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Siddharthnagar News: नवीन शोध को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में दिया जाना चाहिए समुचित स्थान
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सिद्धार्थनगर। सिद्धार्थ विश्वविद्यालय कपिलवस्तु के कला संकाय में बृहस्पतिवार को आर्ट ऑफ सिंधु-सरस्वती सिविलाइजेशन न्यू डिस्कवरीज विषय पर एक व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए प्रतिष्ठित पुरातत्वविद्, संग्रहालयविद् एवं कला इतिहासकार तथा भारत कला भवन संग्रहालय के पूर्व निदेशक डॉ. डीपी शर्मा ने सिंधु-सरस्वती सभ्यता से संबंधित नवीन खोजों के ऐतिहासिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। कहा कि नवीन शोध को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में समुचित स्थान दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन के संकेत जॉन मार्शल के काल से पूर्व भी प्राप्त होते हैं तथा इसे सरस्वती नदी सभ्यता के रूप में भी जाना जाता रहा। उन्होंने बताया कि लगभग 4500 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के मध्य इस सभ्यता का व्यापक विकास हुआ और यह अत्यंत विशाल भू-भाग में विस्तृत थी। लगभग 250 स्थलों पर हुए उत्खननों से प्राप्त रत्न, आभूषण, मुद्राएं, कलाकृतियां एवं अन्य पुरावशेष इस सभ्यता की उन्नत वैज्ञानिक एवं कलात्मक दृष्टि को प्रमाणित करते हैं। उन्होंने कहा कि उत्खनन में प्राप्त पहियों, लिपिकीय प्रमाणों, स्थापत्य अवशेषों तथा मुद्रण (प्रिंटिंग – प्रिंटिंग) जैसी तकनीकों के संकेत यह दर्शाते हैं कि प्राचीन भारतीय सभ्यता अत्यंत विकसित थी।
उन्होंने यह भी कहा कि नवीन शोध-खोजों को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में समुचित स्थान दिया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को अद्यतन जानकारी प्राप्त हो तथा उनके अध्ययन एवं नवाचार को गति मिले। अधिष्ठाता कला संकाय प्रोफेसर नीता यादव ने उन्होंने कहा कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता पर हो रहे नवीन अनुसंधान भारत की ज्ञान परंपरा को समकालीन समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इस प्रकार के व्याख्यान विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को ऐतिहासिक बोध के साथ-साथ शोध एवंबौद्धिक विमर्श की नई दिशाएं प्रदान करते हैं। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की मासिक पत्रिका कैंपस कनेक्ट की दो अंकों का वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर विमोचन किया गया। पत्रिका के प्रधान संपादक एवं पूर्व अधिष्ठाता कला संकाय प्रोफेसर हरीश कुमार शर्मा ने बताया कि यह पत्रिका विश्वविद्यालय की शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का समग्र दस्तावेज है। अधिष्ठाता विज्ञान संकाय प्रो. प्रकृति राय ने कहा कि नवाचार एवं अन्वेषण की भावना उच्च शिक्षा को सार्थक बनाती है तथा शोधपरक दृष्टिकोण विद्यार्थियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाता है। वहीं अधिष्ठाता वाणिज्य संकाय प्रोफेसर सौरभ ने कहा कि अंतःविषयक अध्ययन एवं अकादमिक संवाद ज्ञान के नए आयामों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अन्य वक्ताओं ने भी विचार प्रगट किया।
इस दौरान सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. अविनाश प्रताप सिंह, प्रोफेसर सत्येंद्र कुमार दुबे, डॉ. रविकांत शुक्ल, डॉ. शरदेंदु कुमार त्रिपाठी,डॉ. यशवंत यादव, डॉ. जय सिंह यादव, डॉ. धर्मेंद्र कुमार, डॉ. अरविंद रावत, डॉ. अरविंद साहनी, डॉ. बाल गंगाधर, डॉ. मयंक कुशवाहा, डॉ. हृदाकांत पांडेय, डॉ. रेनू त्रिपाठी आदि मौजूद रहे।
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उन्होंने कहा कि सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन के संकेत जॉन मार्शल के काल से पूर्व भी प्राप्त होते हैं तथा इसे सरस्वती नदी सभ्यता के रूप में भी जाना जाता रहा। उन्होंने बताया कि लगभग 4500 ईसा पूर्व से 3000 ईसा पूर्व के मध्य इस सभ्यता का व्यापक विकास हुआ और यह अत्यंत विशाल भू-भाग में विस्तृत थी। लगभग 250 स्थलों पर हुए उत्खननों से प्राप्त रत्न, आभूषण, मुद्राएं, कलाकृतियां एवं अन्य पुरावशेष इस सभ्यता की उन्नत वैज्ञानिक एवं कलात्मक दृष्टि को प्रमाणित करते हैं। उन्होंने कहा कि उत्खनन में प्राप्त पहियों, लिपिकीय प्रमाणों, स्थापत्य अवशेषों तथा मुद्रण (प्रिंटिंग – प्रिंटिंग) जैसी तकनीकों के संकेत यह दर्शाते हैं कि प्राचीन भारतीय सभ्यता अत्यंत विकसित थी।
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उन्होंने यह भी कहा कि नवीन शोध-खोजों को शैक्षणिक पाठ्यक्रम में समुचित स्थान दिया जाना चाहिए, जिससे विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को अद्यतन जानकारी प्राप्त हो तथा उनके अध्ययन एवं नवाचार को गति मिले। अधिष्ठाता कला संकाय प्रोफेसर नीता यादव ने उन्होंने कहा कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता पर हो रहे नवीन अनुसंधान भारत की ज्ञान परंपरा को समकालीन समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। इस प्रकार के व्याख्यान विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को ऐतिहासिक बोध के साथ-साथ शोध एवंबौद्धिक विमर्श की नई दिशाएं प्रदान करते हैं। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की मासिक पत्रिका कैंपस कनेक्ट की दो अंकों का वर्ष प्रतिपदा के अवसर पर विमोचन किया गया। पत्रिका के प्रधान संपादक एवं पूर्व अधिष्ठाता कला संकाय प्रोफेसर हरीश कुमार शर्मा ने बताया कि यह पत्रिका विश्वविद्यालय की शैक्षणिक, सांस्कृतिक एवं सह-पाठ्यक्रम गतिविधियों का समग्र दस्तावेज है। अधिष्ठाता विज्ञान संकाय प्रो. प्रकृति राय ने कहा कि नवाचार एवं अन्वेषण की भावना उच्च शिक्षा को सार्थक बनाती है तथा शोधपरक दृष्टिकोण विद्यार्थियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाता है। वहीं अधिष्ठाता वाणिज्य संकाय प्रोफेसर सौरभ ने कहा कि अंतःविषयक अध्ययन एवं अकादमिक संवाद ज्ञान के नए आयामों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अन्य वक्ताओं ने भी विचार प्रगट किया।
इस दौरान सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी डॉ. अविनाश प्रताप सिंह, प्रोफेसर सत्येंद्र कुमार दुबे, डॉ. रविकांत शुक्ल, डॉ. शरदेंदु कुमार त्रिपाठी,डॉ. यशवंत यादव, डॉ. जय सिंह यादव, डॉ. धर्मेंद्र कुमार, डॉ. अरविंद रावत, डॉ. अरविंद साहनी, डॉ. बाल गंगाधर, डॉ. मयंक कुशवाहा, डॉ. हृदाकांत पांडेय, डॉ. रेनू त्रिपाठी आदि मौजूद रहे।