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Sant Kabir Nagar News: बेहद खास है रमजान का दूसरा अशरा मगफिरत
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मौलाना शोएब नदवी
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सेमरियावां। इन दिनों मुकद्दस महीना रमजान जारी है। इस महीने को तीन अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमत का, दूसरा मगफिरत यानी गुनाहों की माफी का और तीसरा जहन्नुम से निजात का माना जाता है। हर अशरे की अपनी अलग रूहानी अहमियत होती है।
पहला अशरा रहमत का खत्म होते ही दूसरा अशरा मगफिरत का जारी है। रमजान का दूसरा अशरा 10 मार्च तक चलेगा। इसे खास तौर पर मगफिरत का दौर कहा जाता है। इन दस दिनों में बंदा अपने रब के सामने सच्चे दिल से तौबा करता है और अपने किए गए गुनाहों की माफी मांगता है। मौलाना शोएब नदवी ने बताया कि मगफिरत का अर्थ है माफी या क्षमा। उन्होंने कहा कि दूसरे अशरे में अल्लाह अपने बंदों को गुनाहों से तौबा करने और माफी पाने का खास मौका देता है। यह समय आत्म-चिंतन, सुधार और रूहानी तरक्की का होता है। हदीस में भी आता है कि जो शख्स ईमान और सवाब की नीयत से रोजा रखता है, उसके पिछले गुनाह माफ किए जा सकते हैं। इसलिए इस अशरे में रोजा, इबादत और तौबा की अहमियत और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि इन दिनों ज्यादा से ज्यादा ‘अस्तगफिरुल्लाह’ पढ़ने की ताकीद की गई है। साथ ही खास दुआओं का एहतमाम करना भी फजीलत वाला माना गया है।
तौबा के लिए जरूरी है कि इंसान को अपने गुनाह पर सच्चा पछतावा हो, वह उसे तुरंत छोड़ दे और भविष्य में दोबारा न करने का पक्का इरादा करे। जब बंदा इन शर्तों के साथ तौबा करता है तो अल्लाह की रहमत उसके लिए खुल जाती है। दूसरे अशरे में नमाज की पाबंदी, कुरान की तिलावत, जिक्र और दुआओं का विशेष महत्व है। इसके साथ ही सदका और खैरात देना भी बेहद सवाब का काम है। जरूरतमंदों की मदद करना, भूखों को खाना खिलाना और नेक व्यवहार अपनाना इंसान की रूह को पाक करता है। मगफिरत का यह दौर सिर्फ जुबानी तौबा तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने किरदार और जिंदगी को बेहतर बनाने का भी सुनहरा अवसर है।
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पहला अशरा रहमत का खत्म होते ही दूसरा अशरा मगफिरत का जारी है। रमजान का दूसरा अशरा 10 मार्च तक चलेगा। इसे खास तौर पर मगफिरत का दौर कहा जाता है। इन दस दिनों में बंदा अपने रब के सामने सच्चे दिल से तौबा करता है और अपने किए गए गुनाहों की माफी मांगता है। मौलाना शोएब नदवी ने बताया कि मगफिरत का अर्थ है माफी या क्षमा। उन्होंने कहा कि दूसरे अशरे में अल्लाह अपने बंदों को गुनाहों से तौबा करने और माफी पाने का खास मौका देता है। यह समय आत्म-चिंतन, सुधार और रूहानी तरक्की का होता है। हदीस में भी आता है कि जो शख्स ईमान और सवाब की नीयत से रोजा रखता है, उसके पिछले गुनाह माफ किए जा सकते हैं। इसलिए इस अशरे में रोजा, इबादत और तौबा की अहमियत और बढ़ जाती है। उन्होंने कहा कि इन दिनों ज्यादा से ज्यादा ‘अस्तगफिरुल्लाह’ पढ़ने की ताकीद की गई है। साथ ही खास दुआओं का एहतमाम करना भी फजीलत वाला माना गया है।
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तौबा के लिए जरूरी है कि इंसान को अपने गुनाह पर सच्चा पछतावा हो, वह उसे तुरंत छोड़ दे और भविष्य में दोबारा न करने का पक्का इरादा करे। जब बंदा इन शर्तों के साथ तौबा करता है तो अल्लाह की रहमत उसके लिए खुल जाती है। दूसरे अशरे में नमाज की पाबंदी, कुरान की तिलावत, जिक्र और दुआओं का विशेष महत्व है। इसके साथ ही सदका और खैरात देना भी बेहद सवाब का काम है। जरूरतमंदों की मदद करना, भूखों को खाना खिलाना और नेक व्यवहार अपनाना इंसान की रूह को पाक करता है। मगफिरत का यह दौर सिर्फ जुबानी तौबा तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने किरदार और जिंदगी को बेहतर बनाने का भी सुनहरा अवसर है।