{"_id":"6a860c9e0f3a2039060389cc","slug":"justice-caught-in-the-cycle-of-adjournments-in-revenue-courts-shahjahanpur-news-c-122-1-spn1002-182140-2026-08-20","type":"story","status":"publish","title_hn":"Shahjahanpur News: राजस्व न्यायालयों में तारीखों के फेर में फंसा न्याय","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Shahjahanpur News: राजस्व न्यायालयों में तारीखों के फेर में फंसा न्याय
विज्ञापन
रामभरोसे, निवासी अहमद नगर रोजा।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शाहजहांपुर। राजस्व न्यायालयों में समय से न्याय देने की व्यवस्था खुद सवालों के घेरे में है। जमीन और राजस्व से जुड़े विवादों के निस्तारण के लिए बनाई गई न्यायिक व्यवस्था में वादकारी तारीखों के ऐसे फेर में फंस रहे हैं कि उनका सालों तक न्यायालयों के चक्कर लगाना खत्म नहीं हो रहा। सदर तहसील में 6699 वाद विचाराधीन हैं। इनमें 565 मामले एक से तीन वर्ष, 46 मामले तीन से पांच वर्ष और 18 मामले पांच वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं।
रोजा के अहदमनगर निवासी करीब 90 वर्षीय रामभरोसे 34 वर्ष से अधिक समय से अपनी जमीन के विवाद को लेकर न्यायालयों के चक्कर लगा रहे हैं। तिलहर तहसील से लेकर बरेली न्यायालय तक जाने के बाद अब सदर तहसील में उनका मामला चल रहा है। तारीखें इतनी पड़ीं कि उन्हें संख्या तक याद नहीं है। फिर भी बताते हैं कि सात सौ से ज्यादा तारीखें पड़ चुकी हैं। हर बार आने-जाने और मुकदमे संबंधी खर्चे में दो-तीन सौ रुपये चले जाना सामान्य बात है। अब तक धीरे-धीरे कर दो लाख से ज्यादा रुपये खर्च हो चुके हैं।
राजस्व न्यायालयों में नामांतरण, फर्जी तरीके से जमीन बेचने, भूमि पर कब्जा करने और रास्ते के विवाद जैसे मामले वर्षों से लंबित हैं। छोटे मामलों के निस्तारण में भी दो से तीन साल लग जाना आम बात हो गई है। पांच वर्ष से अधिक समय से 18 मामले लंबित हैं। इनमें एसडीएम कोर्ट में आठ, एसडीएम न्यायिक स्तर पर छह, तहसीलदार न्यायिक स्तर पर एक, नायब तहसीलदार कांट कोर्ट में दो और नायब तहसीलदार भावलखेड़ा कोर्ट में एक मामला विचाराधीन है।
विज्ञापन
-
हर महीने पड़ती है तारीख
वादकारियों के लिए हर तारीख अब अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गई है। आने-जाने, खाने-पीने, अधिवक्ता की फीस और न्यायालय से कागजात निकलवाने में हजारों रुपये खर्च हो चुके हैं। कई वादकारियों की हर माह कई तारीखें पड़ती हैं। हर तारीख पर न्यायालय पहुंचना पड़ता है। सुनवाई नहीं होने पर उन्हें अगली तारीख दे दी जाती है। इस तरह तारीख पर तारीख का सिलसिला वर्षों तक चलता रहता है। वादकारी अपनी फाइल की तलाश में भटकता रहता है।
-
वादकारियों का दर्द
पत्नी प्रेमा के नाम 18 बीघा से अधिक जमीन थी। उनकी मृत्यु के बाद रिश्ते में लगने वाले साले ने वर्ष 1992 में जमीन पर दावा कर कोर्ट में वाद दायर कर दिया जबकि पत्नी ने अपने चार बेटों के नाम विरासत कर दी थी। साले ने इसको बदलवा दिया। तिलहर तहसील से लेकर बरेली कोर्ट में मुकदमा चला। इसमें कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। साले ने फिर से एसडीएम सदर कोर्ट में अपील कर दी। तब से चक्कर लगा रहे हैं। अब तक वाद का निस्तारण नहीं हो पाया है।
