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UP Elections: सुरक्षित सीटों की चारदीवारी लांघेंगे दलित, बसपा के मूल वोट बैंक को हथियाने की जंग बनेगी कारण

Sun, 19 Jul 2026 08:29 AM IST
Sharukh Khan हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली
हिमांशु मिश्र, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Sharukh Khan Updated Sun, 19 Jul 2026 08:29 AM IST
सार

यूपी चुनाव में दलित सुरक्षित सीटों की चारदीवारी लांचेंगे। बसपा के मूल दलित वोट बैंक पर कब्जे के लिए चुनावी रण में उतरने वाले सभी प्रमुख दल पहली बार थोक में सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं।

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UP elections 2026 Dalits to break confines of reserved seats After SP and Congress
up election 2027 - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

देश की राजनीति में दलितों की हिस्सेदारी आमतौर पर सुरक्षित सीटों तक सीमित है। हालांकि आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में विभिन्न दलों की यह अघोषित परिपाटी दम तोड़ती दिखेगी। कारण, चुनाव दर चुनाव लगातार कमजोर होती जा रही बसपा के मूल दलित वोट बैंक पर कब्जे के लिए चुनावी रण में उतरने वाले सभी प्रमुख दल पहली बार थोक में सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहे हैं। इस नए सियासी प्रयोग का अखाड़ा पश्चिम और मध्य उत्तर प्रदेश (अवध) बनेगा, जहां दलित बिरादरी की भूमिका निर्णायक है।
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दरअसल, बीते लोकसभा चुनाव में सामान्य सीट अयोध्या में दलित कार्ड के सफल प्रयोग के बाद सपा उत्साहित है। पार्टी के दलित उम्मीदवार अवधेश प्रसाद की जीत के बाद सपा ने इस वर्ग को संदेश देने के लिए कम से कम दो दर्जन सामान्य सीटों पर यही प्रयोग करने की रणनीति बनाई है। 
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सपा की इस रणनीति से सतर्क भाजपा ने भी ऐसी ही चाल चलने की रणनीति बनाई है। इस क्रम में भाजपा ऐसी सीटें चिह्नित कर रही हैं जहां उसके मूल बोट बैंक के साथ दलितों की संख्या प्रभावशाली हो।

पश्चिम और अवध बनेगा अखाड़ा
राजनीति की नई परिपाटी का पश्चिम उत्तर प्रदेश और अवध अखाड़ा बनेगा, जहां दलित बिरादरी की आबादी क्रमशः 23 और 25 फीसदी है। गौरतलब है कि राज्य की 403 में से 84 सीटें एससी और 2 सीटें एसटी सुरक्षित हैं। दलितों की आबादी करीब 21 फीसदी है। गठबंधन और दल आमतौर पर इन्हीं सीटों पर एससी-एसटी उम्मीदवारों को मौका देते रहे हैं।
 
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दलित विधायकों की बढ़ेगी संख्या
इस सियासी होड़ में दलित विधायकों की संख्या बढ़ने के आसार हैं। समाजवादी पार्टी दलितों की उम्मीदवारी के लिए ऐसी सीटें तलाश रही है जहां उसके मूल बोट बैंक (यादव व मुस्लिम) के साथ दलितों की संख्या ज्यादा हो जिससे जीत पक्की हो सके।

वहीं, भाजपा भी ऐसी सीटें तलाश रही है जहां अगड़ा, अति पिछड़ा के साथ दलित का गठजोड़ अजेय समीकरण बनाए। अलग-अलग रणनीति के कारण दलित उम्मीदवारों का सामना अन्य जाति के साथ होगा।
 

इस बार नई रणनीति क्यों?
दरअसल, दोनों संभावित सपा-कांग्रेस और राजग गठबंधन की निगाहें बसपा के मूल बोट बैंक पर है। बसपा के लगातार छिटकते जनाधार के कारण राज्य के दलित वोट बैंक में बीते डेढ़ दशकों में तेजी से बिखराव हुआ है।

भाजपा ने पहले इस स्थिति का लाभ उठाते हुए गैरजाटव दलितों को साधा। हालांकि बीते लोकसभा चुनाव में इस वोट बैंक में सपा ने भी सेंधमारी की। अब भाजपा और सपा के बीच जाटव व गैरजाटव वोट बैंक में सेंध लगाने की होड़ है।

पहले रहे हैं अपवाद
ऐसा नहीं है कि सामान्य सीटों पर दलित उम्मीदवार लड़ते-जीतते नहीं रहे हैं। हालांकि यह प्रतीकात्मक ही रहा है। मसलन वर्तमान लोकसभा में उत्तर प्रदेश की सामान्य सीट से जीतने वाले अवधेश कुमार इकलौते दलित हैं। हालांकि 1991 में कांशीराम इटावा की सामान्य सीट पर जीते थे।

वर्तमान में किरेन रिजिजू (एसटी) सामान्य सीट अरुणाचल प्रदेश पश्चिम, चरणजीत सिंह चन्नी (एससी) सामान्य सीट जालंधर से सांसद हैं। झारखंड के सीएम रहे बाबूलाल मरांडी इकलौते आदिवासी नेता हैं जिन्हें सामान्य सीट से सांसद के साथ विधायक बनने का भी अवसर मिला है।
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