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Unnao News: इतिहास के पन्नों पर उकेरा इत्रनगरी का वैभवशाली अतीत
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फोटो :14: डॉ. सुमन शुक्ला बाजपेयी। स्रोत : स्वयं
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कन्नौज। इतिहास की किताबों के पन्ने जब पलटते हैं तो स्वर्ण अक्षरों में कान्यकुब्ज नाम चमकता है। इसे आज हम इत्र राजधानी कन्नौज के नाम से जानते हैं। कभी उत्तर भारत की सत्ता का केंद्र रहा यह शहर केवल खुशबुओं का सौदागर नहीं है बल्कि यह उस शौर्य और संस्कृति का गवाह है जिसने सदियों तक भारत की नियति तय की। इसके वैभवशाली अतीत को इतिहास के पन्नों पर संजोने वालीं इतिहासकार डॉ. सुमन शुक्ला बाजपेई ने इत्रनगरी की सांस्कृतिक विरासत को नई पहचान दी है।
आधुनिकता की चकाचौंध में युवा पीढ़ी कन्नौज के उस ऐतिहासिक महत्व को भूलने लगी थी जब यह नगर मगध के बाद भारत की सबसे शक्तिशाली राजधानी हुआ करता था। यहां की प्राचीन इमारतें और मंदिर मौन होकर अपने पतन की कहानी कह रहे थे। विदेशी आक्रांताओं ने बार-बार इस शहर की समृद्धि को लूटा और इसे छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया लेकिन कन्नौज की मिट्टी में बसी अस्मिता कभी खत्म नहीं हुई।
इस लुप्त होती विरासत को सहेजने का संकल्प प्रख्यात इतिहासकार डॉ. सुमन शुक्ला बाजपेई ने लिया। उन्होंने महसूस किया कि यदि कन्नौज के आदिकाल से लेकर वर्तमान तक के सफर को लिपिबद्ध नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट जाएंगीं। उन्होंने कन्नौज गजेटियर की रचना की जिसने इस शहर को एक नई सांस्कृतिक पहचान दी। उत्तर प्रदेश पर्यटन और जिला पर्यटन एवं सांस्कृतिक परिषद के मार्गदर्शन में उन्होंने एक कॉफी टेबल बुक भी तैयार की है। यह पुस्तक केवल पन्नों का पुलिंदा नहीं बल्कि कन्नौज के गौरवशाली अतीत का एक सजीव दस्तावेज है। जो शहर कभी पूरे भारत की राजधानी था उसका सम्मान बहाल होना चाहिए। उनकी लेखनी ने न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को संरक्षित किया है बल्कि पर्यटन के दृष्टिकोण से भी कन्नौज को नई ऊंचाई दी है।
कन्नौज केवल एक शहर नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता का एक जीवंत अध्याय है। इत्रनगरी का यह वैभवशाली अतीत अब केवल यादों में नहीं बल्कि दस्तावेजों और किताबों के जरिए आने वाली सदियों तक महकता रहेगा। इसके लिए डॉ. सुमन शुक्ला जैसे इतिहासकारों का समर्पण अति आवश्यक है। -आशुतोष मोहन अग्निहोत्री, जिलाधिकारी
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आधुनिकता की चकाचौंध में युवा पीढ़ी कन्नौज के उस ऐतिहासिक महत्व को भूलने लगी थी जब यह नगर मगध के बाद भारत की सबसे शक्तिशाली राजधानी हुआ करता था। यहां की प्राचीन इमारतें और मंदिर मौन होकर अपने पतन की कहानी कह रहे थे। विदेशी आक्रांताओं ने बार-बार इस शहर की समृद्धि को लूटा और इसे छिन्न-भिन्न करने का प्रयास किया लेकिन कन्नौज की मिट्टी में बसी अस्मिता कभी खत्म नहीं हुई।
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इस लुप्त होती विरासत को सहेजने का संकल्प प्रख्यात इतिहासकार डॉ. सुमन शुक्ला बाजपेई ने लिया। उन्होंने महसूस किया कि यदि कन्नौज के आदिकाल से लेकर वर्तमान तक के सफर को लिपिबद्ध नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों से कट जाएंगीं। उन्होंने कन्नौज गजेटियर की रचना की जिसने इस शहर को एक नई सांस्कृतिक पहचान दी। उत्तर प्रदेश पर्यटन और जिला पर्यटन एवं सांस्कृतिक परिषद के मार्गदर्शन में उन्होंने एक कॉफी टेबल बुक भी तैयार की है। यह पुस्तक केवल पन्नों का पुलिंदा नहीं बल्कि कन्नौज के गौरवशाली अतीत का एक सजीव दस्तावेज है। जो शहर कभी पूरे भारत की राजधानी था उसका सम्मान बहाल होना चाहिए। उनकी लेखनी ने न केवल ऐतिहासिक तथ्यों को संरक्षित किया है बल्कि पर्यटन के दृष्टिकोण से भी कन्नौज को नई ऊंचाई दी है।
कन्नौज केवल एक शहर नहीं बल्कि भारतीय सभ्यता का एक जीवंत अध्याय है। इत्रनगरी का यह वैभवशाली अतीत अब केवल यादों में नहीं बल्कि दस्तावेजों और किताबों के जरिए आने वाली सदियों तक महकता रहेगा। इसके लिए डॉ. सुमन शुक्ला जैसे इतिहासकारों का समर्पण अति आवश्यक है। -आशुतोष मोहन अग्निहोत्री, जिलाधिकारी

फोटो :14: डॉ. सुमन शुक्ला बाजपेयी। स्रोत : स्वयं
