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Siddharthnagar News: पंचायत चुनाव की आहट... बॉर्डर पर बढ़ी शराब की तस्करी
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Sun, 01 Feb 2026 12:03 AM IST
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ककरहवा बॉर्डर पकड़ी गई नेपाली शराब। फाइल फोटो
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सिद्धार्थनगर। ग्राम पंचायत चुनाव की आहट के साथ ही सीमावर्ती इलाकों में नेपाली शराब की तस्करी एक बार फिर बढ़ गई है। सस्ते दामों में मिलने वाली नेपाली शराब के जरिये संभावित प्रत्याशी वोटरों को लुभाने में लगे हैं।
ऐसे में तस्कर अब कैरियर के माध्यम से बाॅर्डर पार से शराब मंगाने लगे हैं। पुलिस की सख्ती के बावजूद बीते एक पखवारा में 300 सीसी से अधिक नेपाली शराब की बरामदगी ने साफ कर दिया है कि चुनाव से पहले शराब का अवैध कारोबार संगठित तरीके से चल रहा है।
सूत्रों का कहना है कि तस्कर मांग से पहले शराब की खेप को डंप कर लेते हैं। इसके बाद मुंहमांगी कीमत पर उसे बेचा जाता है। सीमावर्ती इलाके के लोगों के मुताबिक भारत और नेपाल की शराब में 20 रुपये प्रति पाउच का अंतर है। इसलिए धंधेबाजों ने अभी से इसे डंप करना शुरू कर दिया है। कमाई के लिए वे इसे 10-15 रुपये अधिक पर थोक में बिक्री करते हैं। चुनाव आते ही नए लोग इस धंधे में जुट जाते हैं। वह केवल चुनाव के समय सक्रिय होते हैं। खास करके ग्राम पंचायत स्तर पर होने वाले चुनाव में उनकी चांदी रहती है जो तस्कर के बढ़ने के पीछे की सबसे बड़ी वजह है।
नेपाल से लगने वाले जिले की 68 किलोमीटर सीमावर्ती इलाके में तस्करी का अलग-अलग ट्रेंड है। नेपाली शराब के लिए बढ़नी और ककरहवा बार्डर संवेदनशील है। ज्यादातर धरपकड़ इन्हीं बाॅर्डर से होती है। सीमावर्ती गांवों से लेकर ककरहा बॉर्डर तक अचानक बढ़ी गतिविधि इस बात की ओर इशारा कर रही है कि तस्करी अब छोटे-मोटे सौदों तक सीमित नहीं रही। दो दिन पहले ककरहा बॉर्डर पर पकड़े गए आरोपी ने पूछताछ में बताया कि उसे केवल बोरी लाने के लिए भेजा गया था और इसके बदले तय रकम दी गई थी। शराब किसकी है, कहां जानी है। इन सवालों की कैरियर को जानकारी नहीं दी गई। असली खेल पीछे बैठे तस्कर और राजनीतिक समीकरण साधने वाले लोग खेल रहे हैं।
बताया जा रहा है कि भारतीय शराब के मुकाबले करीब 20 रुपये कम दाम में मिलने के कारण नेपाली शराब की मांग संभावित प्रत्याशियों में ज्यादा है ताकि कम खर्च में अधिक लोगों को साधा जा सके।
सूत्रों के मुताबिक तस्करी का नेटवर्क तीन स्तरों पर काम कर रहा है। इसमें पहला स्तर सीमा पार से सप्लाई का है, जहां नेपाल से शराब जुटाई जाती है। दूसरा स्तर कैरियरों का है, जिन्हें केवल बोरी या पैकेट लाने-ले जाने का काम सौंपा जाता है। तीसरा और सबसे अहम स्तर स्थानीय संपर्कों का है, जो चुनावी माहौल का फायदा उठाकर शराब को गांव-गांव तक पहुंचाते हैं।
इन स्थानीय लोगों के पास पंचायत चुनाव से जुड़े प्रत्याशियों और उनके समर्थकों तक सीधी पहुंच होती है। सूत्रों का कहना है कि तस्करी में महिलाओं और बच्चों को शामिल कर लेते हैं। वह झोले और बोरी में इसे लेकर आने का काम करते हैं। उन्हें शीशी के हिसाब से रुपये मिलते हैं, ऐसा बढ़नी में रहने वाले उमेश कुमार ने बताया है।
300 शीशी नेपाली शराब बरामद: पुलिस रिकॉर्ड पर नजर डालें तो पिछले एक पखवारा में अलग-अलग स्थानों से 300 शीशी नेपाली शराब बरामद की जा चुकी है। यह आंकड़ा केवल पकड़ी गई खेप का है जबकि असल में इससे कई गुना अधिक शराब खपाई जा चुकी है। सीमावर्ती इलाकों में रात के समय आवाजाही बढ़ना, संदिग्ध बोरी और साइकिल-मोटरसाइकिल से ढुलाई, इस पूरे नेटवर्क की ओर इशारा कर रही है।
