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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Dev Diwali 23 November Hari meet Baba worship Hari-Hara involve Tulsi and Bel leaves 12 festivals month

देव दिवाली: 23 नवंबर को बाबा से भेंट करेंगे श्रीहरि, तुलसी और बेल पत्र से होगी हरिहर की पूजा; माह में 12 पर्व

Thu, 29 Oct 2026 06:32 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Thu, 29 Oct 2026 06:32 PM IST
सार

वाराणसी में बैकुंठ चतुर्दशी पर 23 नवंबर को भगवान विष्णु बाबा विश्वनाथ से भेंट करेंगे। इस विशेष अवसर पर हरिहर की पूजा तुलसीदल और बेलपत्र से होगी। साल में एक बार इस दिन बाबा विश्वनाथ को तुलसीदल और भगवान विष्णु को बेलपत्र अर्पित किया जाता है। नवंबर में कुल 12 प्रमुख पर्व पड़ेंगे।

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Dev Diwali 23 November Hari meet Baba worship Hari-Hara involve Tulsi and Bel leaves 12 festivals month
काशी में देव दीपावली (सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

देव दिवाली से एक दिन पहले काशी में भगवान विष्णु महादेव से भेंट करेंगे। 23 नवंबर बैकुंठ चतुर्दशी को विश्वनाथ प्रतिष्ठा दिवस पर भगवान विष्णु और महादेव की एक साथ हरिहर पूजा होगी। धाम के अर्चक भगवान विष्णु को बिल्वपत्र और बाबा विश्वनाथ का तुलसी दल से सहस्त्रार्चन करेंगे। यह साल में केवल एक ही बार बैकुंठ चतुर्दशी को किया जाता है। गर्भगृह के बगल में नारायण रूप में स्थापित बैकुंठेश्वर में भी अनुष्ठान कराए जाएंगे। स्कंद उपनिषद में कहे गए श्लोक शिवस्य हृदयं विष्णुः विष्णोश्च हृदयं शिवः का भी वाचन होगा।

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श्रीकाशी विश्वनाथ न्यास के आधिकारिक कैलेंडर के अनुसार, 23 नवंबर की तारीख निर्धारित की गई है। वहीं आगामी एक महीने में 12 पर्व होंगे, जिसमें छह का आयोजन मंदिर में भी विशेष तौर पर होगा। धनतेरस, दिवाली, अन्नकूट, देवउठनी एकादशी, विश्वनाथ प्रतिष्ठा दिवस और देव दिवाली धाम में मनाई जाएगी। 
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बीएचयू में ज्योतिष विभाग के ज्योतिषाचार्य प्रो. सुभाष पांडेय के अनुसार, कार्तिक के शुक्ल पक्ष में बैकुंठ चतुर्दशी होता है। इस दिन मणिकर्णिका तीर्थ पर ब्रह्म मुहूर्त में स्नान के बाद बाबा विश्वनाथ और मां अन्नपूर्णा का दर्शन करने से व्यक्ति बैकुंठ को प्राप्त होता है। विष्णु जी ने शिव को वरदान दिया था इस दिन जो आपका दर्शन करेंगे वो बैकुंठ धाम जाएंगे। तुलसी के फूल से भी सहस्त्रार्चन करने पर भी बैकुंठ प्राप्त होता है।

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शिव से पहले विष्णु की काशी का प्रमाण है बैकुंठ चतुर्दशी
काशी में शिव और विष्णु दोनों भगवान को समान रूप से पूजा जाता है। शिव से पहले काशी विष्णु का क्षेत्र रहा है। इसी मान्यता को साकार रूप देने के लिए बैकुंठ चतुर्दशी मनाया जाता है। शैव और वैष्णव की एकता का पर्व है। सौजन्य से बाबा विश्वनाथ और दंडपाणि महादेव के बीच में ही बैकुंठ महादेव का मंदिर भी है। इनका होने के बाद ज्योतिर्लिंग में बाबा का पूजन होता है। प्रांगण में बद्रीनाथ जी को भी बेल पत्र अर्पित किया जाएगा।

अन्नकूट पर बाबा को चढ़ेगा 56 भोग 
छह नवंबर को धनतेरस पर धाम में स्थापित मां अन्नपूर्णा देवी की पूजा और खजाने का वितरण होगा। आठ नवंबर को दिवाली पर लक्ष्मी-गणेश के मंदिर में पूजा कर दीप जलाए जाएंगे। नौ नवंबर अन्नकूट पर बाबा विश्वनाथ को 56 भोग अर्पित किया जाएगा। 20 नवंबर को देवउठनी एकादशी मनाई जाएगी। इस दिन भगवान विष्णु चार महीने की योगनिद्रा से जगते हैं। धाम में गन्ना लगाकर आरती की जाती है। 23 नवंबर को बैकुंठ चतुर्दशी और 24 नवंबर को देव दिवाली होगी। ललिता और विश्वनाथ मंदिर घाट सहित गंगा द्वार और पूरे धाम को भव्य रूप से सजाया जाएगा।

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