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Siddharthnagar News: विस्थापित हुआ गांव... संभलने में लग गए 25 साल
संवाद न्यूज एजेंसी, सिद्धार्थनगर
Updated Thu, 19 Feb 2026 02:51 AM IST
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नौगढ़ तहसील के छितरापार गांव के दो सौ घर और पांच सौ बीघा भूमि नदी में हो चुके है विलीन
विस्थापितों को स्थापित होने के लिए करना पड़ा सालों जद्दोजहद, अब भी कचोट रहा विस्थापन का दर्द
सिद्धार्थनगर। उसका ब्लॉक के छितरापार गांव की खुशहाली को पिछले 40 वर्षों में बूढ़ी राप्ती नदी की कटान ने नजर लगा दी। यहां के लोगों का सुख-चैन छीन लिया गया। नदी की धारा का रास्ता बदलने से इन सालों में एक-एक कर कई रिहायशी मकान नदी में समा गए। दो सौ से अधिक घर और लोगों के कृषि योग्य पांच सौ बीघा से अधिक भूमि नदी में विलीन हो गए। गांव का पुराना प्राथमिक और जूनियर विद्यालय भी इतिहास हो चुके हैं। गांव के बुजुर्ग बुझारत कहते हैं कि कटान से घर और भूमि नदी में विलीन होने के बाद दोबारा घर बनाने और संभलने में सालों लग गए। हालांकि सिंचाई विभाग की ओर से बीते आठ वर्षों में यहां कटान स्थल पर बड़े पैमाने पर बचाव कार्य कराए गए, लेकिन विस्थापन के दर्द की टीस गांव के लोगों को अब परेशान कर रही है।
नौगढ़ तहसील क्षेत्र में बूढ़ी राप्ती नदी किनारे उसका लखनापार बांध के दोनों तरफ बसे छितरापार गांव की बड़ी आबादी के मकान नदी में समा चुके हैं। बीते 40 वर्षों में कटान के चलते नदी और बांध के बीच में स्थित घर के लोग विस्थापित होकर बांध के दूसरी बस चुके हैं। इनमें कई परिवारों के आशियाने नदी की कटान में दो बार उजड़े। वहीं कृषि योग्य पांच सौ बीघा से अधिक भूमि के नदी में समा गई। इसके बाद एक जमाने में अच्छे काश्तकार रहे लोग अब भूमि विहीन हैं। लोगों के घर, खेत और बाग तो नदी में गया ही, गांव में देश की आजादी के समय स्थापित हुई प्राथमिक और जूनियर विद्यालय का भवन नदी में विलीन हो गया। इससे जुड़ी यादों की टीस लोगों के मन में आज भी है। गांव के विनोद शुक्ल कहते हैं कि इसी स्कूल में पढ़कर क्षेत्र के दो छात्र आईएएस बन गए और एक छात्र ने एमएलसी बनकर पूरे प्रदेश में नाम रोशन किया। आज वह स्कूल भवन इतिहास हो चुका है। वहीं, यहां के अधिकांश किसानों की उपजाऊ भूमि के कटकर नदी में विलीन होने से पैदावार सिर्फ खाने भरकर अन्न तक सिमट गई है।
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विस्थापन का दर्द समेट हुए किसी तरह स्थापित
कटान के चलते अपना घर और खेत गंवा चुके छितरापार गांव के क्षेत्र पंचायत सदस्य गंगाराम, श्रवण कुमार और कीरत यादव ने कहा कि उनका बचपना जिस घर में बीता था, उसे नदी में समाए वर्षों बीत गए। नए सिरे से दोबारा घर बनाने के बाद रोजी-रोटी की व्यवस्था करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा। कई ऐसे भी परिवार थे, जिनके पास नया घर बनाने के लिए भूमि नहीं थी, उन्होंने किसी तरह भूमि की व्यवस्था की और उस पर नींव डालकर धीरे-धीरे मकान खड़ा किया। मथुरा ठकुराई और श्रवण ठकुराई कहते हैं कि कृषि योग्य उपजाऊ भूमि कटकर नदी में चले जाने से बहुत दिक्कत हुई, जिससे संभलने में समय लगा।
