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पीलीभीत टाइगर रिजर्व: मानव-बाघ संघर्ष को रोकने के लिए बड़ा कदम, टीओटीआर प्रोजेक्ट होगा लागू

संवाद न्यूज एजेंसी, पीलीभीत Updated Wed, 14 Jan 2026 01:15 PM IST
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सार

पीलीभीत टाइगर रिजर्व के जंगल से बाहर घूम रहे बाघों और अन्य वन्यजीवों के प्रबंधन के लिए टीओटीआर (टाइगर आउटसाइड द टाइगर रिजर्व) प्रोजेक्ट को इसी वित्तीय वर्ष में लागू करने की तैयारी पूरी कर ली गई है। मानव-बाघ संघर्ष को रोकने के लिए यह कदम उठाया गया है। 

major step to prevent human-tiger conflict in Pilibhit Tiger Reserve
पीलीभीत टाइगर रिजर्व में एक साथ घूमते दो बाघ। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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पीलीभीत टाइगर रिजर्व (पीटीआर) के बाहर रिहायशी इलाकों में बढ़ते मानव-बाघ संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए बड़ा कदम उठाया गया है। जंगल से बाहर घूम रहे बाघों और अन्य वन्यजीवों के प्रबंधन के लिए टीओटीआर (टाइगर आउटसाइड द टाइगर रिजर्व) प्रोजेक्ट को इसी वित्तीय वर्ष में लागू करने की तैयारी पूरी कर ली गई है। वन एवं वन्यजीव प्रभाग ने प्रथम चरण की वार्षिक कार्ययोजना तैयार कर केंद्र सरकार को भेज दी है। इससे प्रभाग को संसाधनों और प्रशिक्षण के स्तर पर आत्मनिर्भर बनाया जा सकेगा।

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पीलीभीत टाइगर रिजर्व बनने के बाद क्षेत्र में बाघों, तेंदुओं और अन्य वन्यजीवों की संख्या में तेजी से इजाफा हुआ है। इसके साथ ही जंगल की सीमा से बाहर निकलकर रिहायशी इलाकों और खेतों तक पहुंचने वाले बाघों की घटनाएं भी बढ़ी हैं।
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गन्ने के सीजन में वन्यजीवों सक्रियता अधिक बढ़ जाती है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी सामने आती हैं। वर्ष 2025 में करीब आठ लोगों की बाघ हमलों में मौत हुई। अब इस चुनौती से निपटने के लिए केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने टीओटीआर प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। यह परियोजना राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) के माध्यम से संचालित की जाएगी।

वन एवं वन्यजीव प्रभाग को सौंपी गई जिम्मेदारी 
इसके तहत लगभग 90 लाख रुपये का बजट निर्धारित किया गया है। इस पायलट प्रोजेक्ट को जमीन पर उतारने की जिम्मेदारी वन एवं वन्यजीव प्रभाग को सौंपी गई है। वर्तमान व्यवस्था में पीटीआर के अंदर बाघों के संरक्षण और प्रबंधन की जिम्मेदारी टाइगर रिजर्व प्रशासन के पास है, जबकि जंगल से बाहर निकलने वाले वन्यजीवों की निगरानी वन एवं वन्यजीव प्रभाग को करनी होती है। सीमित संसाधनों के चलते अब तक प्रभाग को पीटीआर पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन टीओटीआर प्रोजेक्ट लागू होने के बाद यह प्रभाग अपने स्तर पर बाघों के प्रबंधन और रेस्क्यू कार्यों को प्रभावी ढंग से अंजाम दे सकेगा। 

टीओटीआर प्रोजेक्ट में स्थानीय समुदायों और इको विकास समितियों (ईडीसी) की अहम भूमिका तय की गई है। कार्ययोजना के तहत ईडीसी का क्षमता विकास किया जाएगा और उन्हें वन एवं वन्यजीव प्रभाग के अंतर्गत सक्रिय किया जाएगा। डीएफओ भरत कुमार डीके ने बताया कि जंगल से बाहर बाघों के प्रबंधन के लिए टीओटीआर प्रोजेक्ट को इसी वित्तीय वर्ष में लागू किया जाना है। वार्षिक कार्ययोजना तैयार कर केंद्र सरकार को भेज दी गई है। 

प्रथम चरण में होंगे ये प्रमुख कार्य
प्रस्तावित कार्ययोजना के अनुसार पहले चरण में डीएफओ समेत वन अधिकारियों और वन कर्मियों को विशेष प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए उन्हें देश के कई टाइगर रिजर्वों में भेजा जाएगा, जहां वे एआई आधारित तकनीक, आधुनिक निगरानी प्रणाली और रेस्क्यू प्रबंधन की जानकारी हासिल करेंगे। इसके साथ ही रेस्क्यू वाहनों, ड्रोन, पिंजरे और अन्य सुरक्षा उपकरणों की खरीद की जाएगी। ड्रोन ऑपरेटर और बायोलॉजिस्ट की तैनाती भी प्रस्तावित है, ताकि जंगल से बाहर बाघों की गतिविधि पर बेहतर नजर रखी जा सके।

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