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Shahjahanpur News: मनु-सतरूपा की पुत्रियों से हुए सृष्टि के विस्तार का सुनाया प्रसंग

Bareily Bureau बरेली ब्यूरो
Updated Fri, 05 Jun 2026 01:16 AM IST
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The narrative recounting the expansion of creation through the daughters of Manu and Shatarupa was narrated.
कुर्रिया  कलां में कथा सुनाते संपति कुमार त्रिपाठी। संवाद - फोटो : बो​धि वृक्ष की पूजा करते वियतनाम के बौद्ध अनुयायी।
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कुर्रियाकलां। श्री शिव मंदिर पर आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में कथा व्यास संपति कुमार त्रिपाठी ने सृष्टि के विस्तार का प्रसंग सुनाया।

उन्होंने कहा कि प्रथम मानव स्वयंभू मनु और उनकी पत्नी सतरूपा की तीन पुत्रियों से मानव जाति और सृष्टि का विस्तार हुआ। कथाव्यास ने कहा कि मनु-सतरूपा की पहली पुत्री आकूति का विवाह ऋषि रुचि से इस शर्त पर किया था कि उनसे उत्पन्न पहला पुत्र मनु को गोद दिया जाएगा। जिसके बाद आकूति के गर्भ से जुड़वां संतानें हुईं। इसमें पुत्र यज्ञ और कन्या दक्षिणा का रूप थी।
दूसरी पुत्री देवहूति का विवाह कर्दम ऋषि से हुआ। देवहूति ने एक आदर्श और समर्पित पत्नी की तरह कर्दम ऋषि की सेवा की। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान विष्णु ने उनके पुत्र के रूप में कपिल मुनि का अवतार लिया। कपिल मुनि ने ही अपनी माता देवहूति को सांख्य योग, ज्ञान और वैराग्य का अद्भुत ज्ञान दिया और उससे उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई।
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तीसरी पुत्री प्रसूति का विवाह प्रजापति दक्ष के साथ हुआ। दक्ष और प्रसूति से ही सृष्टि में जनसंख्या का विस्तार हुआ। उनके घर में अनेक कन्याओं ने जन्म लिया। उनमें सबसे प्रमुख सती थीं, जिनका विवाह भगवान शिव के साथ हुआ। कथा श्रवण में ओमप्रकाश पांडेय, दीपक कुमार, सतीश पांडेय, श्रवण कुमार, श्याम आदि मौजूद रहे। संवाद
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महात्मा विदुर का प्रसंग सुनाकर पाप नहीं करने का दिया संदेश




कुर्रियाकलां। नौगवां खुलौली गांव में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में बृहस्पतिवार को कथाव्यास आचार्य पंडित आशीष वाजपेयी ने महात्मा विदुर के जन्म का प्रसंग सुनाकर भूल से भी पाप नहीं करने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि महात्मा विदुर हस्तिनापुर के राजा धृतराष्ट्र और पांडु के भाई तथा कौरवों-पांडवों के चाचा थे। उन्हें साक्षात धर्मराज का अवतार माना जाता था। विदुर का जन्म महर्षि वेदव्यास और हस्तिनापुर की रानी अंबिका की दासी के मिलन से हुआ था। उनका जन्म दासी की कोख से होने के कारण उन्हें राजगद्दी नहीं मिली, लेकिन वह हस्तिनापुर के सबसे प्रमुख नीति-निर्माता और महामंत्री बने।
एक बार मांडव्य ऋषि को राजा के सैनिकों ने चोर समझकर सूली पर चढ़ा दिया। बाद में निर्दोष साबित होने पर ऋषि ने धर्मराज यमराज से सजा मिलने का कारण पूछा। इस पर धर्मराज ने बताया कि बचपन में उन्होंने एक चींटी को तिनका चुभोया था। उसी कर्म का दंड उन्हें मिला। इस पर ऋषि ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि उन्हें एक शूद्र दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना होगा। इसी शाप के कारण विदुर का जन्म दासी पुत्र के रूप में हुआ। कथा श्रवण में तमाम श्रद्धालु मौजूद रहे। संवाद
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