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कटान से विलुप्त होने के कगार पर संगलदीप
जिले में होकर बहने वाली सबसे बड़ी नदी राप्ती नदी की कटान से जोगिया विकास खंड संगलदीप, अमरिया और रीवां नानकार समेत आधा दर्जन गांवों के चार दर्जन से अधिक मकान नदी में विलीन हो चुके हैं। बरसात के दिनों में राप्ती में हल्का सा पानी बढ़ने के साथ इन गांवों के लोगों की सांसें ऊपर-नीचे होने लगतीं हैं। बाढ़ का पानी नदी में आने के साथ ही इन गांवों में कटान तेज हो जाती है। यह पानी उतरने के दौरान भी जारी रहती है। इसका नतीजा है कि कई लोगों के मकान नदी में विलीन हो गए। अपना आशियाना गंवा चुके लोग या तो अपने रिश्तेदारों या फिर निकट के बांधों पर शरण लेने को मजबूर रहते हैं।
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60 गांवों में कटान से सैकड़ों मकान विलीन
बारिश के मौसम में जिले में राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बाणगंगा, कूड़ा और घोघी नदियां तबाही मचाती है। जहां बाढ़ से हजारों गांव जलमग्न रहते हैं, वहीं नदियों के जलस्तर बढ़ने या घटने के दौरान तेज कटान होती है। नदियों की कटान में अब तक 60 गांवों के दो हजार से अधिक मकान, 15 हजार एकड़ कृषि भूमि व बाग विलीन हो चुके हैं। इनके मकान नदी के मुहाने पर हैं वे बेचैनी की हालत में नदियों के जलस्तर पर निगाह लगाए दिन और रात काट रहे हैं। बूढ़ी राप्ती नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित जोगिया क्षेत्र के फत्तेपुर गांव के पास कटान के मुहाने पर मकान होने से प्रभु, राजाराम और धर्मराज बाढ़ के समय सशंकित रहते हैं।
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ये हैं अति संवेदनशील व संवेदनशील कटान स्थल
सिंचाई विभाग की तरफ से चिह्नित 39 कटान स्थलों में 20 से अधिक अति संवेदनशील कटान स्थल चिह्नित किए गए हैं। जबकि 19 कटान स्थल संवेदनशील हैं। इनके अलावा जिले में 30 से अधिक कटान स्थल ऐसे हैं, जहां बचाव और सुरक्षा उपाय की जरूरत है, जिससे लोगों के मकान, कृषि भूमि व बाग नदी में गिरने बचाया जा सके। इनमें अति संवेदनशील कटान स्थलों में कोड़रवा, सतवाड़ी, सोनौली, जनुका, सिंगारजोत, इमिलिहा, महुवा, तनेजवा, भूतहिया, सेमरा, बरैनिया, नरकटहा, बंजरहा, बेतनार, ककरही, डेंगहर, धनौरा मुस्तकहम, महथावल और जमुआर नाला किनारे शहर के निकट पुरानी नौगढ़ कटान स्थल शामिल हैं।
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नदी कटान में सबकुछ गंवाने के बाद नए सिरे घर बनाने और स्थापित होने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा, इस बीच बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा।
परमेश्वर यादव, किसान
कटान से मकान और भूमि नदी में विलीन होने से बहुत परेशानी हुई। इसके बाद नया घर बनाने और दोबारा व्यवस्थित करने में बहुत जद्दोजहद करना पड़ा।
राधिका देवी, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य
कटान से घर नदी में विलीन होने के बाद बहुत परेशानी हुई, किसी तरह नया घर बनाने के साथ दोबारा स्थापित करने के लिए सालों तक संघर्ष करना पड़ा।
हरीराम यादव, किसान
