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कजरी कार्यशाला का समापन: गंगा में पूर्वांचल की कजरी, झूला और दादरा संग बही अवधी गीतों की गायकी
Wed, 29 Jul 2026 12:45 PM IST
Pragati Chand
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
Published by: Pragati Chand
Updated Wed, 29 Jul 2026 12:45 PM IST
सार
Varanasi News: पांच दिवसीय कजरी कार्यशाला का समापन गुरुपूर्णिमा पर हुआ। इस दौरान कजरी कार्यशाला के समापन पर मालिनी अवस्थी ने कजरी, दादरा गीत पर युवा संगीतकारों को प्रशिक्षण दिया।
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कजरी कार्यशाला का समापन कार्यक्रम
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
गुरुपूर्णिमा पर पांच दिवसीय कजरी कार्यशाला के समापन पर लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने कजरी, दादरा, झूला, चैती के साथ ही अवधी गीत पर युवा संगीतकारों को कई नए विधाओं से परिचय कराया। कजरी कार्यशाला की थीम रिमझिम बरसे बदरिया पर युवा कलाकारों को पूर्वांचल सहित लखनऊ, सीतापुर, प्रतापगढ़, उन्नाव की लोक संगीत की शैली सिखाई गई।
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झूला धीरे से झूला ओ बनवारी अरे सवारियां... झूला गाकर कलाकारों और कोरस के सुरों का टेस्ट किया। अब बरखा बहार के आई गईले ना...। माई विंध्याचल के महिमा अपार बा, ऊंचा दरबार बा ना... कजरी गीत पर महिलाएं अपने आप को नृत्य करने से नहीं रोक सकीं। अवधी गीत हे री सखी, निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर, आई सावन की बाहर रे.... गीत के बीच बीच में मालिनी अवस्थी के सुरों की उठान ने लोगों को मुग्ध कर दिया।
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गंगोत्री क्रूज पर गाते हुए मालिनी अवस्थी ने कहा कि कजरी, दादरा, झूला गायन शैली मिर्जापुर, अहरौरा, चुनार, काशी में गाई जाती है। ये यहीं से जन्मी है।
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