BHU: कुलपति बोले- वैश्विक सम्मेलन के विमर्शों को रिसर्च पेपरों और डिजिटल सामग्री में सुरक्षित रखें
Varanasi News: बीएचयू में अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन शुरू हुआ। कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने विमर्शों को शोध पत्र, पुस्तकों और डिजिटल सामग्री में सुरक्षित करने पर जोर दिया। विशेषज्ञों ने भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनर्जीवन और वैश्विक प्रसार की आवश्यकता बताई।
विस्तार
BHU: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 'भारतीय ज्ञान प्रणाली : विभिन्न आयाम' विषय पर तीन दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का गुरुवार को शुभारंभ हुआ। मालवीय मूल्य अनुशीलन केंद्र में आयोजित इस सम्मेलन में देश-विदेश के विद्वान भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध पहलुओं पर विचार-विमर्श कर रहे हैं।
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने सम्मेलन में होने वाले विमर्शों को केवल चर्चा तक सीमित न रखने, बल्कि उन्हें पुस्तकों, शोध पत्रों और डिजिटल सामग्री के रूप में संरक्षित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि इस तरह के प्रयास भविष्य के शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी साबित होंगे और ज्ञान के संरक्षण व प्रसार में मदद करेंगे।
कुलपति ने शोधार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि वे महत्वपूर्ण और प्रासंगिक शोध प्रश्नों को सामने लाएं। साथ ही, उन्होंने बीएचयू की ‘विश्वविद्यालय’ की मूल अवधारणा को पुनर्जीवित करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि वैश्विक ज्ञान में भारत की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विश्वभर की प्रतिभाओं को बीएचयू से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विविधता का उल्लेख करते हुए कहा कि हजारों भाषाओं और परंपराओं के बावजूद देश की एकता और मजबूती का आधार भारतीय ज्ञान परंपरा ही है।
सम्मेलन में हुआ विमर्श
मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित पूर्व सांसद और जीएनएसयू बिहार के कुलाधिपति गोपाल नारायण सिंह ने “आदिपुरुष” की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समस्त ज्ञान का मूल स्रोत वही है। उन्होंने कहा कि शब्द की उत्पत्ति भगवान शिव के डमरू से मानी जाती है, जो भारतीय दर्शन की गहराई को दर्शाता है।
जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रो. हीरामन तिवारी ने ‘भारतीय ज्ञान प्रणाली’ के स्थान पर ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ शब्द को अधिक उपयुक्त बताया। वहीं, सामाजिक विज्ञान संकाय के प्रमुख प्रो. अशोक उपाध्याय ने कहा कि अतीत की त्रुटियों का विश्लेषण कर उन्हें सुधारने के उपाय खोजने की आवश्यकता है।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ. बालमुकुंद पांडेय, जो अखिल भारतीय इतिहास संकलन समिति के संगठन सचिव भी हैं, ने कहा कि वर्तमान समय में भारत की ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवन मिल रहा है। प्रो. ए. गंगाथरन ने भी भारतीय ज्ञान परंपरा के पुनरुद्धार पर बल दिया।
सम्मेलन की शुरुआत इतिहास विभागाध्यक्ष प्रो. घनश्याम के स्वागत भाषण से हुई, जबकि डॉ. राम प्रकाश ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया। यह तीन दिवसीय सम्मेलन विभिन्न सत्रों के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा के विविध आयामों पर गहन चर्चा का मंच प्रदान करेगा।