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कटान स्थलों पर बचाव और मरम्मत कार्य कराया गया है। वर्तमान में भी अति संवेदनशील और संवेदनशील कटान स्थलों पर कार्य कराने की स्वीकृति शासन से मिली है, जिस पर जल्द ही कार्य कराया जाएगा। बाढ़ बचाव कार्य में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं की जाती है।
कृपाशंकर भारती, अधिशासी अभियंता ड्रेनेज खंड
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विस्थापितों को स्थापित होने के लिए करना पड़ा सालों जद्दोजहद, अब भी कचोट रहा विस्थापन का दर्द
सिद्धार्थनगर। उसका ब्लॉक के छितरापार गांव की खुशहाली को पिछले 40 वर्षों में बूढ़ी राप्ती नदी की कटान ने नजर लगा दी। यहां के लोगों का सुख-चैन छीन लिया गया। नदी की धारा का रास्ता बदलने से इन सालों में एक-एक कर कई रिहायशी मकान नदी में समा गए। दो सौ से अधिक घर और लोगों के कृषि योग्य पांच सौ बीघा से अधिक भूमि नदी में विलीन हो गए। गांव का पुराना प्राथमिक और जूनियर विद्यालय भी इतिहास हो चुके हैं। गांव के बुजुर्ग बुझारत कहते हैं कि कटान से घर और भूमि नदी में विलीन होने के बाद दोबारा घर बनाने और संभलने में सालों लग गए। हालांकि सिंचाई विभाग की ओर से बीते आठ वर्षों में यहां कटान स्थल पर बड़े पैमाने पर बचाव कार्य कराए गए, लेकिन विस्थापन के दर्द की टीस गांव के लोगों को अब परेशान कर रही है।
नौगढ़ तहसील क्षेत्र में बूढ़ी राप्ती नदी किनारे उसका लखनापार बांध के दोनों तरफ बसे छितरापार गांव की बड़ी आबादी के मकान नदी में समा चुके हैं। बीते 40 वर्षों में कटान के चलते नदी और बांध के बीच में स्थित घर के लोग विस्थापित होकर बांध के दूसरी बस चुके हैं। इनमें कई परिवारों के आशियाने नदी की कटान में दो बार उजड़े। वहीं कृषि योग्य पांच सौ बीघा से अधिक भूमि के नदी में समा गई। इसके बाद एक जमाने में अच्छे काश्तकार रहे लोग अब भूमि विहीन हैं। लोगों के घर, खेत और बाग तो नदी में गया ही, गांव में देश की आजादी के समय स्थापित हुई प्राथमिक और जूनियर विद्यालय का भवन नदी में विलीन हो गया। इससे जुड़ी यादों की टीस लोगों के मन में आज भी है। गांव के विनोद शुक्ल कहते हैं कि इसी स्कूल में पढ़कर क्षेत्र के दो छात्र आईएएस बन गए और एक छात्र ने एमएलसी बनकर पूरे प्रदेश में नाम रोशन किया। आज वह स्कूल भवन इतिहास हो चुका है। वहीं, यहां के अधिकांश किसानों की उपजाऊ भूमि के कटकर नदी में विलीन होने से पैदावार सिर्फ खाने भरकर अन्न तक सिमट गई है।
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विस्थापन का दर्द समेट हुए किसी तरह स्थापित
कटान के चलते अपना घर और खेत गंवा चुके छितरापार गांव के क्षेत्र पंचायत सदस्य गंगाराम, श्रवण कुमार और कीरत यादव ने कहा कि उनका बचपना जिस घर में बीता था, उसे नदी में समाए वर्षों बीत गए। नए सिरे से दोबारा घर बनाने के बाद रोजी-रोटी की व्यवस्था करने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा। कई ऐसे भी परिवार थे, जिनके पास नया घर बनाने के लिए भूमि नहीं थी, उन्होंने किसी तरह भूमि की व्यवस्था की और उस पर नींव डालकर धीरे-धीरे मकान खड़ा किया। मथुरा ठकुराई और श्रवण ठकुराई कहते हैं कि कृषि योग्य उपजाऊ भूमि कटकर नदी में चले जाने से बहुत दिक्कत हुई, जिससे संभलने में समय लगा।
