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UP:  21 साल बाद मिटा दामन पर लगा दुष्कर्म का दाग, तीन आरोपियों को मिली बड़ी राहत; कोर्ट ने किया बरी

Sat, 01 Aug 2026 06:35 PM IST
Arun Parashar संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी Published by: Arun Parashar Updated Sat, 01 Aug 2026 06:35 PM IST
सार

दुष्कर्म के मामले में कोर्ट ने 21 साल पुराने मामले में तीन आरोपियों को बड़ी राहत दी। आरोप साबित नहीं होने पर कोर्ट ने तीनों आरोपियों को बरी कर दिया। 

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Court acquits accused in woman assault case after 21 years
कोर्ट आदेश। (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क

विस्तार

मैनपुरी के थाना बिछवां क्षेत्र से जुड़े एक 21 वर्ष पुराने दुष्कर्म और अनुसूचित जाति-जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (एससीएसटी एक्ट) के मामले में शुक्रवार को न्यायालय ने तीन आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त करार दिया है। अपर सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश एससीएसटी (पीए) एक्ट जय प्रकाश की अदालत ने यह फैसला सुनाया, जिससे उक्त तीनों व्यक्तियों के दामन से दुष्कर्म का दाग मिट गया।
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यह मामला वर्ष 2006 में बिछवां थाने में दर्ज एक प्राथमिकी से जुड़ा है। एक अनुसूचित जाति की युवती ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि 31 दिसंबर 2005 की सुबह करीब 8:30 बजे फारूख, जो खुद को पुलिस का सिपाही बता रहा था और अपना नाम प्रमोद कह रहा था, उनके घर आया था। उसने युवती को थाने ले जाने की बात कही। आरोप के अनुसार, रास्ते में एक अमरूद के बाग में ले जाकर उसकी पिटाई की गई और दुष्कर्म किया गया। इसके बाद जान से मारने की धमकी देकर आरोपी चला गया। शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया था कि 17 अप्रैल 2005 को युवती की छोटी बहन के साथ भी दुष्कर्म की घटना हुई थी, इसमें भानु प्रताप उर्फ पिंटू चौहान और राजू शामिल थे।
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तीनों आरोपियों, फारूख (निवासी नदराला, थाना अलीगंज, जनपद एटा), भानु प्रताप उर्फ पिंटू चौहान (निवासी गांव बलारपुर रामनगर, थाना बिछवां) और राजू (निवासी कूकापुर, थाना जैतपुर, जनपद आगरा) के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने के बाद पुलिस ने विवेचना शुरू की थी। मामले की सुनवाई विशेष न्यायाधीश एससीएसटी (पीए) एक्ट, जय प्रकाश की अदालत में हुई। शुक्रवार को, न्यायालय ने पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में तीनों आरोपियों को दुष्कर्म और एससीएसटी एक्ट के आरोपों से बरी कर दिया।

 

अदालत में साबित नहीं हो सके आरोप
न्यायालय ने अभियोजन के साक्ष्यों का विश्लेषण करते हुए पाया कि पीड़िता और उसकी बहन के बयान में कई विसंगतियां हैं। घटना के तीन दिन बाद तहरीर देना, घटना के समय और जगह संबंधी विरोधाभास, चिकित्सकीय रिपोर्ट में कोई बाहरी चोट या दुष्कर्म की पुष्टि न होना, परिवार के बीच पुरानी रंजिश व कई मुकदमे दर्ज होने के कारण साक्षियों को हितबद्ध माना गया। अभियोजन पक्ष आरोपों को युक्तियुक्त संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।
 
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