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UP: न थाना न कचहरी... दोषी को मिलती है गुड़ खिलाने और पानी पिलाने की सजा, सोनभद्र की अनोखी पंचायत

Tue, 28 Jul 2026 11:50 AM IST
Pragati Chand बीरेंद्र कुमार शुक्ल, अमर उजाला ब्यूरो, सोनभद्र।
बीरेंद्र कुमार शुक्ल, अमर उजाला ब्यूरो, सोनभद्र। Published by: Pragati Chand Updated Tue, 28 Jul 2026 11:50 AM IST
सार

Sonbhadra News: छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसे आदिवासी बहुल महुली गांव में 1063 परिवार रहते हैं। इस गांव में पारिवारिक विवाद, जमीन, मारपीट, गाली-गलौज और चोरी जैसे मामलों को गांव में ही निपटाए जाते हैं। 

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Cases are settled at panchayat in Mahuli tribal-dominated village in Sonbhadra
यूपी का अनोखा गांव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

थाना न कचहरी...दोषी पाए जाने पर गुड़ खिलाने और पानी पिलाने की सजा। ये बात आपको कुछ अजीब लग सकती है मगर सोनभद्र जिले के बीजपुर थाना क्षेत्र के महुली गांव में पंचायत पारिवारिक विवाद, जमीन, मारपीट, गाली-गलौज और चोरी जैसे मामलों को निपटाती है। दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्ति को सजा देती है।

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पंच एक राय होकर दोषी की हैसियत के हिसाब से सजा तय करते हैं। इसके बाद रजिस्टर में सुलहनामा लिखा जाता है, इसमें दोनों पक्ष अपने-अपने अंगूठे लगाते हैं ताकि बाद में कोई पक्ष अपनी बात से न मुकर जाए। गांव में यह व्यवस्था सन 1980 से चली आ रही है।
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छत्तीसगढ़ की सीमा पर बसे आदिवासी बहुल महुली गांव में 1063 परिवार रहते हैं। गांव में गोंड, धरकार, यादव, विश्वकर्मा आदि जातियों के लोग रहते हैं। इनमें ज्यादातर किसान और मजदूर हैं। गांव से थाने की दूरी 20 किलोमीटर है। कभी-कभी 112 पुलिस की टीम गांव में गश्त करने आती है। दो माह पहले तालाब में एक युवक की डूबने से मौत हो गई थी, तब पुलिस जांच करने आई थी।

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हत्या, लूट, डकैती जैसी आपराधिक घटनाएं न होने के कारण अधिकांश मामले पंचायत में सुलह-समझाैते से निपटते हैं। पंचायत हर रविवार को बैठती है। हर महीने 4 से 5 मामले आते हैं। निस्तारित पुराने मामलों के बारे में भी पूछा जाता है। 1980 से 2005 तक गांव के प्रधान रहे रामकिशुन मुख्य पंच हैं। गांव के सबसे बुजुर्ग 77 वर्षीय रामकिशुन आठवीं तक पढ़े हैं, जबकि पंच श्रवण सिंह स्नातक हैं और झम्मन सिंह व संधारी यादव प्राइमरी तक पढ़े हैं।

पंच रामकिशुन ने बताया कि ज्यादातर विवाद पारिवारिक और जमीन से जुड़े होते हैं। उनकी याद में पाॅक्साे एक्ट, लूट, डकैती, हत्या जैसी घटनाएं गांव में नहीं हुईं। पारिवारिक मामलों में पति-पत्नी, सास-बहू, भाइयों के बीच विवाद होते हैं। दोनों पक्षों को समझाया जाता है। दोषी पाए जाने पर पंचायत में माैजूद लोगों को गुड़ खिलाने, पानी पिलाने आदि की सजा दी जाती है।

उन्होंने बताया कि जमीन का मामला पेंचीदा होने पर लेखपाल को बुलाया जाता है, वह सिर्फ नापजोख करता है, बाकी फैसला पंच ही करते हैं। रामकिशुन ने बताया कि चोरी के मामलों में दोषी काे सामान लाैटाना पड़ता है। कान पकड़ कर माफी मांगता है और रजिस्टर पर सबकुछ दर्ज किया जाता है ताकि बाद में कोई मुकर न जाए। पंचायत की बात न मानने पर पूरा गांव उस व्यक्ति का बहिष्कार कर देता है।