कटान से विलुप्त होने के कगार पर संगलदीप
जिले में होकर बहने वाली सबसे बड़ी नदी राप्ती नदी की कटान से जोगिया विकास खंड संगलदीप, अमरिया और रीवां नानकार समेत आधा दर्जन गांवों के चार दर्जन से अधिक मकान नदी में विलीन हो चुके हैं। बरसात के दिनों में राप्ती में हल्का सा पानी बढ़ने के साथ इन गांवों के लोगों की सांसें ऊपर-नीचे होने लगतीं हैं। बाढ़ का पानी नदी में आने के साथ ही इन गांवों में कटान तेज हो जाती है। यह पानी उतरने के दौरान भी जारी रहती है। इसका नतीजा है कि कई लोगों के मकान नदी में विलीन हो गए। अपना आशियाना गंवा चुके लोग या तो अपने रिश्तेदारों या फिर निकट के बांधों पर शरण लेने को मजबूर रहते हैं।
60 गांवों में कटान से सैकड़ों मकान विलीन
बारिश के मौसम में जिले में राप्ती, बूढ़ी राप्ती, बाणगंगा, कूड़ा और घोघी नदियां तबाही मचाती है। जहां बाढ़ से हजारों गांव जलमग्न रहते हैं, वहीं नदियों के जलस्तर बढ़ने या घटने के दौरान तेज कटान होती है। नदियों की कटान में अब तक 60 गांवों के दो हजार से अधिक मकान, 15 हजार एकड़ कृषि भूमि व बाग विलीन हो चुके हैं। इनके मकान नदी के मुहाने पर हैं वे बेचैनी की हालत में नदियों के जलस्तर पर निगाह लगाए दिन और रात काट रहे हैं। बूढ़ी राप्ती नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित जोगिया क्षेत्र के फत्तेपुर गांव के पास कटान के मुहाने पर मकान होने से प्रभु, राजाराम और धर्मराज बाढ़ के समय सशंकित रहते हैं।
ये हैं अति संवेदनशील व संवेदनशील कटान स्थल
सिंचाई विभाग की तरफ से चिह्नित 39 कटान स्थलों में 20 से अधिक अति संवेदनशील कटान स्थल चिह्नित किए गए हैं। जबकि 19 कटान स्थल संवेदनशील हैं। इनके अलावा जिले में 30 से अधिक कटान स्थल ऐसे हैं, जहां बचाव और सुरक्षा उपाय की जरूरत है, जिससे लोगों के मकान, कृषि भूमि व बाग नदी में गिरने बचाया जा सके। इनमें अति संवेदनशील कटान स्थलों में कोड़रवा, सतवाड़ी, सोनौली, जनुका, सिंगारजोत, इमिलिहा, महुवा, तनेजवा, भूतहिया, सेमरा, बरैनिया, नरकटहा, बंजरहा, बेतनार, ककरही, डेंगहर, धनौरा मुस्तकहम, महथावल और जमुआर नाला किनारे शहर के निकट पुरानी नौगढ़ कटान स्थल शामिल हैं।
नदी कटान में सबकुछ गंवाने के बाद नए सिरे घर बनाने और स्थापित होने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा, इस बीच बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा।
परमेश्वर यादव, किसान
कटान से मकान और भूमि नदी में विलीन होने से बहुत परेशानी हुई। इसके बाद नया घर बनाने और दोबारा व्यवस्थित करने में बहुत जद्दोजहद करना पड़ा।
राधिका देवी, पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य
कटान से घर नदी में विलीन होने के बाद बहुत परेशानी हुई, किसी तरह नया घर बनाने के साथ दोबारा स्थापित करने के लिए सालों तक संघर्ष करना पड़ा।
हरीराम यादव, किसान
कटान स्थलों पर बचाव और मरम्मत कार्य कराया गया है। वर्तमान में भी अति संवेदनशील और संवेदनशील कटान स्थलों पर कार्य कराने की स्वीकृति शासन से मिली है, जिस पर जल्द ही कार्य कराया जाएगा। बाढ़ बचाव कार्य में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं की जाती है।
कृपाशंकर भारती, अधिशासी अभियंता ड्रेनेज खंड