाय इस पर्व को न केवल एक त्योहार, बल्कि अपने नव वर्ष के स्वागत में परंपरागत ढंग से मनाता है। युवतियों की टोलियों ने सखिया, झुमरा और भुवा जैसे पारंपरिक नृत्यों की प्रस्तुति दे रही हैं। इससे पूरा क्षेत्र थारू लोक संस्कृति के रंग में रंगा नजर आ रहा है। 15 जनवरी को मुख्य पर्व होने के कारण गांवों में खासी चहल-पहल है।
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थारू संवत के अनुसार, इसी दिन को समुदाय बंधुआ मजदूर और कमलहरी प्रथा से मुक्ति मिलने की याद में स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाता है। लोकतांत्रिक परंपरा को जीवित रखते हुए आज के दिन ही गांव का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति भलमंसा का चयन भी किया जाता है। मान्यता के अनुसार, पर्व के दिन लोग तड़के ही पवित्र नदियों और तालाबों में डुबकी लगाकर पूजा-पाठ करते हैं। बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं।
विवाहित बेटियों को उपहार देने और एक-दूसरे को गले लगकर बधाई देने का रिवाज है। खान-पान की बात करें तो घरों में सूअर का मांस, घोंघी, मछली, केंकड़ा और विभिन्न प्रकार की मिठाइयां व पारंपरिक पकवान मेहमानों के लिए तैयार की जाती हैं। वर्तमान में गांव-गांव में नाच-गाने और मेल-मिलाप का दौर जारी है।
