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Unnao News: पति की मौत के बाद भी नहीं टूटीं बाराघर धनकोली की सुमन
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फोटो-24-तीनों बेटों के साथ सुमन देवी। स्रोत: आर्काइव।
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पाटन। पति की मौत और मात्र दस बिस्वा जमीन। परिवार में पांच बच्चे। पहले तो एक बार लगा कि कैसे इन बच्चों का पालन पोषण हो पाएगा। फिर मन को मजबूत किया और आगे बढ़ी तो संघर्ष शुरू किया। मां की मेहनत व कड़े संघर्ष के बाद आज बच्चे सेना में नौकरी कर रहे हैं। बच्चे सफलता का श्रेय मां की मेहनत को दे रहे हैं।
पाटन तहसील क्षेत्र के बाराघर धनकोली निवासी कुसुम कुमारी के पति बालकेश सिंह की मौत वर्ष 2001 में हो गई थी। उनके पांच बच्चों में तीन बेटे व दो बेटियां थीं। बड़ा बेटा 12 साल का था और छोटी बेटी भारती सिंह मात्र दो वर्ष की थी। हिस्से में जमीन के नाम पर मात्र 10 बिस्वा भूमि थी। पति की मौत ने सुमन को अंदर से तोड़ दिया। आय का कोई दूसरा साधन नहीं था। परिवार बड़ा था। सबसे बड़ी बात बच्चों की परवरिश थी। आखिरकार सुमन ने जमीन के सहारे ही बच्चों का पालन पोषण शुरू किया। इसके बाद वर्ष 2005 में आंगनबाड़ी सहायिका बन गईं तो कुछ राहत मिली लेकिन पांच बच्चों की पढ़ाई को जारी रखने का संघर्ष कम नहीं था। सुमन ने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होने लगी। उनका संघर्ष रंग लाया जब वर्ष 2013 में मंझले बेटे केतन प्रताप की नौ-सेना में नौकरी लग गई। इसके बाद बड़े बेटे राहुल सिंह व सबसे छोटे बेटे अमन सिंह भी भारतीय सेना में भर्ती हो गए। दोनों बेटियों का विवाह भी अच्छे घर में किया। बड़ी बेटी आकृति सिंह के पति भारतीय सेना एवं छोटी बेटी भारती के पति भारतीय वायु सेना में कार्यरत है।
इंसेट-1
सहायिका की नौकरी के दौरान ही पास की दसवीं की परीक्षा
सुमन ने सहायिका की नौकरी करते हुए वर्ष 2007 में हाईस्कूल की परीक्षा दी। इसमें सुमन को सफलता मिली और दसवीं की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। सुमन के बेटे केतन, राहुल व अमन का कहना है कि उनकी मां उन लोगों की सबसे बड़ी रोल मॉडल हैं। उन्होंने कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। उनके त्याग व संघर्ष से ही आज वह लोग इस मुकाम पर पहुंचे हैं। उनके ऋण से वह लोग कभी उऋण नहीं हो सकते।
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पाटन तहसील क्षेत्र के बाराघर धनकोली निवासी कुसुम कुमारी के पति बालकेश सिंह की मौत वर्ष 2001 में हो गई थी। उनके पांच बच्चों में तीन बेटे व दो बेटियां थीं। बड़ा बेटा 12 साल का था और छोटी बेटी भारती सिंह मात्र दो वर्ष की थी। हिस्से में जमीन के नाम पर मात्र 10 बिस्वा भूमि थी। पति की मौत ने सुमन को अंदर से तोड़ दिया। आय का कोई दूसरा साधन नहीं था। परिवार बड़ा था। सबसे बड़ी बात बच्चों की परवरिश थी। आखिरकार सुमन ने जमीन के सहारे ही बच्चों का पालन पोषण शुरू किया। इसके बाद वर्ष 2005 में आंगनबाड़ी सहायिका बन गईं तो कुछ राहत मिली लेकिन पांच बच्चों की पढ़ाई को जारी रखने का संघर्ष कम नहीं था। सुमन ने विपरीत परिस्थितियों में भी हार नहीं मानी और बच्चों की पढ़ाई बाधित नहीं होने लगी। उनका संघर्ष रंग लाया जब वर्ष 2013 में मंझले बेटे केतन प्रताप की नौ-सेना में नौकरी लग गई। इसके बाद बड़े बेटे राहुल सिंह व सबसे छोटे बेटे अमन सिंह भी भारतीय सेना में भर्ती हो गए। दोनों बेटियों का विवाह भी अच्छे घर में किया। बड़ी बेटी आकृति सिंह के पति भारतीय सेना एवं छोटी बेटी भारती के पति भारतीय वायु सेना में कार्यरत है।
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सहायिका की नौकरी के दौरान ही पास की दसवीं की परीक्षा
सुमन ने सहायिका की नौकरी करते हुए वर्ष 2007 में हाईस्कूल की परीक्षा दी। इसमें सुमन को सफलता मिली और दसवीं की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। सुमन के बेटे केतन, राहुल व अमन का कहना है कि उनकी मां उन लोगों की सबसे बड़ी रोल मॉडल हैं। उन्होंने कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी। उनके त्याग व संघर्ष से ही आज वह लोग इस मुकाम पर पहुंचे हैं। उनके ऋण से वह लोग कभी उऋण नहीं हो सकते।
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