मार-मार कर तुम्हारा भूत उतार दूंगा
रामकिशुन कहते हैं कि आदिवासी समाज में कई कुरीतियां भी हैं। गांव प्राथमिक विद्यालय खुलने के बाद लोगों में धीरे-धीरे जागरूकता आ रही है। उन्होंने बताया कि एक बार पंचायत में भूत-प्रेत उतारने का मामला आया। सोखा (झाड़-फूंक करने वाला) ने दावा कि एक व्यक्ति पर भूत का साया है। उसे उतारना पड़ेगा, पूजा-पाठ करनी होगी। मैंने, सोखा से कहा, यदि भूत दिखा दोगे तो तुम्हारी बात मान ली जाएगी, नहीं तो मार-मार कर तुम्हारा भूत उतार दूंगा। इतना सुनते ही सोखा वहां से भाग गया। उन्होंने बताया कि गांव में कोई व्यक्ति शराब का व्यवसाय नहीं करता है और न ही सेवन करता है।

पुलिस भी नहीं देती है पंचायत के फैसलों में दखल
गांव के भुवनेश्वर सिंह ने बताया कि एक व्यक्ति को उसके तीन बेटे साथ रखने काे तैयार नहीं थे। मामला पंचायत में पहुंचा तो मझला बेटा पिता की सेवा करने के लिए तैयार हो गया लेकिन पंचों ने कहा, जब पिता की जायदाद में तीनों बेटे हिस्सेदार हैं तो सेवा सभी को करनी होगी लेकिन दो बेटों ने मना कर दिया। इस पर पंचायत ने पिता की जमीन का 10 बिस्वा जमीन मझले बेटे को देने फरमान सुनाया, जिसे तीनों बेटों ने मान लिया।

रघुनाथ भाई ने बताया कि गांव के लोगों में पुलिस के प्रति डर का भाव नहीं है लेकिन थाने और कचहरी जाने में वक्त और पैसा बर्बाद होता है। इसलिए लोग पंचायत पर भरोसा करते हैं। पुलिस भी पंचायत के फैसलों में दखल नहीं देती है।

इन गांवों में भी पंचायत में निपटाए जाते हैं मामले
आदिवासी बहुल रजमिलान, अमरसोट्टा, चोरपनिया, छाताडांड, करमसर, खादर, पहाड़पट्टी, कबरौल, सेलेहवा, कुरकुटिया, भावरकुंड, हरिपुर, तूरीपान, बारोहिया, कनवार, माहम, नेवाड़ी, चाैरा, चरका, सरपटवा, बोकाराखड़ी, जिगनाटोला, जाैराही, राइगाटोला, नटवाटोला, जिगनवा, सेमरिया आदि गांवों में भी सुलह-समझौते से आपराधिक मामलों का पंचायतों में ही निपटारा होता है।
 
रॉबर्ट्सगंज थाने में सबसे ज्यादा प्राथमिकी दर्ज
आपराधिक घटनाओं के मामले में रॉबर्ट्सगंज थाना सबसे आगे है। वर्ष 2026 में थाने में 626 प्राथमिकी दर्ज की गईं, जबकि दूसरे नंबर पर चोपन थाना है, यहां पर 292 प्राथमिकी दर्ज की गईं। म्योरपुर थाने में 91 और बीजपुर थाने में 81 प्राथमिकी दर्ज की गईं।
 

गांव के लोग पंचायत में ही ज्यादातर विवादों को सुलझा लेते हैं। पंचों का निर्णय सबको स्वीकार होता है। शायद ही ऐसी नौबत आती है कि थाने जाना पड़े या पुलिस की मदद लेनी पड़े। सुरक्षा के लिहाज से पुलिस गांव में गश्त करती रहती है। -जुकमनिया देवी, ग्राम प्रधान, महुली 
 
छोटे-छोटे विवादों को आपस में बैठकर सुलझा लेना अच्छी बात है। अन्य गांवों को भी इससे प्रेरणा लेनी चाहिए। आपसी सहमति से विवाद निपटाए जाने से कोई मनमुटाव नहीं रह जाता। फिर भी अगर किसी को मदद की जरूरत होती है तो पुलिस हर वक्त उपलब्ध है। -अभिषेक वर्मा, एसपी 

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