चुनाव और शराब का पुराना रिश्ता : ग्राम पंचायत चुनाव में शराब बांटने की परंपरा कोई नई नहीं है, लेकिन इस बार तरीका ज्यादा संगठित और सुरक्षित बनाया गया है। कैरियर कोई और है, पैसे देने वाला कोई और और शराब मंगाने वाला कोई तीसरा। इससे पकड़े जाने की स्थिति में असली सरगना तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि तस्कर बेखौफ होकर खेप मंगाने में जुटे हैं।
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ऐसे में तस्कर अब कैरियर के माध्यम से बाॅर्डर पार से शराब मंगाने लगे हैं। पुलिस की सख्ती के बावजूद बीते एक पखवारा में 300 सीसी से अधिक नेपाली शराब की बरामदगी ने साफ कर दिया है कि चुनाव से पहले शराब का अवैध कारोबार संगठित तरीके से चल रहा है।
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सूत्रों का कहना है कि तस्कर मांग से पहले शराब की खेप को डंप कर लेते हैं। इसके बाद मुंहमांगी कीमत पर उसे बेचा जाता है। सीमावर्ती इलाके के लोगों के मुताबिक भारत और नेपाल की शराब में 20 रुपये प्रति पाउच का अंतर है। इसलिए धंधेबाजों ने अभी से इसे डंप करना शुरू कर दिया है। कमाई के लिए वे इसे 10-15 रुपये अधिक पर थोक में बिक्री करते हैं। चुनाव आते ही नए लोग इस धंधे में जुट जाते हैं। वह केवल चुनाव के समय सक्रिय होते हैं। खास करके ग्राम पंचायत स्तर पर होने वाले चुनाव में उनकी चांदी रहती है जो तस्कर के बढ़ने के पीछे की सबसे बड़ी वजह है।
नेपाल से लगने वाले जिले की 68 किलोमीटर सीमावर्ती इलाके में तस्करी का अलग-अलग ट्रेंड है। नेपाली शराब के लिए बढ़नी और ककरहवा बार्डर संवेदनशील है। ज्यादातर धरपकड़ इन्हीं बाॅर्डर से होती है। सीमावर्ती गांवों से लेकर ककरहा बॉर्डर तक अचानक बढ़ी गतिविधि इस बात की ओर इशारा कर रही है कि तस्करी अब छोटे-मोटे सौदों तक सीमित नहीं रही। दो दिन पहले ककरहा बॉर्डर पर पकड़े गए आरोपी ने पूछताछ में बताया कि उसे केवल बोरी लाने के लिए भेजा गया था और इसके बदले तय रकम दी गई थी। शराब किसकी है, कहां जानी है। इन सवालों की कैरियर को जानकारी नहीं दी गई। असली खेल पीछे बैठे तस्कर और राजनीतिक समीकरण साधने वाले लोग खेल रहे हैं।
बताया जा रहा है कि भारतीय शराब के मुकाबले करीब 20 रुपये कम दाम में मिलने के कारण नेपाली शराब की मांग संभावित प्रत्याशियों में ज्यादा है ताकि कम खर्च में अधिक लोगों को साधा जा सके।
सूत्रों के मुताबिक तस्करी का नेटवर्क तीन स्तरों पर काम कर रहा है। इसमें पहला स्तर सीमा पार से सप्लाई का है, जहां नेपाल से शराब जुटाई जाती है। दूसरा स्तर कैरियरों का है, जिन्हें केवल बोरी या पैकेट लाने-ले जाने का काम सौंपा जाता है। तीसरा और सबसे अहम स्तर स्थानीय संपर्कों का है, जो चुनावी माहौल का फायदा उठाकर शराब को गांव-गांव तक पहुंचाते हैं।
इन स्थानीय लोगों के पास पंचायत चुनाव से जुड़े प्रत्याशियों और उनके समर्थकों तक सीधी पहुंच होती है। सूत्रों का कहना है कि तस्करी में महिलाओं और बच्चों को शामिल कर लेते हैं। वह झोले और बोरी में इसे लेकर आने का काम करते हैं। उन्हें शीशी के हिसाब से रुपये मिलते हैं, ऐसा बढ़नी में रहने वाले उमेश कुमार ने बताया है।
300 शीशी नेपाली शराब बरामद: पुलिस रिकॉर्ड पर नजर डालें तो पिछले एक पखवारा में अलग-अलग स्थानों से 300 शीशी नेपाली शराब बरामद की जा चुकी है। यह आंकड़ा केवल पकड़ी गई खेप का है जबकि असल में इससे कई गुना अधिक शराब खपाई जा चुकी है। सीमावर्ती इलाकों में रात के समय आवाजाही बढ़ना, संदिग्ध बोरी और साइकिल-मोटरसाइकिल से ढुलाई, इस पूरे नेटवर्क की ओर इशारा कर रही है।
चुनाव और शराब का पुराना रिश्ता : ग्राम पंचायत चुनाव में शराब बांटने की परंपरा कोई नई नहीं है, लेकिन इस बार तरीका ज्यादा संगठित और सुरक्षित बनाया गया है। कैरियर कोई और है, पैसे देने वाला कोई और और शराब मंगाने वाला कोई तीसरा। इससे पकड़े जाने की स्थिति में असली सरगना तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। यही वजह है कि तस्कर बेखौफ होकर खेप मंगाने में जुटे हैं।
