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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Gyanvapi Four female petitioners head Supreme Court own expense battle of faith not for fame

Gyanvapi: खुद के खर्च पर सुप्रीम कोर्ट जाती हैं 4 वादिनी, बोलीं- प्रसिद्धि नहीं, आस्था की लड़ाई है; खास बातचीत

Sun, 19 Jul 2026 01:37 PM IST
Aman Vishwakarma रवि प्रकाश सिंह, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
रवि प्रकाश सिंह, अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sun, 19 Jul 2026 01:37 PM IST
सार

वाराणसी में ज्ञानवापी प्रकरण की चार वादिनियों ने कहा कि उनकी लड़ाई प्रसिद्धि नहीं, बल्कि आस्था और अधिकारों की है। उन्होंने बताया कि वे अपने खर्च पर सुप्रीम कोर्ट तक पैरवी करने जाती हैं। चारों की पहली मुलाकात मां शृंगार गौरी के दर्शन के दौरान हुई थी, जिसके बाद वे इस मामले में साथ आईं।

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Gyanvapi Four female petitioners head Supreme Court own expense battle of faith not for fame
मंजू व्यास, सीता साहू, रेखा पाठक और लक्ष्मी देवी। - फोटो : संवाद

विस्तार

Varanasi News: वाराणसी में ज्ञानवापी परिसर से जुड़े बहुचर्चित शृंगार गौरी प्रकरण की शुरुआत पांच महिलाओं ने की थी। इस कानूनी लड़ाई के पीछे की कहानी भी उतनी ही रोचक है। नियमित दर्शन के दौरान लक्ष्मी देवी, सीता साहू, मंजू व्यास और रेखा पाठक की मुलाकात श्री काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर में होती थी। 

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बातचीत में उनके मन में सवाल उठा कि मां शृंगार गौरी के दर्शन साल में एक दिन ही क्यों होते हैं, जबकि 1993 से पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी। इसी सवाल ने नियमित दर्शन-पूजन के अधिकार के लिए कानूनी लड़ाई का रूप ले लिया। 
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दिल्ली निवासी मुख्य वादिनी राखी सिंह समेत कुल पांच महिलाओं ने अदालत में याचिका दायर की। हालांकि बाद में राखी सिंह इस समूह से अलग हो गईं, लेकिन शेष चारों वादिनी आज भी इस मामले की पैरवी कर रही हैं। याचिका के आधार पर अदालत ने पहले ज्ञानवापी परिसर का वीडियोग्राफी सर्वे कराने और बाद में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से वैज्ञानिक सर्वे कराने का आदेश दिया। इसके बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया। 

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चारों वादिनी बताती हैं कि यह लड़ाई किसी प्रसिद्धि या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपनी आस्था और विश्वास के लिए है। वे निचली अदालत से लेकर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक हर सुनवाई में अपने खर्च पर पहुंचती हैं। उन्हें मिली सुरक्षा व्यवस्था का खर्च भी स्वयं वहन करती हैं और हर तारीख पर अदालत में उपस्थित रहती हैं। (संवाद)

लखनऊ की बेटी हूं बनारस में शादी हुई। धर्म के प्रति गहरी आस्था थी। शृंगार गौरी मंदिर की जानकारी दादी ने दी। साल भर में एक बार दर्शन होने की बात से आहत हुई। इसके बाद कानूनी लड़ाई लड़ने की सोची। - मंजू व्यास

आस्था की लड़ाई है। मामला कोर्ट में है और लड़ाई लड़ी जा रही है। नियमित तारीख पर जाना और केस का फीडबैक लेती रहती हूं। अंतिम दम तक लड़ाई लड़ी जाएगी। -  रेखा पाठक

मां शृंगार गौरी के नियमित दर्शन-पूजन के अधिकार की यह लड़ाई उनके लिए केवल कानूनी नहीं, बल्कि आस्था और विश्वास का विषय है। तन मन धन से हम जुटे हैं। ऊपरी अदालत तक जाना हुआ तो जाएंगे। -  सीता साहू

मां शृंगार गौरी के दर्शन वर्ष में एक दिन ही क्यों होते हैं, जबकि 1993 से पहले ऐसी व्यवस्था नहीं थी जैसा की काशी के लोगों को पता है। फैसले का हम सभी को इंतजार है। - लक्ष्मी देवी

हिंदू पक्ष का दावा- 1993 तक नियमित पूजा करते थे
मामला ज्ञानवापी परिसर की बाहरी दीवार पर मां शृंगार गौरी, भगवान गणेश, हनुमान जी और नंदी के नियमित दर्शन-पूजन के अधिकार से जुड़ा है। हिंदू पक्ष का दावा है कि 1993 तक श्रद्धालु यहां नियमित रूप से पूजा-अर्चना करते थे। बाद में सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णय के चलते परिसर में बैरिकेडिंग कर दी गई, जिसके बाद नियमित पूजा पर रोक लग गई। तब से श्रद्धालुओं को साल में एक बार चैत्र नवरात्रि की चतुर्थी के दिन ही दर्शन-पूजन की अनुमति दी जाती रही है।

18 अगस्त 2021 को वाराणसी की सिविल जज (सीनियर डिवीजन) की अदालत में दाखिल किया गया था। इसके बाद ज्ञानवापी परिसर से जुड़े विभिन्न दावों और साक्ष्यों पर अदालतों में सुनवाई का सिलसिला लगातार जारी है, जिस पर देशभर की नजर बनी हुई है।

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