ताजिया, रोजा और भाईचारा: मऊ में हिंदू-मुस्लिम एकता की अनूठी कहानी, मातम की रात भी जगमगाता है भाईचारे का दीप
मऊ जिले में मुहर्रम पर हिंदू ताजिये बनाते हैं और निकालते हैं। यहां मातम की रात भी भाईचारे का दीप जगमगाता है। गम से सराबोर इस्लामी माह मुहर्रम में हर गली और हर घर से ‘हाय हुसैन’ की सदा सुनाई देती है।
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यह सदा केवल शिया समुदाय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि हिंदू माली समुदाय के लोग भी इसमें शामिल होते हैं। यहां के हिंदू माली ताजिया भी निकालते हैं। यही नहीं, उनके हाथों से तैयार सेहरा और गेंदा कई ताजियों तक पहुंचता है। बगेदन माली ने बताया कि उनके पूर्वज यह काम करते आ रहे हैं इसलिए वह भी परंपरा निभाते हैं।
मौलाना नसिमुल हसन ने बताया हैं कि घोसी के बड़ागांव को आबाद करते समय शिया जमींदारों ने बगेदन माली और जंगली माली के पूर्वज सहदेव माली को यहां बसाया था।
वर्तमान में इनके परिवारों की संख्या बढ़कर छह से अधिक हो गई है। उसी समय से बगेदन माली के परिवार के लोग ताजिया रखने के साथ रोजा भी रखते हैं। सहदेव माली का ताजिया ताजियादारों में तीसरे स्थान पर निर्धारित है। परंपरा का निर्वहन आज भी शिवपूजन माली और उनके बच्चे कर रहे हैं।
सूर्यभान करते हैं मातम के साथ नौहाख्वानी
ताजिया जुलूसों की सजावट का दायित्व पीढ़ियों से इन हिंदू माली परिवारों के वंशज निभाते आ रहे हैं। हिंदू माली स्वयं भी ताजियेदार हैं, जिनके लबों पर ‘हाय हुसैन’ की गूंज रहती है। इन परिवारों को समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। इसके साथ ही सूर्यभान यादव भी मातम करने के साथ नौहाख्वानी करते हैं। हिंदू माली ताजियों पर लगने वाले गेंदा, गेंदिया, सेहरा, माला, फूल तथा दुलदुल की चादर के लिए ताल से लाई गई विशेष लकड़ी ‘खूंखड़ी’ से सजावटी सामग्री तैयार करते हैं।