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Muzaffarnagar News: बार की सियासत में अजेय प्रमोद त्यागी और सुरेंद्र मलिक
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बुढ़ाना। जिला बार सघ का अध्यक्ष बनने पर उनके आवास पर प्रमोद त्यागी का हुआ स्वागत। स्रोत परिजन
- फोटो : संवाद
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- डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन का शपथ ग्रहण समारोह आज
- फैंथम हॉल में होने वाले कार्यक्रम की चल रही हैं तैयारियां
मुजफ्फरनगर। पिछले पांच दशक में खूब दौर बदले। पैनल बदलते रहे और अधिवक्ताओं की संख्या भी बढ़ती चली गई। अध्यक्ष चुने गए प्रमोद त्यागी और महासचिव बने सुरेंद्र कुमार मलिक अपने अनुभव और समन्वय से सिरमौर बने रहे। अधिवक्ताओं के मुद्दों की पहचान कर नब्ज पकड़ने में दोनों दिग्गज अधिवक्ता सफल साबित हुए हैं।
इस बार पांच पैनल के बीच हुए इस बार के चुनाव में उठापटक होने की संभावना थी। असल में पिछली बार केवल सात वोट के अंतर से चुनाव हार गए अंजुम खान लगातार दूसरी बार भाग्य आजमा रहे थे। पूर्व अध्यक्ष अनिल जिंदल और सुरेंद्र मैनवाल के मैदान में उतरने से अध्यक्ष पद का चुनाव इस बार दिलचस्प हो गया। अुर्जन सिंह को केवल 57 वोट मिले।
नतीजों से साफ हो गया कि त्रिकोणीय मुकाबले में प्रमोद त्यागी अधिवक्ताओं का विश्वास जीतने में कामयाब रहे और 10वीं बार अध्यक्ष चुने गए। सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष त्यागी की निगाह अब 2027 में होने वाले बुढ़ाना विधानसभा के चुनाव पर है। सपा के टिकट के वह सबसे मजबूत दावेदारों में से एक हैं।
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प्रमोद त्यागी : 51 साल का अनुभव, 10वीं बार अध्यक्ष
फोटो
डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए बुढ़ाना के रहने वाले प्रमोद त्यागी ने वर्ष 1975 में वकालत शुरू की थी। वर्ष 1976 में वह संयुक्त सचिव चुने गए। सक्रियता के चलते 1983 में पहली बार महासचिव बने। अधिवक्ताओं के हितों के लिए संघर्षरत रहे। यही वजह है कि इस बार वह 10वीं बार अध्यक्ष पद का चुनाव जीत गए हैं। वह सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष हैं और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव से उनकी करीबियां रहीं। वर्ष 2002 और 2007 में सपा ने उन्हें खतौली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया। वर्ष 2027 में वह बुढ़ाना सीट से टिकट के सबसे बड़े दावेदारों में से एक हैं।
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सुरेंद्र मलिक : कैराना से सफर...13वीं बार सिरमौर
डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के महासचिव चुने गए सुरेंद्र कुमार मलिक मूल रूप से शामली के लांक गांव के रहने वाले हैं। वर्ष 1976 में कैराना तहसील से वकालत शुरू की। वर्ष 1983 में कचहरी पहुंचे और फिर यहीं के होकर रह गए। बाबू श्याम सिंह वर्मा के सानिध्य में वकालत की। इस बार महासचिव पद पर 13वीं बार रिकॉर्ड जीत दर्ज की है। वह हमेशा अधिवक्ताओं के साथ मिलकर चले, यही वजह है कि हर दौर में उन्हें वकीलों का भरपूर साथ मिला। शिक्षा के क्षेत्र में उनके पिता बलवीर सिंह को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था।
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अध्यक्ष पद पर मिले वोट
- प्रमोद त्यागी - 602
- अंजुम खान- 543
- अनिल जिंदल- 508
- सुरेंद्र पाल मैनवाल-177
- अर्जुन सिंह -57
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महासचिव
- सुरेंद्र कुमार मलिक- 587
- प्रदीप कुमार मलिक- 412
- जितेंद्र कुमार- 396
- नवाब अली चौधरी- 350
- विकास त्यागी- 138
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महिलाओं ने इन पदों पर दर्ज की जीत
मुजफ्फरनगर। डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के चुनाव में महिलाओं की भी हिस्सेदारी रही। सहसचिव के पद पर गीता रानी (865) और निशा रानी (689) विजयी रहीं। वरिष्ठ सदस्य पद पर शशि प्रभा (874) चुनी गई। कनिष्ठ सदस्य पद पर शिखा चौधरी (668) और कमरुना गौर (613) ने बाजी मारी। ब्यूरो
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पोरिया की स्वीकार्यता, 33 साल से करा रहे चुनाव