- रामभरोसे, अहदमनगर, रोजा
-
हमारे पास 12 बीघा जमीन है। एक कथित महिला ने चार वर्ष पूर्व कोर्ट में प्रार्थनापत्र देकर जमीन पर अपना दावा कर दिया। इसके बाद से महिला लापता है। कोर्ट में मामला विचाराधीन है। महिला के नहीं आने से न्यायालय की तरफ से कोई फैसला नहीं हो पा रहा है। हर माह कम से कम चार तारीख पड़ती हैं। डेढ़ सौ से ज्यादा तारीख पड़ चुकी हैं। एक बार आने में करीब पांच सौ रुपये खर्च हो जाते हैं। लोगों से कर्जा लेकर काम चला रहे हैं, लेकिन अब तक मामले का निस्तारण नहीं हो पाया है।
- रामशंकर, सिसनई, सेहरामऊ दक्षिणी
--
हम तीन भाइयों के बीच 10 बीघा जमीन थी। वर्ष 2016 में गांव में एक हत्या के मामले में दो भाई जेल चले गए। गांव में तीसरे अविवाहित भाई रामरतन की 20 मई 2018 को मृत्यु हो गई। जेल में बंद दूसरे भाई की पत्नी ने रामरतन की मौत से पहले लोगों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेज तैयार कराकर रामरतन की पत्नी के रूप में कोर्ट में जमीन संबंधी प्रार्थनापत्र देकर जमीन पर दावा कर दिया। वर्ष 2024 में दोनों भाइयों की कोर्ट से जमानत हुई। इसके बाद से न्यायालय के चक्कर लगा रहे हैं। अब तक समस्या का कोई समाधान नहीं हो पाया है।
- लालाराम, गांव कैल्हा ददरौल।
--
वादकारी न्यायालयों के चक्कर लगाते हैं। उनको समय पर उनकी जमीन के कागजात नहीं मिल पाते हैं। न्यायालय में भी अधिकारी समय से नहीं बैठते हैं। वादकारियों को तारीख दे दी जाती है। इसमें उनको मानसिक तनाव के साथ धन खर्च करना पड़ता है। इसके बाद भी उनको समय से न्याय नहीं मिल पाता है।
- दिनेश कुमार सक्सेना, अध्यक्ष, तहसील बार एसोसिएशन
--
वादकारियों के दस्तावेजों में कमी की वजह से न्यायालय में आपत्ति लग जाती हैं। इनको समय से पूरा नहीं करने पर देरी होती है। प्रयास तो यही रहता है कि जल्द से जल्द वादकारी की समस्या का निस्तारण कराया जाए। कुछ मामले विवादित होते हैं जिसमें समय अधिक लगता है।
- प्रभात राय, एसडीएम सदर
विज्ञापन
रोजा के अहदमनगर निवासी करीब 90 वर्षीय रामभरोसे 34 वर्ष से अधिक समय से अपनी जमीन के विवाद को लेकर न्यायालयों के चक्कर लगा रहे हैं। तिलहर तहसील से लेकर बरेली न्यायालय तक जाने के बाद अब सदर तहसील में उनका मामला चल रहा है। तारीखें इतनी पड़ीं कि उन्हें संख्या तक याद नहीं है। फिर भी बताते हैं कि सात सौ से ज्यादा तारीखें पड़ चुकी हैं। हर बार आने-जाने और मुकदमे संबंधी खर्चे में दो-तीन सौ रुपये चले जाना सामान्य बात है। अब तक धीरे-धीरे कर दो लाख से ज्यादा रुपये खर्च हो चुके हैं।
विज्ञापन
राजस्व न्यायालयों में नामांतरण, फर्जी तरीके से जमीन बेचने, भूमि पर कब्जा करने और रास्ते के विवाद जैसे मामले वर्षों से लंबित हैं। छोटे मामलों के निस्तारण में भी दो से तीन साल लग जाना आम बात हो गई है। पांच वर्ष से अधिक समय से 18 मामले लंबित हैं। इनमें एसडीएम कोर्ट में आठ, एसडीएम न्यायिक स्तर पर छह, तहसीलदार न्यायिक स्तर पर एक, नायब तहसीलदार कांट कोर्ट में दो और नायब तहसीलदार भावलखेड़ा कोर्ट में एक मामला विचाराधीन है।
