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1987 हाशिमपुरा नरसंहार ने लहूलुहान किया भाईचारा, यहां आज भी नहीं मनाते ईद और होली

Wed, 31 Oct 2018 08:06 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ Updated Wed, 31 Oct 2018 08:06 PM IST
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1987 Hashimpura massacre case meerut ends brotherhood  Eid and Holi not celebrated
मेरठ न्यूज

14 अप्रैल 1987 को मेरठ में धार्मिक उन्माद की चिंगारी भड़की। छिटपुट घटनाएं शुरू हो गईं थी। आशंकाओं, अफवाहों और अटकलों ने इसे और भड़का दिया। तिल-तिल कर हालात बिगड़ते गए और मई तक आते आते पूरा शहर दंगे की आग की लपटों में घिर गया। बेलगाम दंगाई सड़कों पर दहशत फैला रहे थे। जिंदगियां घरों में कैद हो गईं। शासन प्रशासन नाकाफी साबित हुए तो सेना को मोर्चे पर उतारना पड़ा। पूरा मेरठ शहर सेना के हवाले कर दिया गया। उस वक्त के हालात बयां करती कुछ मार्मिक तस्वीरें:-

1987 Hashimpura massacre case meerut ends brotherhood  Eid and Holi not celebrated
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19 मई को प्रह्लाद नगर में उन्माद फैला गढ़ रोड पर मेटाडोर में आग लगाई गई। 20 मई को दंगाइयों ने अब्दुल्लापुर गांव में कई मकानों को आग के हवाले कर दिया। इसी बीच मेरठ के सोतीगंज में भी कई जगह आग की लपटे उठीं। 21 मई 1987 को कोटला में एक युवक की हत्या के बाद अफरा-तफरी मच गई। इसके बाद दंगाईयों को देखते ही गोली मारने के आदेश दे दिए गए। यहां तक कि रिक्शावालों को भी नहीं बख्शा। 23 मई 1987 को मलियाना गांव में हिंसा भड़की जिसके बाद चौकसी करते सेना के जवानों को लगाया गया। 24 मई को मेजर जनरल डीएन खुराना मलियाना में निरीक्षण करने पहुंचे। 

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चश्मदीद बताते हैं उस समय रात के करीब दस बजे थे। पीएसी का एक ट्रक मुरादनगर इलाके के पास पेड़ के नीचे आकर रुका। पूरा इलाका सुनसान था और चारों ओर अंधेरा छाया था। चालक ने ट्रक की लाइट बंद कर दी और लगातार गोलियों की आवाज देर तक गूंजती रही। पीएसी के जवान एक एक कर 42 लोगों के सीने में गोली उतारते गए और उन्हें मुरादनगर गंगनहर में फेंकते गए। पांच लोग किसी तरह जिंदा बच गए।    


 
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जीवित बचे बाबूदीन के अनुसार पीएसी के जवान जब लाशों को नदी में फेंककर चले गए तो थाना लिंकरोड की पुलिस उस जगह गश्त करती हुई पहुंची। उन्होंने आवाज लगाई कि गोलियों की आवाज तो यहीं से आ रही थी लेकिन यहां कोई नजर नहीं आ रहा। बाबूदीन ने बताया कि पुलिसकर्मियों को देख कर वह घबरा गया और नहर में काफी दूर तक तैरता हुआ आगे बढ़ने लगा। इस पर पुलिस वालों ने कहा- कौन है बाहर आओ, नहीं तो गोली मार देंगे। बाबूदीन ने बताया कि जब उसे ये भरोसा हो गया कि ये पुलिस वाले दूसरे हैं, तब वह नदी से बाहर निकला और पूरी बात बताई।

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दंगे की आग में झुलसे करीब 150 हिंदू परिवारों को हाशिमपुरा से पलायन करना पड़ा। यहां अब सिर्फ तीन हिंदू परिवार बचे हैं। बाकी का क्षेत्र बाजार का रूप ले चुका है तो वहीं यादव मंदिर के पास स्थित होली चौक पर दंगो के बाद से होलिका दहन नहीं किया जाता। इनमें पीडित परिवार हैं वे आज भी ईद नहीं मनाते। कोटला के लोगों को वर्ष 1987 से 1991 तक काफी दिक्कतें झेलनी पड़ी। दर्जनों परिवार दिल्ली, हरिद्वार की ओर पलायन कर गए तो कुछ शहर की अन्य कॉलोनियों में जाकर बस गए। 

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