मुजफ्फरनगर। डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के चुनाव कराने में मुख्य चुनाव अधिकारी उदयवीर पोरिया का लंबा अनुभव है। वर्ष 1993 में पहली बार चुनाव अधिकारी बनाए गए। वह बताते हैं कि पहले तीन सदस्यीय कमेटी चुनाव कराती थी, फिर इसकी संख्या पांच और इसके बाद सात हुई। अधिवक्ताओं के स्नेह के चलते ही लगातार उन्हें चुनाव अधिकारी बनाया जा रहा है।
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- फैंथम हॉल में होने वाले कार्यक्रम की चल रही हैं तैयारियां
मुजफ्फरनगर। पिछले पांच दशक में खूब दौर बदले। पैनल बदलते रहे और अधिवक्ताओं की संख्या भी बढ़ती चली गई। अध्यक्ष चुने गए प्रमोद त्यागी और महासचिव बने सुरेंद्र कुमार मलिक अपने अनुभव और समन्वय से सिरमौर बने रहे। अधिवक्ताओं के मुद्दों की पहचान कर नब्ज पकड़ने में दोनों दिग्गज अधिवक्ता सफल साबित हुए हैं।
इस बार पांच पैनल के बीच हुए इस बार के चुनाव में उठापटक होने की संभावना थी। असल में पिछली बार केवल सात वोट के अंतर से चुनाव हार गए अंजुम खान लगातार दूसरी बार भाग्य आजमा रहे थे। पूर्व अध्यक्ष अनिल जिंदल और सुरेंद्र मैनवाल के मैदान में उतरने से अध्यक्ष पद का चुनाव इस बार दिलचस्प हो गया। अुर्जन सिंह को केवल 57 वोट मिले।
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नतीजों से साफ हो गया कि त्रिकोणीय मुकाबले में प्रमोद त्यागी अधिवक्ताओं का विश्वास जीतने में कामयाब रहे और 10वीं बार अध्यक्ष चुने गए। सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष त्यागी की निगाह अब 2027 में होने वाले बुढ़ाना विधानसभा के चुनाव पर है। सपा के टिकट के वह सबसे मजबूत दावेदारों में से एक हैं।
प्रमोद त्यागी : 51 साल का अनुभव, 10वीं बार अध्यक्ष
फोटो
डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष चुने गए बुढ़ाना के रहने वाले प्रमोद त्यागी ने वर्ष 1975 में वकालत शुरू की थी। वर्ष 1976 में वह संयुक्त सचिव चुने गए। सक्रियता के चलते 1983 में पहली बार महासचिव बने। अधिवक्ताओं के हितों के लिए संघर्षरत रहे। यही वजह है कि इस बार वह 10वीं बार अध्यक्ष पद का चुनाव जीत गए हैं। वह सपा के पूर्व जिलाध्यक्ष हैं और सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव से उनकी करीबियां रहीं। वर्ष 2002 और 2007 में सपा ने उन्हें खतौली विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाया। वर्ष 2027 में वह बुढ़ाना सीट से टिकट के सबसे बड़े दावेदारों में से एक हैं।
सुरेंद्र मलिक : कैराना से सफर...13वीं बार सिरमौर
डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के महासचिव चुने गए सुरेंद्र कुमार मलिक मूल रूप से शामली के लांक गांव के रहने वाले हैं। वर्ष 1976 में कैराना तहसील से वकालत शुरू की। वर्ष 1983 में कचहरी पहुंचे और फिर यहीं के होकर रह गए। बाबू श्याम सिंह वर्मा के सानिध्य में वकालत की। इस बार महासचिव पद पर 13वीं बार रिकॉर्ड जीत दर्ज की है। वह हमेशा अधिवक्ताओं के साथ मिलकर चले, यही वजह है कि हर दौर में उन्हें वकीलों का भरपूर साथ मिला। शिक्षा के क्षेत्र में उनके पिता बलवीर सिंह को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला था।
अध्यक्ष पद पर मिले वोट
- प्रमोद त्यागी - 602
- अंजुम खान- 543
- अनिल जिंदल- 508
- सुरेंद्र पाल मैनवाल-177
- अर्जुन सिंह -57
महासचिव
- सुरेंद्र कुमार मलिक- 587
- प्रदीप कुमार मलिक- 412
- जितेंद्र कुमार- 396
- नवाब अली चौधरी- 350
- विकास त्यागी- 138
महिलाओं ने इन पदों पर दर्ज की जीत
मुजफ्फरनगर। डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के चुनाव में महिलाओं की भी हिस्सेदारी रही। सहसचिव के पद पर गीता रानी (865) और निशा रानी (689) विजयी रहीं। वरिष्ठ सदस्य पद पर शशि प्रभा (874) चुनी गई। कनिष्ठ सदस्य पद पर शिखा चौधरी (668) और कमरुना गौर (613) ने बाजी मारी। ब्यूरो
पोरिया की स्वीकार्यता, 33 साल से करा रहे चुनाव
मुजफ्फरनगर। डिस्ट्रिक्ट बार एसोसिएशन के चुनाव कराने में मुख्य चुनाव अधिकारी उदयवीर पोरिया का लंबा अनुभव है। वर्ष 1993 में पहली बार चुनाव अधिकारी बनाए गए। वह बताते हैं कि पहले तीन सदस्यीय कमेटी चुनाव कराती थी, फिर इसकी संख्या पांच और इसके बाद सात हुई। अधिवक्ताओं के स्नेह के चलते ही लगातार उन्हें चुनाव अधिकारी बनाया जा रहा है।