विज्ञापन
-
हर महीने पड़ती है तारीख
वादकारियों के लिए हर तारीख अब अतिरिक्त आर्थिक बोझ बन गई है। आने-जाने, खाने-पीने, अधिवक्ता की फीस और न्यायालय से कागजात निकलवाने में हजारों रुपये खर्च हो चुके हैं। कई वादकारियों की हर माह कई तारीखें पड़ती हैं। हर तारीख पर न्यायालय पहुंचना पड़ता है। सुनवाई नहीं होने पर उन्हें अगली तारीख दे दी जाती है। इस तरह तारीख पर तारीख का सिलसिला वर्षों तक चलता रहता है। वादकारी अपनी फाइल की तलाश में भटकता रहता है।
-
वादकारियों का दर्द
पत्नी प्रेमा के नाम 18 बीघा से अधिक जमीन थी। उनकी मृत्यु के बाद रिश्ते में लगने वाले साले ने वर्ष 1992 में जमीन पर दावा कर कोर्ट में वाद दायर कर दिया जबकि पत्नी ने अपने चार बेटों के नाम विरासत कर दी थी। साले ने इसको बदलवा दिया। तिलहर तहसील से लेकर बरेली कोर्ट में मुकदमा चला। इसमें कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया। साले ने फिर से एसडीएम सदर कोर्ट में अपील कर दी। तब से चक्कर लगा रहे हैं। अब तक वाद का निस्तारण नहीं हो पाया है।
- रामभरोसे, अहदमनगर, रोजा
-
हमारे पास 12 बीघा जमीन है। एक कथित महिला ने चार वर्ष पूर्व कोर्ट में प्रार्थनापत्र देकर जमीन पर अपना दावा कर दिया। इसके बाद से महिला लापता है। कोर्ट में मामला विचाराधीन है। महिला के नहीं आने से न्यायालय की तरफ से कोई फैसला नहीं हो पा रहा है। हर माह कम से कम चार तारीख पड़ती हैं। डेढ़ सौ से ज्यादा तारीख पड़ चुकी हैं। एक बार आने में करीब पांच सौ रुपये खर्च हो जाते हैं। लोगों से कर्जा लेकर काम चला रहे हैं, लेकिन अब तक मामले का निस्तारण नहीं हो पाया है।
- रामशंकर, सिसनई, सेहरामऊ दक्षिणी
हम तीन भाइयों के बीच 10 बीघा जमीन थी। वर्ष 2016 में गांव में एक हत्या के मामले में दो भाई जेल चले गए। गांव में तीसरे अविवाहित भाई रामरतन की 20 मई 2018 को मृत्यु हो गई। जेल में बंद दूसरे भाई की पत्नी ने रामरतन की मौत से पहले लोगों की मिलीभगत से फर्जी दस्तावेज तैयार कराकर रामरतन की पत्नी के रूप में कोर्ट में जमीन संबंधी प्रार्थनापत्र देकर जमीन पर दावा कर दिया। वर्ष 2024 में दोनों भाइयों की कोर्ट से जमानत हुई। इसके बाद से न्यायालय के चक्कर लगा रहे हैं। अब तक समस्या का कोई समाधान नहीं हो पाया है।
- लालाराम, गांव कैल्हा ददरौल।
वादकारी न्यायालयों के चक्कर लगाते हैं। उनको समय पर उनकी जमीन के कागजात नहीं मिल पाते हैं। न्यायालय में भी अधिकारी समय से नहीं बैठते हैं। वादकारियों को तारीख दे दी जाती है। इसमें उनको मानसिक तनाव के साथ धन खर्च करना पड़ता है। इसके बाद भी उनको समय से न्याय नहीं मिल पाता है।
- दिनेश कुमार सक्सेना, अध्यक्ष, तहसील बार एसोसिएशन
वादकारियों के दस्तावेजों में कमी की वजह से न्यायालय में आपत्ति लग जाती हैं। इनको समय से पूरा नहीं करने पर देरी होती है। प्रयास तो यही रहता है कि जल्द से जल्द वादकारी की समस्या का निस्तारण कराया जाए। कुछ मामले विवादित होते हैं जिसमें समय अधिक लगता है।
- प्रभात राय, एसडीएम सदर

रामभरोसे, निवासी अहमद नगर रोजा।

रामभरोसे, निवासी अहमद नगर रोजा।

रामभरोसे, निवासी अहमद नगर रोजा।

रामभरोसे, निवासी अहमद नगर रोजा।