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Shahjahanpur News: नौ दिन तक गैरिसन को घेरे रखा, आठ तोपों से बरसाए गोले
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लोधीपुर स्थित मौलवी अहमदुल्लाह शाह की मजार। संवाद
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शाहजहांपुर। वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में शाहजहांपुर की धरती भी अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की गवाह बनी थी। क्रांति के प्रमुख नायक मौलवी अहमदुल्लाह शाह ने हजारों क्रांतिकारियों के साथ यहां अंग्रेजी गैरिसन की करीब नौ दिन तक घेराबंदी की थी। उनके पास आठ तोपें थीं, जिनसे अंग्रेजी ठिकानों पर लगातार गोलाबारी की गई।
एसएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने बताया कि मौलवी अहमदुल्लाह शाह का परिवार हरदोई के गोपामऊ का रहने वाला था, जबकि उनका जन्म मद्रास रियासत में हुआ था। गुरु मेहराब अली की प्रेरणा से वह उत्तर भारत आए और अंग्रेजी शासन के खिलाफ मुहिम में जुट गए। उनके साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़ते चले गए। अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित कर रखा था।
अवध में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने के बाद मौलवी शाहजहांपुर पहुंचे। उनके साथ करीब आठ से 12 हजार क्रांतिकारी बताए जाते हैं। उस समय गैरिसन में 82वीं फुट रेजीमेंट, रुहेलखंड ऑक्जिलरी लेवी और एक अनियमित घुड़सवार सेना तैनात थी। मौलवी की सेना के आने की सूचना पर कर्नल हेल ने गैरिसन के चारों ओर खाइयां खोदवाकर सुरक्षा मजबूत कराई।
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दो मई को मऊघाट की ओर से क्रांतिकारी शाहजहांपुर पहुंचे और अंग्रेजों का बाहरी सुरक्षा घेरा तोड़ दिया। डी कांटाजो घायल हो गए और रुहेलखंड ऑक्जिलरी लेवी बिखर गई। इसके बाद क्रांतिकारियों ने आठ तोपें तैनात कर गैरिसन को घेर लिया। पुराने कमिश्नरेट गोदाम पर भी गोलाबारी की गई और शाहजहांपुर के किले पर कब्जा कर लिया गया।
हालात बिगड़ने पर कमांडर इन चीफ कॉलिन कैंपबेल ने ब्रिगेडियर जोन्स को भेजा, लेकिन वह सीधे शहर में प्रवेश नहीं कर सका। नौ दिन बाद मौलवी की सेना मुहम्मदी की ओर कूच कर गई। इसके बाद ही अंग्रेज शहर में लौट सके। आज भी रेती में संजय सरस्वती स्कूल के पीछे स्थित उनकी मजार 1857 के संघर्ष की याद दिलाती है।
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एसएस कॉलेज के इतिहास विभाग के अध्यक्ष डॉ. विकास खुराना ने बताया कि मौलवी अहमदुल्लाह शाह का परिवार हरदोई के गोपामऊ का रहने वाला था, जबकि उनका जन्म मद्रास रियासत में हुआ था। गुरु मेहराब अली की प्रेरणा से वह उत्तर भारत आए और अंग्रेजी शासन के खिलाफ मुहिम में जुट गए। उनके साथ बड़ी संख्या में लोग जुड़ते चले गए। अंग्रेजों ने उनकी गिरफ्तारी पर 50 हजार रुपये का इनाम घोषित कर रखा था।
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अवध में अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने के बाद मौलवी शाहजहांपुर पहुंचे। उनके साथ करीब आठ से 12 हजार क्रांतिकारी बताए जाते हैं। उस समय गैरिसन में 82वीं फुट रेजीमेंट, रुहेलखंड ऑक्जिलरी लेवी और एक अनियमित घुड़सवार सेना तैनात थी। मौलवी की सेना के आने की सूचना पर कर्नल हेल ने गैरिसन के चारों ओर खाइयां खोदवाकर सुरक्षा मजबूत कराई।
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दो मई को मऊघाट की ओर से क्रांतिकारी शाहजहांपुर पहुंचे और अंग्रेजों का बाहरी सुरक्षा घेरा तोड़ दिया। डी कांटाजो घायल हो गए और रुहेलखंड ऑक्जिलरी लेवी बिखर गई। इसके बाद क्रांतिकारियों ने आठ तोपें तैनात कर गैरिसन को घेर लिया। पुराने कमिश्नरेट गोदाम पर भी गोलाबारी की गई और शाहजहांपुर के किले पर कब्जा कर लिया गया।
हालात बिगड़ने पर कमांडर इन चीफ कॉलिन कैंपबेल ने ब्रिगेडियर जोन्स को भेजा, लेकिन वह सीधे शहर में प्रवेश नहीं कर सका। नौ दिन बाद मौलवी की सेना मुहम्मदी की ओर कूच कर गई। इसके बाद ही अंग्रेज शहर में लौट सके। आज भी रेती में संजय सरस्वती स्कूल के पीछे स्थित उनकी मजार 1857 के संघर्ष की याद दिलाती है।